हाईकोर्ट ने कहा-कारण के बिना न्यायिक आदेश मनमाना, कारण न्यायिक आदेश का हृदय और आत्मा
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए केंद्रीय खान मंत्रालय के पुनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कंपनी की स्टे अर्जी बिना कोई ठोस कारण बताए खारिज कर दी गई थी।
कोर्ट ने मामले को पुनरीक्षण प्राधिकारी के पास वापस भेजते हुए दोनों पक्षों को सुनने के बाद नए सिरे से निर्णय लेने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस मनीष शर्मा ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है।
क्या था मामला
हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड ने खान मंत्रालय, भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार एवं पुनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा 13 अप्रैल 2026 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
यह आदेश खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 30 तथा मिनरल्स (अन्य परमाणु एवं हाइड्रो कार्बन ऊर्जा खनिजों को छोड़कर) नियम, 2016 के नियम 36(5) के तहत दायर पुनरीक्षण याचिका से संबंधित था।
कंपनी की ओर से पुनरीक्षण याचिका के साथ स्टे आवेदन भी दायर किया गया था, लेकिन पुनरीक्षण प्राधिकारी ने उसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मामले में स्टे देने के लिए कोई औचित्य या पर्याप्त आधार नहीं है।
कंपनी की ओर से अधिवक्ता पुनीत सिंघवी, उनके साथ उदय एन. तिवारी, गौरिका भंसाली और ईशान वर्मा ने पैरवी की। केंद्र सरकार की ओर से राकेश चौधरी ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भारत व्यास की ओर से पक्ष रखा।
कंपनी ने कहा- आदेश में कोई कारण ही नहीं बताया
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि पुनरीक्षण प्राधिकारी ने स्टे आवेदन खारिज करते समय कोई कारण दर्ज नहीं किया। आदेश में केवल यह कहा गया कि स्टे देने का कोई औचित्य या पर्याप्त कारण नहीं है।
कंपनी ने इस आदेश को non-speaking और मनमाना बताते हुए इसे रद्द करने तथा स्टे आवेदन पर पुनरीक्षण प्राधिकारी को नए सिरे से कारणयुक्त और स्पष्ट आदेश पारित करने के लिए मामला वापस भेजने की मांग की।
केंद्र सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया गया कि पुनरीक्षण कार्यवाही में उठाई गई मांग परिमाणित की जा सकती है और इसलिए कंपनी को ऐसी अपूरणीय क्षति नहीं होगी, जिसके आधार पर रिट याचिका स्वीकार की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा- कारण न्यायिक आदेश की आत्मा
हाईकोर्ट ने 13 अप्रैल 2026 के आदेश का परीक्षण करते हुए पाया कि स्टे आवेदन खारिज करने के पीछे कोई कारण नहीं बताया गया था। आदेश में केवल यह लिखा गया था कि मामले में स्टे देने के लिए पर्याप्त औचित्य या कारण नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा कि आदेश में पक्षकारों की दलीलों या मामले के गुण-दोष पर कोई विचार नहीं किया गया। इसलिए आदेश में विवेकपूर्ण विचार और न्यायिक मस्तिष्क के प्रयोग का प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता।
जस्टिस मनीष शर्मा ने स्पष्ट किया कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेश में कारण दर्ज करना आवश्यक है।
कारण किसी भी न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक आदेश का हृदय और आत्मा होते हैं। बिना कारण वाला आदेश मनमाना होता है और कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं होता।
कारण दर्ज करना जरूरी- हाईकोर्ट ने गिनाए पांच आधार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कारण दर्ज करने की आवश्यकता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया।
पहला-कारण दर्ज करने से मनमानी पर रोक लगती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि प्राधिकारी ने मामले के तथ्यों और कानून पर उचित रूप से विचार किया है। लिखित कारण निर्णय लेने वाले अधिकारी को भी अपने निर्णय की दोबारा गंभीरता से जांच करने के लिए बाध्य करते हैं।
दूसरा-जिस पक्ष को राहत दी गई है या राहत से वंचित किया गया है, उसे यह जानने का अधिकार है कि उसका पक्ष स्वीकार या अस्वीकार क्यों किया गया। कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि ऐसा स्पष्ट रूप से दिखाई भी देना चाहिए।
तीसरा-कारण दर्ज करने से निर्णय प्रक्रिया में अनुशासन और वस्तुनिष्ठता आती है। प्राधिकारी को उपलब्ध सामग्री और पक्षकारों की दलीलों पर तार्किक तरीके से विचार करना पड़ता है।
चौथा-कारणयुक्त आदेश के आधार पर उच्चतर न्यायालय या पर्यवेक्षण करने वाली अदालत के लिए निर्णय की वैधता, शुद्धता और औचित्य की प्रभावी जांच करना संभव होता है।
पांचवां-कारण दर्ज करने से निर्णय प्रक्रिया में स्पष्टता, निश्चितता और पारदर्शिता आती है। इससे कानून के शासन और न्यायिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास मजबूत होता है।
हाईकोर्ट ने आदेश किया रद्द, छह सप्ताह में नए सिरे से फैसला
इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने हिंदुस्तान जिंक की रिट याचिका स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने 13 अप्रैल 2026 के पुनरीक्षण प्राधिकारी के आदेश को रद्द करते हुए स्टे आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामला पुनरीक्षण प्राधिकारी को वापस भेज दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों पक्षों को सुनने का उचित अवसर देने के बाद स्टे आवेदन पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए। यह प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह सप्ताह के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के गुण-दोष पर कोई विचार नहीं किया है। मामले को केवल इसलिए पुनरीक्षण प्राधिकारी के पास भेजा गया है क्योंकि स्टे आवेदन खारिज करने वाला आदेश पूरी तरह गैर-वक्तव्यात्मक था और उसमें कारण दर्ज नहीं किए गए थे।
कोर्ट ने स्टे आवेदन संख्या 9064/2026 सहित सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।
इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि किसी पक्ष की राहत को स्वीकार या अस्वीकार करने वाला न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक आदेश केवल निष्कर्ष दर्ज करके पूरा नहीं किया जा सकता।
निर्णय के पीछे के कारणों का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक है, ताकि पक्षकारों को न्यायिक निर्णय का आधार पता चले और उच्च अदालतें उसकी प्रभावी समीक्षा कर सकें।