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पर्यावरण मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला; पहले निर्माण, बाद में मंजूरी पर रोक, 2021 मेमोरेंडम रद्द, 2017 की अधिसूचना बरकरार

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नई दिल्ली: अब कोई भी कंपनी या एजेंसी पहले निर्माण शुरू करके बाद में पर्यावरण मंजूरी नहीं ले सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जो बिना पहले मंजूरी के शुरू हुई परियोजनाओं को बाद में मंजूरी लेने का मौका देता था।

सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते 7 जुलाई 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) को रद्द कर दिया, जबकि 14 मार्च 2017 की अधिसूचना को सीमित और समयबद्ध राहत मानते हुए बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी (EC) के शुरू किए गए प्रोजेक्ट्स को बाद में सिर्फ जुर्माना भरकर वैध नहीं किया जा सकता।

पर्यावरण मंजूरी का मकसद निर्माण शुरू होने से पहले उसके असर का आकलन करना है। अगर पहले ही निर्माण पूरा या शुरू हो जाए और उसके बाद मंजूरी दी जाए तो इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2017 की अधिसूचना को रद्द नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक बार और सीमित समय के लिए दी गई राहत थी, ताकि पहले से नियमों का उल्लंघन कर चुकी कुछ परियोजनियां तय शर्तें पूरी करके पर्यावरण मंजूरी ले सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2021 का आदेश इससे बिल्कुल अलग था। उसमें कोई समय सीमा नहीं थी और बिना पहले मंजूरी के शुरू हुई परियोजनियों को बाद में मंजूरी लेने का स्थायी रास्ता मिल रहा था।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया।

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मामला सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा?

मामला केंद्र सरकार की दो अलग-अलग व्यवस्थाओं से जुड़ा था। पहली 2017 की अधिसूचना थी, जिसके तहत पहले से बिना पर्यावरण मंजूरी के चल रही कुछ परियोजनाओं को 6 महीने के भीतर आवेदन कर नियमित कराने का मौका दिया गया था।

इसके बाद 2021 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया।

इसके जरिए बिना पहले पर्यावरण मंजूरी के शुरू हुई परियोजनाओं को बाद में मंजूरी लेने का स्थायी रास्ता मिल गया।

इसी व्यवस्था को पर्यावरण से जुड़े कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

उनका कहना था कि इससे लोग पहले निर्माण करेंगे और बाद में मंजूरी लेकर नियमों का उल्लंघन आसानी से कर सकेंगे।

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2021 का नियम क्यों रद्द किया?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2006 की पर्यावरण मंजूरी संबंधी अधिसूचना के तहत किसी भी परियोजना पर काम शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी लेना जरूरी है।

पहले निर्माण और बाद में मंजूरी लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2021 का आदेश इसी नियम को कमजोर करता है। अगर निर्माण पहले ही शुरू हो जाए तो यह ठीक से जांच ही नहीं हो सकती कि परियोजना का पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा।

लोगों की राय लेना और दूसरे विकल्पों पर विचार करना भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2021 के इस आदेश में न तो कोई समय सीमा तय थी और न ही यह कुछ चुनिंदा परियोजनाओं तक सीमित था। इससे कोई भी परियोजना पहले नियम तोड़कर निर्माण शुरू कर सकती थी और बाद में पर्यावरण मंजूरी ले सकती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था नियमों का पालन करने वालों और नियम तोड़ने वालों के बीच कोई फर्क नहीं छोड़ती।

इससे गलत संदेश जाता है कि पहले नियम तोड़ो और बाद में जुर्माना भरकर मंजूरी ले लो। कानून ऐसी व्यवस्था की इजाजत नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ नियमों की छोटी-मोटी चूक नहीं, बल्कि कानून का गंभीर उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सिर्फ जुर्माना भरकर मामला खत्म नहीं होगा।

जरूरत पड़ने पर परियोजना बंद कराई जा सकती है, अवैध निर्माण हटाया जा सकता है और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई भी कराई जा सकती है।

2017 अधिसूचना को क्यों मिली राहत?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2017 की अधिसूचना और 2021 के आदेश में बड़ा फर्क है। 2017 की व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं थी। यह सिर्फ एक बार और सीमित समय के लिए लाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि इसका फायदा सिर्फ उन परियोजनाओं को मिल सकता था, जिन्होंने अधिसूचना जारी होने से पहले नियमों का उल्लंघन किया था।

उनके लिए भी सिर्फ 6 महीने का समय तय किया गया था। साथ ही पर्यावरण को हुए नुकसान का आकलन, उसकी भरपाई और दूसरी शर्तें पूरी करना भी जरूरी था।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2017 की अधिसूचना को वैध माना।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक बार दी गई सीमित राहत थी, जबकि 2021 का आदेश बिना समय सीमा के बाद में पर्यावरण मंजूरी लेने का स्थायी रास्ता खोल रहा था।

पर्यावरण से समझौता नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन वह पर्यावरण की कीमत पर नहीं हो सकता। इसलिए पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पर्यावरण मंजूरी की व्यवस्था सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी परियोजना से प्रकृति और लोगों पर पड़ने वाले असर का पहले ही आकलन हो जाए। अगर पहले निर्माण कर लिया जाए और मंजूरी बाद में दी जाए, तो इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य खत्म हो जाता है।

इसी आधार पर कोर्ट ने 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम रद्द कर दिया और साफ कर दिया कि भविष्य में “पहले निर्माण, बाद में पर्यावरण मंजूरी” का स्थायी रास्ता नहीं अपनाया जा सकता।

पुरानी मंजूरियों को राहत, नए आवेदन बंद

सुप्रीम कोर्ट ने 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम रद्द जरूर किया, लेकिन इसका असर पहले से दी गई पर्यावरण मंजूरियों पर नहीं पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2017 की अधिसूचना और 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत पहले से जारी पर्यावरण मंजूरियां फिलहाल वैध रहेंगी।

जिन मामलों में आवेदन लंबित हैं, उनका भी कानून के मुताबिक निपटारा किया जाएगा।

हालांकि, अब इन दोनों व्यवस्थाओं के तहत कोई नया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में सिर्फ प्रशासनिक आदेश के जरिए ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती।

अगर ऐसा कोई प्रावधान लाना है तो कानून के मुताबिक विधिवत अधिसूचना जारी करनी होगी।

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