जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम को 20 दिन की पहली पैरोल देने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल देने से इनकार करने के लिए जिन आशंकाओं का हवाला दिया गया, उनके समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई।
साथ ही रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि आसाराम 13 वर्ष, एक माह और 24 दिन जेल में बिता चुका है और पहले अंतरिम जमानत पर रिहा होने के दौरान उसने किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने यह आदेश आसाराम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
सरकार ने पैरोल का विरोध क्यों किया?
आसाराम ने 20 दिन की पहली पैरोल के लिए आवेदन किया था। लेकिन जोधपुर जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता वाली पैरोल समिति ने इसे खारिज कर दिया।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार पैरोल पर रिहा होने के बाद कानून-व्यवस्था और शिकायतकर्ता के परिवार की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं हैं।
सरकार ने यह भी दलील दी कि राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज ऑन पैरोल रूल्स, 1958 के नियम 14(ए) के तहत आसाराम पैरोल का हकदार नहीं है, क्योंकि राजस्थान के अलावा गुजरात में भी उसके खिलाफ आपराधिक मामला है, जिसमें गांधीनगर की कोर्ट उसे दोषी ठहरा चुकी है।
सरकार ने यह भी बताया कि इलाज के दौरान मेडिकल अधिकारी ने उसे पैरोल के लिए फिट घोषित नहीं किया है। इन्हीं आधारों पर पैरोल समिति ने उसका आवेदन मंजूर नहीं किया था।
हाईकोर्ट ने क्या माना?
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार जिन आशंकाओं के आधार पर पैरोल का विरोध कर रही है, उनके समर्थन में कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं है।
केवल यह कह देना कि पैरोल मिलने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है या शिकायतकर्ता के परिवार को खतरा हो सकता है, पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पैरोल समितियां बिना किसी ठोस घटना या तथ्य का उल्लेख किए सिर्फ सामान्य आशंकाओं के आधार पर आवेदन खारिज कर देती हैं। ऐसा कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आसाराम पहले अंतरिम जमानत पर रिहा हो चुका है और उस दौरान जमानत का दुरुपयोग करने, किसी गवाह को प्रभावित करने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने जैसी कोई घटना सामने नहीं आई।
ऐसे में सिर्फ आशंकाओं के आधार पर उसे पैरोल से वंचित नहीं किया जा सकता।
उम्र और लंबी कैद को भी माना आधार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आसाराम 13 वर्ष, एक माह और 24 दिन से जेल में है। इस दौरान उसे पहले भी अंतरिम जमानत मिली थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि अंतरिम जमानत के दौरान उसने किसी शर्त का उल्लंघन किया हो, फरार होने की कोशिश की हो या किसी गवाह अथवा समाज को प्रभावित करने का प्रयास किया हो।
इन्हीं तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने माना कि आसाराम पहली पैरोल का लाभ पाने का हकदार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लंबी सजा काट चुके कैदी को नियमों के तहत राहत मिलनी चाहिए, खासकर तब जब उसके व्यवहार पर कोई सवाल न हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में पैरोल का मकसद केवल सजा देना नहीं बल्कि कैदी को सामाजिक जीवन से जोड़ने का मौका देना भी होता है।
गुजरात के मामले पर भी साफ किया रुख
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने गुजरात में दर्ज आपराधिक मामले और वहां हुई सजा का भी हवाला दिया।
इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि राजस्थान में सुनाई गई सजा के संबंध में पैरोल का फैसला राजस्थान के कानून और नियमों के अनुसार किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी दूसरे राज्य में दर्ज आपराधिक मामले की कानूनी प्रक्रिया अपने कानून के अनुसार चलती रहेगी।
केवल उसी आधार पर राजस्थान में पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
पैरोल किन शर्तों पर मिलेगी?
राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम को 20 दिन की पहली पैरोल देने के साथ उसकी रिहाई के लिए कुछ शर्तें भी तय की हैं।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार—
- 50 हजार रुपये का व्यक्तिगत मुचलका भरना होगा।
- 25-25 हजार रुपये के दो सक्षम जमानतदार पेश करने होंगे।
- इन जमानतदारों को स्वीकार करने की संतुष्टि जोधपुर केंद्रीय जेल के अधीक्षक करेंगे।
- जेल अधीक्षक को यह अधिकार होगा कि वह पैरोल अवधि और समय पर जेल में वापसी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक एवं उचित शर्तें तय कर सकें।
- 20 दिन की पैरोल की अवधि वास्तविक रिहाई की तारीख से गिनी जाएगी।