जयपुर। सरिस्का क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के पास रेस्ट हाउस बनाने के लिए 19 किसानों की जमीन के अधिग्रहण के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए जमीन अधिग्रहण का आदेश रद्द कर दिया।
टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट यानी सीटीएच के एक किलोमीटर के दायरे में NHAI का रेस्ट हाउस बनाने की योजना पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने धूअरमाला गांव के 19 किसानों की जमीन के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए भूमि अधिग्रहण अधिकारी का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें किसानों की आपत्तियां खारिज कर दी गई थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब अधिकारियों के सामने वैकल्पिक जमीन मौजूद थी और उसे ज्यादा उपयुक्त भी माना गया था, तो उस विकल्प पर गंभीरता से विचार किए बिना किसानों की जमीन पर आगे बढ़ना सही नहीं था।
हाईकोर्ट ने पाया कि जिस जगह रेस्ट हाउस प्रस्तावित था, वह संवेदनशील टाइगर हैबिटेट के प्रतिबंधित क्षेत्र में आती है।
खास बात यह रही कि अधिकारियों के रिकॉर्ड में पहले ही यह बात सामने आ चुकी थी कि इस जगह पर निर्माण करना उचित नहीं होगा और वैकल्पिक जमीन तलाशने की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी।
इसके बावजूद बाद में किसानों की आपत्तियां खारिज कर इस जमीन पर ही परियोजना आगे बढ़ाने का फैसला किया गया।
हाईकोर्ट ने इस तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी परियोजना को सिर्फ पब्लिक यूटिलिटी यानी सार्वजनिक सुविधा बता देने से उस पर लागू वन और पर्यावरण संबंधी प्रतिबंध खत्म नहीं हो जाते।
रेस्ट हाउस के लिए ली किसानों की जमीन
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अक्षय शर्मा के अनुसार मामला अलवर के धूअरमाला गांव की कृषि जमीन से जुड़ा है। यहां करीब दो साल पहले अक्टूबर 2024 में 19 किसानों की कृषि भूमि को एनएच-28ए के शाहपुरा-अलवर सेक्शन के विस्तार के लिए अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
इसी जमीन पर एनएचएआई की ओर से रेस्ट हाउस बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।
किसानों ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि रेस्ट हाउस के लिए उनकी कृषि जमीन लेने की जरूरत नहीं थी।
किसानों ने जमीन अधिग्रहण की इस कार्रवाई को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
मामले में जमीन की जगह को लेकर भी सवाल उठे। प्रस्तावित जगह सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के एक किलोमीटर के दायरे में आती थी।
किसानों की ओर से यह भी दलील दी गई कि सरकार के वर्ष 2015 के आदेश के तहत ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में व्यावसायिक या औद्योगिक गतिविधियों और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव पर प्रतिबंध है।
ऐसे में इस जमीन पर रेस्ट हाउस जैसी परियोजना को आगे बढ़ाना नियमों के खिलाफ होगा।
साथ ही वन विभाग ने भी अधिकारियों को इस बारे में जानकारी दी थी और दूसरी जगह पर रेस्ट हाउस बनाने का सुझाव दिया था।
किसानों की ओर से अधिवक्ता अक्षय शर्मा ने हाईकोर्ट के सामने यही सवाल उठाया कि जब परियोजना के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र में जमीन चुनी गई थी तो अधिकारियों ने वैकल्पिक जगह पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया।
वैकल्पिक जगह मिली, फिर भी किसानों की जमीन ली
मामले में एक अहम तथ्य यह सामने आया कि अधिकारियों को बाद में नहीं, बल्कि पहले ही इस प्रतिबंधित क्षेत्र की स्थिति का पता चल गया था।
रिकॉर्ड के अनुसार 31 जनवरी 2025 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने माना था कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस की जमीन सीटीएच के एक किलोमीटर के दायरे में आती है।
अधिकारी ने यह भी माना था कि रेस्ट हाउस को किसी दूसरी जगह शिफ्ट करना सही होगा।
इसके बाद रेस्ट हाउस के लिए फरवरी और मार्च 2025 में वैकल्पिक जमीन तलाशने की प्रक्रिया शुरू की गई।
इस दौरान बांदरोले गांव में वैकल्पिक जमीन सामने आई और समिति ने इस जमीन को रेस्ट हाउस के लिए ज्यादा उपयुक्त भी माना था।
इसके बावजूद धूअरमाला गांव की जमीन के अधिग्रहण की कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।
किसानों की ओर से इस कार्रवाई को लेकर आपत्तियां भी उठाई गई थीं, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।
बाद में भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने किसानों की आपत्तियां खारिज कर दीं और मूल जमीन के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी बात को गंभीरता से देखा।
हाईकोर्ट के सामने सवाल था कि जब बांदरोले में दूसरी जमीन उपलब्ध थी और उसे ज्यादा उपयुक्त माना गया था, तो धूअरमाला की जमीन पर ही आगे बढ़ने की जरूरत क्यों पड़ी।
हाईकोर्ट ने माना कि अधिकारियों को उपलब्ध वैकल्पिक जमीन पर ठीक से विचार करना चाहिए था।
टाइगर हैबिटेट के पास रेस्ट हाउस पर सवाल
मामले का दूसरा अहम पहलू प्रस्तावित रेस्ट हाउस की जगह को लेकर था।
यह जमीन सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के एक किलोमीटर के दायरे में आती थी। वन विभाग ने भी अधिकारियों को इसकी जानकारी दी थी।
ऐसे में हाईकोर्ट ने यह देखा कि जमीन चुनते समय इस संवेदनशील इलाके से जुड़ी स्थिति को कितना ध्यान में रखा गया।
हाईकोर्ट के सामने यह भी था कि रेस्ट हाउस के लिए बांदरोले में वैकल्पिक जमीन उपलब्ध थी और उसे ज्यादा उपयुक्त माना गया था।
ऐसे में सवाल सिर्फ 19 किसानों की जमीन लेने का नहीं था।
सवाल यह भी था कि संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र के इतने करीब रेस्ट हाउस के लिए धूअरमाला की जमीन पर ही आगे क्यों बढ़ा गया।
हाईकोर्ट ने माना कि जब दूसरी जमीन का विकल्प मौजूद था, तो उस पर ठीक से विचार किए बिना धूअरमाला की जमीन के अधिग्रहण को आगे बढ़ाना सही नहीं था।
‘पब्लिक यूटिलिटी’ की दलील भी खारिज
एनएचएआई की ओर से परियोजना के बचाव में कहा गया कि प्रस्तावित रेस्ट हाउस कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं है।
इसे हाईवे का इस्तेमाल करने वाले लोगों की सुविधा के लिए पब्लिक यूटिलिटी के तौर पर विकसित किया जाना था।
लेकिन हाईकोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने प्रस्तावित परियोजना में शामिल दूसरी सुविधाओं को भी देखा।
रिकॉर्ड के मुताबिक रेस्ट हाउस के साथ फ्यूल स्टेशन और कियोस्क भी बनाए जाने थे।
हाईकोर्ट ने माना कि इन सुविधाओं का स्वरूप व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ा है।
ऐसे में सिर्फ किसी परियोजना को पब्लिक यूटिलिटी कह देने से उस जगह पर लागू वन और पर्यावरण से जुड़े नियम खत्म नहीं हो जाते।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि संवेदनशील क्षेत्र में किसी परियोजना के लिए पहले वहां लागू कानूनी पाबंदियों और नियमों का पालन करना होगा।
यानी हाईवे की सुविधा के नाम पर भी टाइगर हैबिटेट से जुड़े प्रतिबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जमीन अधिग्रहण रद्द, 19 किसानों को राहत
हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को देखते हुए भूमि अधिग्रहण अधिकारी का आदेश रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट के आदेश से 19 किसानों को बड़ी राहत मिली है।
इसका सीधा असर उन 19 किसानों पर पड़ा है, जिनकी जमीन को लेकर अधिग्रहण की कार्रवाई की जा रही थी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रस्तावित रेस्ट हाउस के लिए कृषि जमीन के अधिग्रहण की कार्रवाई अब पहले की तरह आगे नहीं बढ़ सकेगी।
हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से जुड़ा आदेश रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अधिकारियों की ओर से वैकल्पिक जमीन पर किए गए विचार को भी अहम माना गया है।
इस मामले में कोर्ट ने सिर्फ यह नहीं देखा कि सरकार किसी प्रोजेक्ट के लिए जमीन ले सकती है या नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि जमीन चुनते समय अधिकारियों ने उपलब्ध विकल्पों और संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र को कितना ध्यान में रखा।
सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट के पास रेस्ट हाउस बनाने के इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें किसानों की जमीन, वैकल्पिक जमीन और वन्यजीव क्षेत्र से जुड़े पहलुओं को एक साथ देखा गया है।