जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर जिले में PWD के करीब 6.35 करोड़ रुपए के एक निर्माण कार्य से जुड़े विवाद में ठेकेदार के पक्ष में दिए गए आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने माना कि जब दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण तथ्यों पर विवाद हो, तो सिर्फ दावों और दस्तावेजों के आधार पर फैसला नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों को अपने दावे साबित करने के लिए साक्ष्य देने का उचित मौका देना जरूरी है।
नागौर जिले में PWD के इस निर्माण प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने के बाद स्थानीय ग्रामीणों के विरोध के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका था।
ठेकेदार का दावा था कि साइट पर मजदूर, कर्मचारी और मशीनरी तैयार थी, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण काम नहीं हो पाया। उसने इसी आधार पर मजदूरों और मशीनरी के खाली रहने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए PWD से रकम मांगी।
मामला आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल तक पहुंचा, जिसने ठेकेदार के पक्ष में अवॉर्ड दे दिया। PWD ने इस अवॉर्ड को चुनौती दी, लेकिन अजमेर की कमर्शियल कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा।
अब राजस्थान हाईकोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट के आदेश के साथ ही ठेकेदार के पक्ष में दिया गया आर्बिट्रेशन अवॉर्ड भी रद्द कर दिया है।
जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब अहम तथ्य विवादित हों तो उन पर बिना जरूरी साक्ष्य के फैसला नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने विवादित तथ्यों पर जरूरी मुद्दे तय किए बिना और दोनों पक्षों को साक्ष्य का उचित मौका दिए बिना अवॉर्ड पारित किया था।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर अजमेर की कमर्शियल कोर्ट का आदेश और ठेकेदार के पक्ष में दिया गया आर्बिट्रेशन अवॉर्ड दोनों रद्द कर दिए।
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PWD ने दिया था ₹6.35 करोड़ का वर्क ऑर्डर
मामला नागौर जिले के कुचामन सिटी क्षेत्र में PWD के एक निर्माण काम से जुड़ा है।
PWD ने 15 मई 2013 को M/s त्रिमूर्ति कंस्ट्रक्शन को 6 करोड़ 35 लाख 43 हजार 815 रुपए का ठेका दिया था।
काम शुरू होने के बाद साइट पर स्थानीय ग्रामीणों और निवासियों के विरोध के कारण प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद PWD ने ठेका वापस लेने की कार्रवाई शुरू कर दी।
इसके बाद ठेकेदार ने काम रुकने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का रुख किया।
उसका कहना था कि काम शुरू करने के लिए मजदूर और स्टाफ साइट पर मौजूद थे और मशीनरी भी लगाई गई थी, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण काम नहीं हो सका।
ठेकेदार ने 3 जून से 10 अक्टूबर 2013 तक मजदूरों और स्टाफ के खाली बैठने के एवज में 12 लाख 49 हजार 665 रुपए मांगे।
इसके अलावा साइट पर मशीनरी के बेकार पड़े रहने के लिए करीब 19 लाख 56 हजार रुपए का दावा किया गया।
अधिकरण ने ठेकेदार के पक्ष में अवार्ड पारित कर दिया।
PWD ने ठेकेदार के दावे पर उठाए सवाल
ठेकेदार के दावों को PWD ने गलत करार दिया।
PWD ने आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के इस अवार्ड को मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत चुनौती दी, लेकिन अजमेर की कमर्शियल कोर्ट ने विभाग की याचिका खारिज करते हुए अवार्ड को बरकरार रखा।
इसके बाद PWD ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील की।
विभाग ने आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के सामने कहा कि साइट पर ठेकेदार ने उतने मजदूर लगाए ही नहीं थे, जितने का दावा किया जा रहा है।
PWD के मुताबिक 19 जून 2013 को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक सिर्फ एक JCB मशीन साइट पर लाई गई थी। उसके साथ दो सुपरवाइजर और तीन बेलदार थे। एक ट्रैक्टर-ट्रॉली भी साइट पर लाई गई थी।
विभाग ने 9 सितंबर और 20 सितंबर 2013 को भेजे पत्रों में भी साइट पर मजदूर और मशीनरी लगाए जाने के दावे का विरोध किया था।
PWD के साइट प्रभारी सहायक अभियंता ने 2 सितंबर 2013 को रिपोर्ट दी थी कि ठेकेदार या उसका कोई प्रतिनिधि काम शुरू कराने के लिए उनसे संपर्क करने नहीं आया।
यानी विवाद सिर्फ ग्रामीणों के विरोध का नहीं था। सवाल यह भी था कि साइट पर वास्तव में कितने मजदूर और मशीनरी मौजूद थे और ठेकेदार को कितना नुकसान हुआ।
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दावों पर बिना सबूत के फैसला
PWD ने आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के सामने ठेकेदार के दावों पर साफ आपत्ति जताई थी।
लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि ट्रिब्यूनल ने इन विवादित तथ्यों को लेकर जरूरी मुद्दे ही तय नहीं किए।
इन विवादित बातों को साबित करने के लिए दोनों पक्षों से मौखिक या लिखित सबूत भी नहीं लिए गए।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ठेकेदार के दस्तावेजों पर भरोसा करने से पहले PWD से उनकी स्वीकार्यता या आपत्ति के बारे में नहीं पूछा गया।
हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में सिर्फ एक पक्ष के दावे के आधार पर नुकसान की रकम तय करना सही नहीं था।
विवादित तथ्यों पर फैसला देने से पहले दोनों पक्षों को अपना पक्ष और साक्ष्य रखने का उचित मौका देना जरूरी था।
विवादित दावों के लिए सबूत जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में अहम तथ्यों को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो, तो दोनों को अपना पक्ष साबित करने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
जरूरी मुद्दे तय किए बिना और दोनों पक्षों से सबूत लिए बिना आर्बिट्रेशन अवॉर्ड देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में Section 34 के तहत आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती दी जा सकती है, खासकर जब फैसला कानून और न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हो।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ओएनजीसी बनाम सॉ पाइप्स और यूनिब्रोस बनाम ऑल इंडिया रेडियो सहित अन्य पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना साक्ष्य के दिया गया ऐसा अवार्ड भारत की सार्वजनिक नीति के खिलाफ माना जा सकता है।
मजदूर साइट पर थे या मशीनरी खड़ी थी, यह बात सबूत से साबित करनी होगी।
कमर्शियल कोर्ट ने भी PWD को राहत नहीं दी
आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के 11 मार्च 2016 के अवॉर्ड को PWD ने Section 34 के तहत अजमेर की कमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी थी।
लेकिन 3 जून 2023 को कमर्शियल कोर्ट ने PWD की याचिका खारिज कर दी और आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को बरकरार रखा। इसके बाद PWD के कार्यकारी अभियंता ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट ने PWD की चुनौती यह मानते हुए खारिज कर दी थी कि Section 34 के तहत कोर्ट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता।
लेकिन हाईकोर्ट के सामने सवाल सिर्फ साक्ष्यों को दोबारा देखने का नहीं था।
असली सवाल यह था कि क्या आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने विवादित तथ्यों पर फैसला देने से पहले जरूरी प्रक्रिया अपनाई थी?
हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में जरूरी मुद्दे तय किए बिना और दोनों पक्षों को अपना पक्ष साबित करने का उचित मौका दिए बिना अवॉर्ड दिया गया था।
हाईकोर्ट ने पूरा अवॉर्ड ही रद्द किया
हाईकोर्ट ने PWD की अपील स्वीकार कर ली।
जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की डिवीजन बेंच ने अजमेर कमर्शियल कोर्ट का 3 जून 2023 का आदेश रद्द कर दिया।
इसके साथ ही 11 मार्च 2016 को आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल की ओर से ठेकेदार के पक्ष में दिया गया अवॉर्ड भी रद्द कर दिया गया।
लंबित स्टे एप्लीकेशन और दूसरी अर्जियों का भी निपटारा कर दिया गया।
यानी हाईकोर्ट ने यह साफ कर दिया कि मध्यस्थता की प्रक्रिया में भी अगर पक्षकारों के बीच गंभीर तथ्यात्मक विवाद मौजूद है, तो उसे बिना साक्ष्य और उचित सुनवाई के सिर्फ दावों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।