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संवैधानिक संरक्षण के बाद भी जज भय या दबाव में हैं तो यह न्यायपालिका के लिए अच्छी बात नहीं- राजस्थान हाईकोर्ट बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल

If Judges Face Fear or Pressure Despite Constitutional Protection, It Is Not Good for the Judiciary: Rajasthan High Court Bar President Rajiv Sogarwal

SC जज जस्टिस संदीप मेहता के तीन पत्रों के सामने आने के बाद जयपुर हाईकोर्ट बार ने जताई गंभीर चिंता, तीनों प्रमुख बार एसोसिएशन जल्द करेंगी बैठक

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की न्यायिक व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता द्वारा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समक्ष तीन पत्रों के जरिए कथित तौर पर गंभीर मुद्दे उठाए जाने की खबर सामने आने के बाद राजस्थान की न्यायपालिका में हलचल लगातार बढ़ रही है।

अब राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर ने पूरे घटनाक्रम पर खुलकर गंभीर चिंता जताई है।

राजीव सोगरवाल, अध्यक्ष

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव सोगरवाल और महासचिव दीपेश शर्मा ने लॉज एंड लीगल्स से विशेष बातचीत में पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक बताया।

बार अध्यक्ष ने साफ कहा कि यदि न्यायपालिका के भीतर किसी प्रकार का भय या दबाव है तो यह स्थिति किसी भी स्तर पर उचित या स्वीकार्य नहीं हो सकती।

“जजों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, फिर भय या दबाव क्यों?”

लॉज एंड लीगल्स से विशेष बातचीत में बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल ने कहा कि उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी सीधे तौर पर नहीं, बल्कि मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से मिली है। पत्रों में क्या मुद्दे उठाए गए हैं, इसकी जानकारी भी उन्हें मीडिया के जरिए ही प्राप्त हुई।

उन्होंने कहा कि संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को व्यापक संवैधानिक संरक्षण और अधिकार प्राप्त हैं। ऐसे में यदि किसी जज को किसी प्रकार के भय या दबाव में काम करना पड़ रहा है तो यह पूरी न्यायपालिका के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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“मुद्दे उठाना गलत नहीं, लेकिन सार्वजनिक होना दुर्भाग्यपूर्ण”

राजीव सोगरवाल ने कहा कि यदि न्यायपालिका के भीतर कोई गंभीर मुद्दा था और उसे उठाया गया है तो इसमें अपने आप में कुछ गलत नहीं है। लेकिन ऐसे संवेदनशील मामलों का सार्वजनिक होकर मीडिया के जरिए सामने आना न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा के लिहाज से दुर्भाग्यपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों के समाधान के लिए एक उचित संस्थागत फोरम होना चाहिए। यदि मौजूदा व्यवस्था में ऐसा कोई प्रभावी मंच नहीं है तो ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जहां न्यायपालिका से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को सुना और सुलझाया जा सके।

उनका कहना था कि न्यायपालिका से जुड़े विवादों का समाधान सार्वजनिक बहस के बजाय संस्थागत स्तर पर किया जाना चाहिए।

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तीनों बार एसोसिएशन जल्द करेंगी बैठक

इस बीच राजस्थान की तीनों प्रमुख हाईकोर्ट बार एसोसिएशन इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लगातार संपर्क में हैं। बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल ने कहा कि जल्द ही बैठक आयोजित कर मामले के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

उन्होंने संकेत दिए कि बैठक के बाद आगे की रणनीति और निर्णय के संबंध में एक-दो दिन में तस्वीर साफ हो सकती है।

जनता का भरोसा प्रभावित होगा”- दीपेश शर्मा

राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के महासचिव दीपेश शर्मा ने भी पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आम जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति एक मजबूत विश्वास होता है और जब न्यायपालिका से जुड़ी इस तरह की खबरें सार्वजनिक होती हैं तो उस विश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

दीपेश शर्मा, महासचिव

उन्होंने कहा कि राजस्थान के दूर-दराज के गांवों और कस्बों से लोग न्याय की उम्मीद लेकर हाईकोर्ट आते हैं। ऐसे में यदि उन्हें न्यायपालिका के भीतर किसी प्रकार के विवाद, भय या दबाव से जुड़ी खबरें मिलती हैं तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।

दीपेश शर्मा ने कहा कि इसका असर अधिवक्ताओं पर भी पड़ता है, क्योंकि अधिवक्ता आम जनता और न्यायपालिका के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते हैं।

“मीडिया में आने के बजाय संस्थागत स्तर पर सुलझाए जाते मुद्दे”

महासचिव दीपेश शर्मा का कहना है कि यदि वास्तव में कोई गंभीर मुद्दा था तो उसे संबंधित स्तर पर बैठकर और उचित संस्थागत मंच के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि ऐसे संवेदनशील विषयों का सार्वजनिक डोमेन में आना न्यायपालिका के लिए अच्छी स्थिति नहीं है।

उन्होंने बताया कि मीडिया और सोशल मीडिया में खबर सामने आने के बाद बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने उनसे संपर्क किया है और पूरे घटनाक्रम को लेकर चिंता एवं असंतोष जताया है।

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“न्यायपालिका पर भरोसा कायम रहना सबसे जरूरी”

बार एसोसिएशन के महासचिव दीपेश शर्मा ने कहा कि न्यायपालिका में आम जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। यदि किसी प्रकार की शिकायत या समस्या है तो उसका संस्थागत और पारदर्शी तरीके से समाधान होना चाहिए, ताकि न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित न हो।

वहीं, बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल ने कहा कि वह इस पूरे घटनाक्रम की घोर निंदा करते हैं और तीनों बार एसोसिएशन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि यदि जांच के बाद किसी प्रकार की अनियमितता या गंभीर तथ्य सामने आते हैं तो उस पर उचित कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा और आम जनता का उस पर अटूट विश्वास कायम रहे।

जस्टिस संदीप मेहता के पत्रों के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब राजस्थान की न्यायपालिका और अधिवक्ता समुदाय के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है। तीनों बार एसोसिएशन की प्रस्तावित बैठक पर अब सभी की नजरें टिकी हैं।

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