नई दिल्ली: देश में कैंसर के कितने मरीज हैं और इस बीमारी से हर साल कितनी मौतें हो रही हैं, इसका सही आंकड़ा सामने लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कैंसर को ‘नोटिफाएबल डिजीज’ घोषित करने पर विचार कर उचित फैसला लेने का निर्देश दिया है, जिन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पूरे देश में कैंसर के मामलों की जानकारी जुटाने के लिए एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि पूरे देश में कैंसर के मामलों की जानकारी जुटाने के लिए एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि अभी 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार को देना जरूरी कर चुके हैं।
अब बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी इस पर विचार कर अपना फैसला कोर्ट को बताना होगा।
‘नोटिफाएबल डिजीज’ का मतलब ऐसी बीमारी से है, जिसके मामले सामने आने पर संबंधित स्वास्थ्य व्यवस्था को इसकी जानकारी सरकार या तय स्वास्थ्य प्राधिकरण को देनी होती है।
इससे बीमारी के फैलाव और मामलों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सवाल
सुप्रीम कोर्ट कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार तक पहुंचाने की व्यवस्था को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से पूछा कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कैंसर की जानकारी देने की एक जैसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरे देश में कैंसर की रिपोर्टिंग को लेकर एक जैसी नीति होनी चाहिए।
इससे अलग-अलग राज्यों से आने वाली जानकारी को एक जगह जुटाना आसान होगा और देश में कैंसर की वास्तविक स्थिति भी साफ हो सकेगी।
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने कहा कि स्वास्थ्य से जुड़े मामले राज्यों की जिम्मेदारी हैं।
उन्होंने बताया कि अभी 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार को देना जरूरी कर चुके हैं।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से भी इस पर विचार कर अपना फैसला बताने को कहा।
डॉक्टर की PIL से उठा मुद्दा
यह मामला डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव की जनहित याचिका से जुड़ा है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से पूरे देश में कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार तक पहुंचाना जरूरी करने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि देश में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन सभी राज्यों में इसकी जानकारी जुटाने की एक जैसी व्यवस्था नहीं है।
कुछ राज्यों में कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार के रिकॉर्ड में जरूरी तौर पर दर्ज होती है, जबकि कई राज्यों में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कैंसर के मामलों का पूरा और भरोसेमंद आंकड़ा तैयार करना मुश्किल हो जाता है।
याचिका में पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था बनाने और कैंसर के मामलों का तुरंत रिकॉर्ड तैयार करने के लिए डिजिटल सिस्टम बनाने की भी मांग की गई है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि अलग-अलग राज्यों में अलग व्यवस्था होने से एक जैसी स्थिति वाले मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाओं और इलाज के मामले में अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
सही आंकड़ा क्यों जरूरी?
कैंसर के हर मामले की जानकारी सरकार तक पहुंचेगी तो देश में इस बीमारी की सही तस्वीर सामने आएगी।
इससे पता चल सकेगा कि किस राज्य या इलाके में कैंसर के मामले ज्यादा हैं और किस तरह का कैंसर ज्यादा सामने आ रहा है।
इसके आधार पर सरकार यह तय कर सकती है कि कहां कैंसर की जांच, अस्पताल, डॉक्टर और इलाज की ज्यादा जरूरत है।
सही आंकड़ों से कैंसर की जांच और स्क्रीनिंग की योजना बनाने में भी मदद मिलेगी।
सरकार यह तय कर सकेगी कि इलाज से जुड़ी सुविधाओं और दूसरे संसाधनों को कहां ज्यादा बढ़ाने की जरूरत है।
यानी बात सिर्फ मरीजों की गिनती की नहीं है। सही आंकड़े मिलने से कैंसर के खिलाफ सरकार की तैयारी बेहतर हो सकती है।
कैंसर से मौतों का सही रिकॉर्ड जरूरी
इस मामले में संसद की स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की 139वीं रिपोर्ट का भी जिक्र हुआ।
समिति ने कहा था कि कैंसर के मामलों और इससे होने वाली मौतों की पूरी जानकारी सरकार तक नहीं पहुंच पाती। इसकी वजह से कैंसर से होने वाली मौतों का सही आंकड़ा सामने नहीं आता।
कई बार मरीज की मौत कैंसर से होने के बावजूद रिकॉर्ड में कोई दूसरा कारण दर्ज हो जाता है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कैंसर से वास्तव में कितनी मौतें हुईं।
अगर कैंसर के हर मामले और मौत की जानकारी ठीक से दर्ज होगी तो सरकार के पास इस बीमारी का ज्यादा सही रिकॉर्ड होगा।
इससे कैंसर की जांच, इलाज और दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलेगी।
17 राज्यों में पहले से लागू है व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पहले ही कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार को देना जरूरी कर चुके हैं।
अब कोर्ट ने बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से भी इस पर विचार करने को कहा है। उन्हें इस बारे में अपना फैसला कोर्ट को बताना होगा।
फिलहाल पूरे देश में कैंसर के मामलों की जानकारी देने की एक जैसी व्यवस्था नहीं है। कुछ राज्यों में यह व्यवस्था लागू है, जबकि बाकी राज्यों को अब इस पर फैसला लेना है।
देश में कैंसर का पूरा रिकॉर्ड नहीं
याचिका में कैंसर के मामलों का रिकॉर्ड रखने वाली मौजूदा व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया है।
याचिका के मुताबिक, नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम अभी देश की करीब 10% आबादी तक ही पहुंचता है। ग्रामीण इलाकों में इसकी पहुंच करीब 1% बताई गई है।
यानी देश के बड़े हिस्से से कैंसर के आंकड़े पूरी तरह सामने नहीं आ पाते।
इससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि देश में कैंसर के कितने मामले हैं और इसका असर किन इलाकों में ज्यादा है।
इसी वजह से याचिका में पूरे देश में कैंसर का डेटा जुटाने वाली एक जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
इसमें जानकारी तुरंत दर्ज हो और अलग-अलग राज्यों का डेटा एक जगह देखा जा सके।
पूरा डेटा एक जगह रखने की सिफारिश
संसदीय समिति ने कैंसर के मामलों का रिकॉर्ड रखने के लिए कोविन जैसा ऑनलाइन सिस्टम बनाने की भी सिफारिश की थी।
कोविन एक ऑनलाइन सिस्टम था, जिस पर कोरोना के दौरान वैक्सीन लगवाने वाले लोगों और वैक्सीनेशन से जुड़ी जानकारी दर्ज की जाती थी।
इसी तरह कैंसर के लिए एक ऐसा सिस्टम बनाने की बात है, जहां देशभर में सामने आने वाले कैंसर के मामलों और मौतों की जानकारी एक जगह दर्ज हो सके।
इससे अलग-अलग राज्यों और इलाकों से आने वाले आंकड़ों को एक साथ देखना आसान होगा।
सरकार को यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि किस राज्य या इलाके में कैंसर के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं और कहां इलाज की ज्यादा जरूरत है।
समिति ने इस व्यवस्था के जरिए मरीजों को काउंसलिंग और दूसरी जरूरी मदद देने की भी सिफारिश की थी।
बाकी राज्यों से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कैंसर के मामलों की जानकारी सरकार तक पहुंचाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। उन्हें इस बारे में अपना फैसला कोर्ट को बताना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का जोर इस बात पर है कि पूरे देश में कैंसर के मामलों और इससे होने वाली मौतों का सही और भरोसेमंद रिकॉर्ड तैयार हो।
अगर सभी राज्यों में एक जैसी व्यवस्था बनती है तो सरकार के पास कैंसर की स्थिति की ज्यादा साफ तस्वीर होगी। इससे जांच, इलाज, अस्पतालों की सुविधाओं और सरकारी योजनाओं की बेहतर तैयारी की जा सकेगी।
यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा सिर्फ कैंसर के आंकड़े जुटाने का नहीं है।
मकसद यह है कि देश में कैंसर की वास्तविक स्थिति का पता चले और उसी हिसाब से मरीजों के इलाज और स्वास्थ्य सुविधाओं की तैयारी की जा सके।