MTS भर्ती परीक्षा में पेपर सॉल्व कराने के चार आरोपियों की जमानत खारिज, हाईकोर्ट ने कहा कि समाज के व्यापक हित प्रभावित
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कोटा में आयोजित भर्ती परीक्षा में कथित तौर पर अनुचित साधनों के इस्तेमाल और अभ्यर्थियों को सॉल्व्ड उत्तर सामग्री उपलब्ध कराने के मामले में चार आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की अदालत ने चारों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि मामले में जांच के दौरान सामने आए बयानों, CCTV फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और वित्तीय लेन-देन से आरोपियों की कथित सक्रिय भूमिका प्रथमदृष्टया सामने आती है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही अपने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए जाने की कथित कमी अपने आप में हर मामले में जमानत का आधार नहीं बन सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट को यह देखना होगा कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधारों की पर्याप्त जानकारी थी या नहीं और कथित प्रक्रियात्मक कमी से उसे वास्तविक अथवा प्रदर्शनीय prejudice हुआ या नहीं।
क्या है मामला
मामला Central Council for Research in Ayurvedic Sciences (CCRAS) की Multi Tasking Staff (MTS) पद पर भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा से जुड़ा है।
यह परीक्षा Kota Online I.T. Education Center में आयोजित हुई थी।
परीक्षा के निष्पक्ष एवं उचित संचालन की जिम्मेदारी से जुड़े आरोपियों ने परीक्षा में शामिल अभ्यर्थियों को कथित तौर पर नकल सामग्री उपलब्ध कराने का आरोप हैं।
इस मामले में कोटा के आर.के. पुरम में चार आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
मामले में सूरज सिंह धांगर, सागर करुवान, गौरव कुमार मीणा और मदन सिंह आरोपी हैं।
सूरज सिंह कोटा स्थित परीक्षा व्यवस्था में क्लस्टर हेड एवं एग्जाम इंचार्ज, सागर वेन्यू इंचार्ज, गौरव के संबंध में कथित रूप से ₹50,000 प्राप्त करने तथा मदन सिंह को परीक्षा केंद्र के पार्टनर के रूप में अन्य आरोपियों के साथ समन्वय और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की भूमिका आरोपित की गई।
FIR में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विभिन्न धाराओं—318(4), 316(2), 338, 336(3), 340(2), 61(2)(a), 115(2), 126(2) और 238(a) तथा Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 की धाराओं 10 और 11 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
चारों जमानत आवेदन एक ही FIR से जुड़े होने के कारण हाईकोर्ट ने इन्हें एक साथ सुनते हुए साझा आदेश से निस्तारित किया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील
चारों आरोपियों की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि उन्हें मामले में सिर्फ संदेह के आधार पर झूठा फंसाया गया है।
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, इसलिए अब आरोपियों से किसी तरह की आगे की हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि मामले में कोई रिकवरी शेष नहीं है। आरोपियों को दिसंबर 2025 से हिरासत में रखा गया है और उनके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक antecedents नहीं बताए गए हैं। ऐसे में उन्हें जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
ब्रीच ऑफ ट्रस्ट की धाराओं पर सवाल
बचाव पक्ष ने यह कानूनी तर्क भी रखा कि मामले में cheating से संबंधित धाराएँ और criminal breach of trust से संबंधित प्रावधान कानूनी रूप से एक साथ लागू नहीं हो सकते।
यानी अभियोजन द्वारा लगाए गए विभिन्न आरोपों के बीच कानूनी असंगति होने का दावा किया गया।
CCRAS परीक्षा Public Examination नहीं
याचिकाकर्ताओं की ओर से एक महत्वपूर्ण दलील Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 की प्रयोज्यता को लेकर थी।
बचाव पक्ष ने RTI के माध्यम से प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि CCRAS द्वारा आयोजित परीक्षा को वर्ष 2024 के अधिनियम के तहत ‘Public Examination’ नहीं माना जा सकता।
इसलिए इस अधिनियम की धाराओं के तहत आरोप लगाए जाने की वैधानिकता पर भी सवाल उठाया गया।
गिरफ्तारी की वैधता पर भी उठाया सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से गिरफ्तारी की प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई। उनका कहना था कि गिरफ्तारी के समय संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा से संबंधित प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया और आरोपियों को गिरफ्तारी के आधारों की पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई।
बचाव पक्ष ने इसी आधार पर कहा कि गिरफ्तारी प्रभावित होती है और आरोपियों को जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
इस दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों पर भरोसा किया गया।
इनमें Vihaan Kumar v. State of Haryana, Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra और Dr. Rajinder Ranjan v. Union of India के निर्णय शामिल थे। साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट के Jhabra Ram v. State of Rajasthan मामले के निर्णय का भी हवाला दिया गया।
सरकार ने विरोध में क्या कहा…
जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने कहा कि पूरा घटनाक्रम एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य भर्ती परीक्षा को अनुचित साधनों के जरिए प्रभावित करना था।
अभियोजन के मुताबिक आरोपियों की भूमिका अलग-अलग थी और चार्जशीट में प्रत्येक आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं।
CCTV फुटेज और वित्तीय लेन-देन
सरकार ने अपने पक्ष में दलील दी कि परीक्षा केंद्र से प्राप्त CCTV फुटेज में आरोपियों की उपस्थिति दिखाई देती है और प्रथमदृष्टया अभ्यर्थियों को सॉल्व्ड उत्तर सामग्री तथा अन्य सामग्री उपलब्ध कराने में उनकी सक्रिय भूमिका दिखाई देती है।
इसके अलावा जांच एजेंसी ने जांच के दौरान बयानों, CCTV फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वित्तीय लेन-देन से संबंधित सामग्री एकत्र की।
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया आरोपियों की कथित अपराध में सक्रिय भागीदारी की ओर संकेत करती है और उन्हें केवल परीक्षा केंद्र के निष्क्रिय कर्मचारी के रूप में नहीं देखा जा सकता।
हाईकोर्ट ने Article 22(1) पर क्या कहा?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी आरोपी को देना संविधान के अनुच्छेद 22(1) से जुड़ी संवैधानिक सुरक्षा है।
कोर्ट ने कहा कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता से वंचित किए जाने के कारणों की जानकारी हो और वह अपने संवैधानिक एवं कानूनी उपायों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके।
हालांकि अदालत ने State of Karnataka v. Sri Darshan के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार देना सामान्य नियम है, लेकिन प्रत्येक प्रक्रियात्मक कमी से गिरफ्तारी स्वतः अवैध नहीं हो जाती और न ही हर स्थिति में आरोपी जमानत का हकदार हो जाता है।
मुख्य प्रश्न यह है कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधारों की पर्याप्त जानकारी थी या नहीं और कथित कमी से उसे कोई वास्तविक नुकसान या prejudice हुआ या नहीं।
अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के आधार दर्ज होने की बात
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में आरोपियों को गिरफ्तारी के आधार बताए जाने तथा उनके संवैधानिक अधिकारों से अवगत कराने का उल्लेख था।
साथ ही, आरोपियों की गिरफ्तारी की सूचना उसी दिन उनके संबंधित परिजनों को दिए जाने की बात भी रिकॉर्ड में थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों की ओर से इन प्रक्रियाओं की पर्याप्तता पर सवाल उठाया गया, लेकिन ऐसा कोई प्रथमदृष्टया सामग्री अदालत के सामने नहीं रखी गई जिससे यह साबित हो कि आरोपी अपने खिलाफ आरोपों से अनजान रहे अथवा कथित प्रक्रियात्मक कमी के कारण अपने संवैधानिक या वैधानिक उपायों का प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर सके।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि प्रारंभिक रिमांड के समय संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी नहीं दिए जाने को लेकर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इससे संवैधानिक अधिकार का waiver नहीं माना जा सकता, लेकिन यह परिस्थितियों का आकलन करने में प्रासंगिक तथ्य हो सकता है।
‘पब्लिक एग्जामिनेशन’ होने का सवाल ट्रायल में तय होगा
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि CCRAS द्वारा आयोजित परीक्षा Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 के तहत ‘public examination’ की श्रेणी में नहीं आती।
हाईकोर्ट ने इस दलील पर कहा कि यह मुद्दा तथ्य और कानून दोनों से जुड़ा है और इसके लिए साक्ष्यों का मूल्यांकन आवश्यक होगा।
इसलिए BNSS की धारा 483 के तहत जमानत पर विचार करते समय इस प्रश्न का अंतिम एवं निर्णायक निस्तारण नहीं किया जा सकता।
भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों के अनुसार यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर परीक्षा में गड़बड़ी का मामला नहीं है, बल्कि परीक्षा की निष्पक्षता, पारदर्शिता और अखंडता को प्रभावित करने वाली कथित साजिश है।
हाईकोर्ट के अनुसार ऐसे कृत्य न केवल योग्य अभ्यर्थियों के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि पारदर्शी और मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया की नींव को प्रभावित करते हैं तथा सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था में लोगों के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, प्रत्येक आरोपी को सौंपी गई विशिष्ट भूमिका, जांच के दौरान सामने आए प्रथमदृष्टया corroborative material और सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने से जुड़े व्यापक जनहित को देखते हुए इस चरण पर जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।
चारों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों के पक्ष में जमानत देने का मामला नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 483 के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग करने का कोई उचित आधार नहीं पाया।
इसके साथ ही सूरज सिंह धांगर, सागर करुवान, गौरव कुमार मीणा और मदन सिंह की सभी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं।