जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना एडवोकेट एनरोलमेंट के कोर्ट में वकील के तौर पर पेश होने के मामले में सख्त रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ खुद को वकील बताने से कोई व्यक्ति वकालत नहीं कर सकता। इसके लिए संबंधित स्टेट बार काउंसिल में कानून के मुताबिक नामांकन जरूरी है।
इसी के साथ जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने फर्जी वकील बनकर कोर्ट की कार्यवाही में पेश होने के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी और Section 528 BNSS के तहत FIR में दखल देने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹50 हजार की कॉस्ट भी लगाई है।
मामले में एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी, जिस पर आरोप था कि वह एडवोकेट नहीं होने के बावजूद निचली कोर्ट में वकील के रूप में पेश हुआ और अलग-अलग मामलों में दस्तावेज भी दाखिल किए।
याचिकाकर्ता ने FIR रद्द करने की मांग की
डीडवाना जिले के रहने वाले याचिकाकर्ता सुरेंद्र सिंह ने मकराना थाने में दर्ज FIR को रद्द कराने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया था।
उसके खिलाफ FIR नंबर 180/2025 31 मई 2025 को दर्ज की गई थी। FIR में Section 319(2) BNSS, 2023 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
सुरेंद्र सिंह की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उसने FIR में लगाए गए आरोपों के मुताबिक कोई अपराध नहीं किया है। उसका दावा था कि उसने कभी खुद को एडवोकेट बताकर पेश नहीं किया और न ही कोर्ट में ऐसा कोई काम किया, जो सिर्फ एडवोकेट ही कर सकता है।
याचिकाकर्ता के वकील ने इस दलील के आधार पर FIR रद्द करने की मांग की और मामले में अपने पक्ष को सही ठहराने के लिए कई तर्क दिए।
हालांकि, कोर्ट के सख्त रुख के चलते कुछ देर की बहस के बाद वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और याचिका वापस लेने की अनुमति नहीं दी।
निचली कोर्ट में वकील के तौर पर पेश होने का आरोप
हाईकोर्ट ने FIR में दर्ज आरोपों और उपलब्ध रिकॉर्ड को देखने के बाद पाया कि सुरेंद्र सिंह एडवोकेट नहीं था, इसके बावजूद वह कुछ मामलों में निचली कोर्ट में एडवोकेट के तौर पर पेश हुआ था।
उसने अलग-अलग मामलों में कई दस्तावेज भी दाखिल किए थे। मामले की जानकारी संबंधित कोर्ट तक पहुंची तो उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई।
ये बात भी सामने आई कि एक बार जब सुरेंद्र सिंह निचली कोर्ट में पेश हुआ, तो वहां मौजूद कुछ वकीलों ने उसे पकड़ने की कोशिश की। हालांकि, वह कोर्ट परिसर की दीवार फांदकर मौके से निकल गया। इसके बाद अमरा राम की शिकायत पर उसके खिलाफ FIR दर्ज की गई।
हाईकोर्ट ने साफ किया- एनरोलमेंट के बिना वकालत नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस मामले में एक अहम कानूनी स्थिति साफ की।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति तब तक एडवोकेट के रूप में प्रैक्टिस नहीं कर सकता या खुद को एडवोकेट के तौर पर पेश नहीं कर सकता, जब तक उसका संबंधित स्टेट बार काउंसिल में Advocates Act, 1961 के तहत सही तरीके से एनरोलमेंट न हो।
यानी किसी व्यक्ति के पास कानून की जानकारी होना या खुद को वकील बताना अपने आप में उसे कोर्ट में वकालत करने का अधिकार नहीं देता। कोर्ट में एडवोकेट के तौर पर पेश होने के लिए बार काउंसिल में नामांकन जरूरी होना चाहिए।
याचिका वापस लेने की कोशिश भी काम नहीं आई
इस मामले में एक और बात हाईकोर्ट ने खास तौर पर नोट की। जब कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर सवाल उठाए तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी थी।
हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की इस कोशिश को भी मामले के आरोपों के जोड़कर देखा।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों के बाद याचिका वापस लेने की मांग करना FIR में लगाए गए आरोपों को और मजबूत करता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आनंद पुरोहित की सहायता भी ली।
उन्हें दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनकर मामले के सही तथ्यों से कोर्ट को अवगत कराने को कहा गया। बाद में दोनों पक्षों से बात करने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता ने भी माना कि याचिका कॉस्ट के साथ खारिज की जानी चाहिए।
₹50 हजार के जुर्माने के साथ याचिका खारिज
पूरे मामले और FIR में लगाए गए आरोपों को देखते हुए हाईकोर्ट ने Section 528 BNSS के तहत दखल देने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही सुरेंद्र सिंह की याचिका खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹50 हजार की कॉस्ट लगाई है।
यह रकम एक महीने के भीतर राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट क्लर्क्स एसोसिएशन के खाते में जमा कराने का निर्देश दिया गया है।
6 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने मामले को 6 अक्टूबर 2026 को अनुपालन के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। यानी उस तारीख को कोर्ट यह देखेगा कि ₹50 हजार की कॉस्ट जमा कराने के निर्देश का पालन हुआ या नहीं।
इस आदेश के जरिए हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि कोर्ट में वकील के तौर पर पेश होने का अधिकार सिर्फ खुद को वकील बताने से नहीं मिलता।
स्टेट बार काउंसिल में Advocates Act, 1961 के तहत वैध एनरोलमेंट जरूरी है। इसके बिना कोई व्यक्ति एडवोकेट के रूप में कोर्ट में प्रैक्टिस या पैरवी नहीं कर सकता।