प्रयागराज। किसी लड़की की उम्र 18 साल से कम है या नहीं, यह सिर्फ उसके शारीरिक विकास को देखकर तय नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने 2011 के एक अपहरण मामले में यह अहम टिप्पणी करते हुए आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 366 के तहत दोषमुक्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने आरोपी भैया लाल रैदास को IPC की धारा 366 के तहत दोषी ठहराने वाले ट्रायल कोर्ट के उस फैसले क रद्द दिया जिसमें आरोपी को 7 साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने कहा कि किसी लड़की की अक्ल दाढ़ नहीं निकली या बगल और जननांगों पर बाल हैं या नहीं, सिर्फ इतनी बात से उसे 18 साल से कम उम्र का नहीं माना जा सकता।
उम्र का सवाल अनुमान या सामान्य धारणा के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए विश्वसनीय दस्तावेज और वैज्ञानिक साक्ष्यों को कानून के मुताबिक परखा जाना जरूरी है।
लेकिन इस मामले में अभियोजन पक्ष घटना के समय लड़की की उम्र 18 साल से कम होने की बात साबित नहीं कर सका।
ट्रायल कोर्ट ने उम्र 14 से 17 साल मानकर दी थी सजा
मामला 2011 में सामने आया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी भैया लाल रैदास को धारा 366 के तहत दोषी ठहराया था, जबकि धारा 363 और 376 के आरोपों से उसे बरी कर दिया गया था।
मामले में ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की उम्र 14 से 17 साल के बीच मानी थी। उम्र तय करने के लिए कोर्ट ने उसके दांतों और शारीरिक विकास को भी आधार बनाया।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी देखा कि लड़की की अक्ल दाढ़ नहीं निकली थी। साथ ही बगल और जननांगों पर बाल होने को भी उम्र के आकलन में शामिल किया गया।
लेकिन हाईकोर्ट ने उम्र तय करने के इस तरीके को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि केवल दांत या शरीर के विकास जैसे शारीरिक संकेतों के आधार पर यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति 18 साल से कम उम्र का है।
डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट की राय अलग थी
जब मामला हाईकोर्ट के सामने पहुंचा तो मेडिकल रिकॉर्ड पर गौर किया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर ने उसकी उम्र करीब 20 साल बताई थी, जबकि रेडियोलॉजिस्ट ने उम्र करीब 18 साल बताई थी। रेडियोलॉजिस्ट ने उम्र में छह महीने तक कम या ज्यादा होने की संभावना भी जताई थी।
हाईकोर्ट ने इन विशेषज्ञ राय को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट को विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज कर अपनी समझ के आधार पर उम्र तय नहीं करनी चाहिए थी।
‘अक्ल दाढ़ से 18 साल की उम्र तय नहीं होती‘
हाईकोर्ट ने उम्र तय करने के ट्रायल कोर्ट के तरीके पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि केवल अक्ल दाढ़ नहीं निकलने से यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति ने 18 साल की उम्र पूरी नहीं की है।
इसी तरह बगल या जननांगों पर बाल होना भी उम्र का पक्का आधार नहीं हो सकता। इन शारीरिक लक्षणों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।
हाईरोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति का शारीरिक विकास एक जैसा नहीं होता। इसलिए ऐसे सामान्य शारीरिक लक्षणों के आधार पर किसी व्यक्ति की सटीक उम्र तय करना सही तरीका नहीं है।
मार्कशीट पेश हुई, लेकिन उम्र साबित नहीं हो सकी
मामले में पीड़िता की कक्षा आठ की एक मार्कशीट के आधार पर भी उसकी उम्र साबित करने की कोशिश की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने इस दस्तावेज को उम्र तय करते समय ध्यान में रखा था।
लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि इस मार्कशीट को कानूनी तरीके से साबित ही नहीं किया गया था। यानी यह नहीं बताया गया कि मार्कशीट किसने जारी की और उसे जारी करने वाले संबंधित अधिकारी को कोर्ट में पेश करके इसकी पुष्टि भी नहीं कराई गई।
ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ मार्कशीट पेश कर देने से उसे उम्र का भरोसेमंद सबूत नहीं माना जा सकता। इसलिए पीड़िता की उम्र 18 साल से कम साबित करने के लिए इस दस्तावेज पर भरोसा नहीं किया जा सकता था।
पीड़िता के बयानों पर भी हाईकोर्ट ने किया गौर
हाईकोर्ट ने जांच के दौरान पीड़िता की ओर से दिए गए बयानों को भी देखा। पीड़िता ने पुलिस के सामने धारा 161 के बयान और मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के बयान में कहा था कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी।
हाईकोर्ट ने माना कि ये बातें भी मामले को समझने में अहम थीं। ट्रायल कोर्ट को उम्र से जुड़े सबूतों के साथ पीड़िता के इन बयानों पर भी पूरी तरह गौर करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन अहम पहलुओं को नजरअंदाज करके सिर्फ शारीरिक विकास के आधार पर पीड़िता को नाबालिग मानना और फिर उसी आधार पर आरोपी को IPC की धारा 366 के तहत दोषी ठहराना सही नहीं था।
ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द, आरोपी बरी
इन सभी पहलुओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी भैया लाल रैदास की अपील स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने 8 फरवरी 2013 को ट्रायल कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले को रद्द कर दिया और आरोपी को IPC की धारा 366 के आरोप से बरी कर दिया।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्ति की उम्र सिर्फ उसकी शारीरिक बनावट देखकर तय नहीं की जा सकती। उम्र तय करने के लिए भरोसेमंद दस्तावेज, वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञों की राय के साथ मामले में मौजूद सभी सबूतों पर गौर करना जरूरी है।
