मृतका की मां को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत; कानूनी मदद के अभाव को गंभीरता से लेते हुए अपील बहाल, अब राजस्थान हाईकोर्ट मेरिट पर करेगा दोबारा सुनवाई
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज की मांग और प्रताड़ना से महिला की मौत से जुड़े राजस्थान के एक आपराधिक मामले में अहम फैसला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिन की देरी के आधार पर महिला की अपील खारिज करने का राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की मां को राहत देते हुए उसकी अपील दोबारा सुनने का रास्ता साफ कर दिया।
अब हाईकोर्ट को मामले की दोबारा मेरिट पर सुनवाई करनी होगी।
यह मामला महिला की बेटी की मौत से जुड़ा है। महिला ने आरोपी के बरी होने के फैसले को चुनौती दी थी।
लेकिन हाईकोर्ट ने अपील में हुई 19 दिन की देरी और देरी माफ करने की अर्जी नहीं होने के आधार पर उसे खारिज करते हुए मामले को सुनने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपील के साथ देरी माफ करने की अर्जी होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर मामले को खत्म करना सही नहीं था। लेकिन मामले में महिला को पर्याप्त कानूनी मदद मिली या नहीं, इसे भी देखा जाना जरूरी था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि सुनवाई के समय जब महिला की ओर से कोई वकील मौजूद नहीं था, तो उसे एमिकस या लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के जरिए कानूनी मदद दी जानी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी पक्ष की परेशानी और उसे मिली कानूनी मदद को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर महिला की अपील बहाल कर दी।
19 दिन की देरी पर खारिज हुई अपील
मामला एक महिला की उस अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने अपनी बेटी की मौत के मामले में आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
महिला का कहना था कि उसकी बेटी की मौत से जुड़े मामले में आरोपी को बरी करने का फैसला सही नहीं है।
महिला ने राजस्थान हाईकोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की, लेकिन अपील 19 दिन की देरी से दाखिल हुई। इसके साथ देरी माफ करने की अलग अर्जी नहीं लगाई गई थी।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर अपील सुनने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने मामले के मूल आरोपों पर जाने के बजाय देरी को देखते हुए अपील खारिज कर दी।
इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
उसने हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि उसकी अपील को सिर्फ देरी के आधार पर खत्म नहीं किया जाना चाहिए।
हर पक्ष को कानूनी मदद मिलना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 19 दिन की देरी के लिए महिला को देरी माफ करने की अर्जी देनी चाहिए थी।
लेकिन कोर्ट ने यह भी देखा कि हाईकोर्ट में सुनवाई के समय उसकी ओर से कोई वकील मौजूद नहीं था। ऐसी स्थिति में महिला को अपनी बात रखने के लिए कानूनी मदद मिलनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ऐसे में उसे कानूनी मदद दिलाने के लिए एमिकस या लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के किसी वकील को नियुक्त किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी कानूनी कमी की वजह से मामला खत्म करने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिला था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के समय महिला की ओर से कोई पेश नहीं हुआ था।
सिर्फ देरी के आधार पर खत्म नहीं होगा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 19 दिन की देरी के लिए महिला को देरी माफ करने की अर्जी दाखिल करनी चाहिए थी। लेकिन सिर्फ इस कमी के आधार पर उसकी अपील को खत्म करना सही नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों के साथ यह भी देखा कि सुनवाई के समय महिला की ओर से कोई पेश नहीं हुआ था।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर महिला की अपील फिर से बहाल कर दी।
अब मामले की मेरिट पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अब महिला की अपील पर मामले की मेरिट के आधार पर सुनवाई करे।
इसका मतलब है कि अब हाईकोर्ट यह देख सकेगा कि आरोपी को बरी करने का फैसला सही था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस सवाल पर कोई फैसला नहीं दिया है।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को दोषी नहीं ठहराया है और न ही महिला के आरोपों को सही माना है।
उसने सिर्फ हाईकोर्ट का वह आदेश हटाया है, जिसमें 19 दिन की देरी के आधार पर अपील खारिज कर दी गई थी।
अब हाईकोर्ट को मामले को दोबारा सुनना होगा।