नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के अंदर हंगामा करने और मुख्य न्यायाधीश के पद के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने के आरोपी दो लॉ छात्रों को दिल्ली की एक कोर्ट ने जमानत दे दी है।
कोर्ट ने साफ कहा कि कोर्ट के अंदर कागज फेंकना या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी आरोपी को सिर्फ गुस्से या आरोपों की गंभीरता देखकर जेल में नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि जमानत पर फैसला भावनाओं या आरोपों की गंभीरता देखकर नहीं, बल्कि कानून के स्थापित सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है।
इस मामले में जांच लगभग पूरी हो चुकी है और आरोपियों से अब किसी और पूछताछ की जरूरत नहीं है। ऐसे में उन्हें न्यायिक हिरासत में बनाए रखने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
पटियाला हाउस कोर्ट ने प्रभल प्रताप और चंद्रभान को नियमित जमानत देते हुए साफ किया कि यह आदेश सिर्फ जमानत अर्जी पर है।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोप सही हैं या नहीं, इस पर अंतिम फैसला ट्रायल के बाद ही होगा।
क्या हुआ था सुप्रीम कोर्ट में?
यह मामला 10 जुलाई 2026 का है। लखनऊ विश्वविद्यालय के तीसरे वर्ष के लॉ स्टूडेंट प्रभल प्रताप अपने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में बिना वकील के खुद पैरवी कर रहे थे।
सुनवाई के दौरान वह कथित तौर पर नाराज हो गए। आरोप है कि उन्होंने कोर्टरूम में अपने केस से जुड़े कागज फेंक दिए और भारत के चीफ़ जस्टिस के पद के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया।
अभियोजन के अनुसार, जब सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षा कर्मी ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने उसके साथ धक्का-मुक्की की।
दूसरे आरोपी चंद्रभान पर आरोप है कि उन्होंने भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रभल प्रताप का साथ दिया।
घटना के अगले दिन यानी 11 जुलाई को दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद से वे न्यायिक हिरासत में थे।
उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। बाद में कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
इसके बाद दोनों ने नियमित जमानत के लिए पटियाला हाउस कोर्ट का रुख किया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि दोनों छात्र हैं, उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं। साथ ही कहा गया कि जांच लगभग पूरी हो चुकी है, इसलिए उन्हें लगातार जेल में रखने की जरूरत नहीं है।
वहीं, दिल्ली पुलिस ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था के अंदर हुई घटना बेहद गंभीर है।
हालांकि, कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जमानत देने का फैसला किया।
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अभद्रता पर कोर्ट ने क्या कहा?
पटियाला हाउस कोर्ट ने साफ कहा कि हर कोर्ट की अपनी गरिमा होती है।
अगर कोई व्यक्ति अपने मामले के नतीजे से नाराज भी हो, तब भी उसे कोर्टरूम में हंगामा करने या अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने माना कि खुले कोर्ट में कागज फेंकना और भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना गंभीर मामला है। ऐसे व्यवहार को किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता।
साथ ही कोर्ट ने उम्मीद जताई कि दोनों आरोपी भविष्य में किसी भी कोर्ट में पेश हों तो पूरी मर्यादा बनाए रखेंगे और इस तरह की घटना दोबारा नहीं दोहराएंगे।
पटियाला हाउस कोर्ट ने अपने आदेश में 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की ओर से पारित आदेश का भी जिक्र किया।
पटियाला हाउस कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी आरोपी के व्यवहार पर नाराजगी जताई थी, लेकिन उसकी परिस्थितियों को देखते हुए अलग से कोई कार्रवाई नहीं की।
जमानत पर फैसला करते समय इसी पहलू को भी ध्यान में रखा गया। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश केवल जमानत अर्जी तक सीमित है।
आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला ट्रायल के दौरान होगा।
कोर्ट ने बेल क्यों दी?
पटियाला हाउस कोर्ट ने कहा कि इस मामले की जांच लगभग पूरी हो चुकी है। पुलिस घटनास्थल का निरीक्षण कर चुकी है, गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं और जरूरी रिकॉर्ड भी जब्त किए जा चुके हैं।
ऐसे में अब आरोपियों से किसी और पूछताछ की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने यह भी माना कि जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें अधिकतम सजा दो साल तक की है।
रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार भी नहीं मिला, जिससे लगे कि दोनों आरोपी फरार हो सकते हैं या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
इसी आधार पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी जिक्र किया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आरोपों की गंभीरता या कथित तौर पर इस्तेमाल की गई भाषा को आधार बनाकर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
इन शर्तों पर मिली जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को जमानत देते हुए कुछ सख्त शर्तें भी तय की हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करें और किसी तरह का दुरुपयोग न हो।
कोर्ट के आदेश के अनुसार:
- दोनों आरोपियों को ₹25,000 के निजी मुचलके और उतनी ही राशि के एक जमानतदार के साथ रिहा किया जाएगा।
- उन्हें जांच और ट्रायल में जब भी बुलाया जाए, उपस्थित होना होगा।
- वे किसी भी तरह से सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेंगे।
- अपने मोबाइल नंबर और पते की जानकारी जांच अधिकारी को देंगे और उसमें बदलाव होने पर तुरंत सूचित करेंगे।
- जमानत के दौरान कोई नया अपराध नहीं करेंगे और कोर्ट की कार्यवाही में अनुशासन बनाए रखेंगे।
कोर्ट ने साफ किया कि अगर दोनों आरोपी जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन करते हैं, तो पुलिस उनकी जमानत रद्द करने की अर्जी दे सकेगी।
