जयपुर। सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच चल रही हो और जांच पूरी होने से पहले उसकी मौत हो जाए, तो क्या विभाग उसके खिलाफ कार्रवाई जारी रख सकता है?
राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारी की मौत के बाद उसके खिलाफ चल रही विभागीय जांच को लेकर अहम फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने फैसले देते हुए कहा है कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी की मौत विभागीय जांच पूरी होने और अंतिम सजा दिए जाने से पहले हो जाती है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई आगे जारी नहीं रखी जा सकती।
मामला एक शिक्षक बाबू मोहम्मद पंवार से जुड़ा है। विभाग ने उनके खिलाफ 2022 में चार्जशीट जारी की थी, लेकिन जांच पूरी होने से पहले ही उनकी मौत हो गई।
पंवार के परिवार ने उनकी मौत के बाद विभागीय कार्रवाई जारी रखने पर सवाल उठाया था। वहीं राज्य सरकार का कहना था कि विभागीय जांच और क्रिमिनल केस अलग-अलग होते हैं।
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस मुकेश राजपुरोहित ने शिक्षक बाबू मोहम्मद पंवार के खिलाफ जारी चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई रद्द कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई का मकसद कर्मचारी के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करना और दोष साबित होने पर उसे सजा देना होता है।
कर्मचारी की मौत के बाद उस पर कोई विभागीय सजा लगाई ही नहीं जा सकती, इसलिए जांच को आगे जारी रखने का भी कोई आधार नहीं बचता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 24 मई 2022 की चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई रद्द कर दी।
साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि पंवार के कानूनी उत्तराधिकारियों को नियमों के मुताबिक मिलने वाले सेवा और रिटायरमेंट लाभ पर विचार किया जाए। इन लाभों पर फैसला करते समय रद्द की गई चार्जशीट और विभागीय कार्रवाई को आधार नहीं बनाया जाएगा।
FIR के बाद सस्पेंड हुए थे शिक्षक
मामला पीटीआई ग्रेड-III शिक्षक बाबू मोहम्मद पंवार से जुड़ा है। उन्हें जुलाई 2015 में निलंबित किया गया था।
पंवार के खिलाफ एक FIR दर्ज हुई थी, जिसमें IPC की धारा 498-A, 304-B और 406 के तहत आरोप लगाए गए थे।
इस मामले में वह 48 घंटे से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में रहे थे। इसी वजह से विभाग ने उन्हें निलंबित कर दिया था।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी विभाग ने चार्जशीट दी
बाद में बाबू मोहम्मद पंवार को जमानत मिल गई। इसके बाद पंवार ने कई बार विभाग से अपना निलंबन खत्म करने की मांग की।
निलंबन खत्म नहीं होने पर पंवार हाईकोर्ट पहुंचे थे। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को उनकी ओर से दिए गए आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया था।
लेकिन इसके बाद विभाग ने निलंबन खत्म करने के बजाय उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी। विभाग ने 24 मई 2022 को Rule 16 के तहत मेमोरेंडम और चार्जशीट जारी कर दी।
चार्जशीट में लगाए गए आरोप उसी घटना से जुड़े थे, जिसे लेकर पंवार के खिलाफ क्रिमिनल केस भी चल रहा था।
चार्जशीट को चुनौती देने वाली पंवार की याचिका हाईकोर्ट में लंबित थी। इसी दौरान 27 अप्रैल 2026 को पंवार की मौत हो गई।
इसके बाद पंवार के कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया।
परिवार की ओर से कहा गया कि पंवार की जिंदगी में विभाग ने कोई अंतिम आदेश पारित कर सजा नहीं दी थी। ऐसे में उनकी मौत के बाद उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय जांच को आगे जारी नहीं रखा जा सकता।
क्रिमिनल केस से अलग है विभागीय जांच
राज्य सरकार की ओर से परिवार की इस दलील का विरोध किया गया।
सरकार की ओर से कहा गया कि पंवार के खिलाफ चार्जशीट नियमों के तहत सही तरीके से जारी की गई थी। विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मामला दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और दोनों अपने-अपने क्षेत्र में चल सकते हैं।
हाईकोर्ट ने भी माना कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा एक-दूसरे से अलग होते हैं।
क्रिमिनल केस में अपराध साबित करने का सवाल होता है, जबकि विभागीय कार्रवाई में कर्मचारी पर लगे गलत आचरण या सेवा नियमों के उल्लंघन की जांच की जाती है।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस मामले में असली सवाल यह नहीं है कि दोनों कार्यवाहियां अलग हैं या नहीं।
सवाल यह है कि क्या कर्मचारी की मौत के बाद उसके खिलाफ विभागीय जांच जारी रखी जा सकती है, जबकि उसकी जिंदगी में कोई अंतिम विभागीय सजा दी ही नहीं गई?
हाईकोर्ट के मुताबिक विभागीय जांच का मकसद यह तय करना है कि कर्मचारी ने गलत आचरण किया है या सेवा नियमों का उल्लंघन किया है और इसके आधार पर उसके खिलाफ क्या सजा दी जानी चाहिए।
कर्मचारी की मौत के बाद जब उसे सजा ही नहीं दी जा सकती, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच जारी रखने का भी कोई आधार नहीं बचता।
मौत के बाद नहीं दी जा सकती सजा
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई सीधे कर्मचारी से जुड़ी होती है। कर्मचारी की मौत के बाद उसके खिलाफ कोई विभागीय सजा नहीं दी जा सकती।
ऐसे में अगर कर्मचारी की जिंदगी में कोई अंतिम सजा नहीं हुई है, तो उसकी मौत के बाद सिर्फ यह तय करने के लिए जांच जारी नहीं रखी जा सकती कि वह दोषी था या नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि सिर्फ चार्जशीट जारी हो जाने से कर्मचारी की मौत के बाद विभागीय कार्रवाई जारी रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने चार्जशीट समेत पूरी कार्रवाई रद्द की
इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने बाबू मोहम्मद पंवार के खिलाफ 24 मई 2022 को जारी चार्जशीट रद्द कर दी।
इसके साथ ही चार्जशीट के आधार पर शुरू हुई आगे की पूरी विभागीय कार्रवाई भी खत्म कर दी गई।
इस फैसले से कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि विभागीय जांच को कर्मचारी की मौत के बाद केवल इसलिए जारी नहीं रखा जा सकता कि चार्जशीट पहले ही जारी हो चुकी थी।
जब कर्मचारी की मौत हो चुकी है और उसकी जिंदगी में कोई अंतिम सजा नहीं दी गई, तो उसके खिलाफ लंबित विभागीय जांच को आगे बढ़ाने का भी कोई आधार नहीं बचता।
परिवार के सेवा लाभों पर भी फैसला
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि पंवार के कानूनी उत्तराधिकारियों को नियमों के तहत मिलने वाले सेवा और रिटायरमेंट से जुड़े लाभों के दावे पर विचार किया जाए।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि इन लाभों पर फैसला लेते समय रद्द की गई चार्जशीट और खत्म हो चुकी विभागीय कार्रवाई को आधार नहीं बनाया जाएगा।
साथ ही, कोर्ट ने कहा कि उसने FIR में लगाए गए आरोपों पर कोई राय नहीं दी है। कोर्ट ने यह भी तय नहीं किया कि पंवार उस मामले में दोषी थे या निर्दोष।
यानी हाईकोर्ट ने सिर्फ विभागीय कार्रवाई खत्म की है। FIR से जुड़े मामले में पंवार के दोषी या निर्दोष होने पर कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया है।