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लिखित बयान में देरी पर हर मामले में नहीं चलेगा तय फार्मूला, राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ किए नियम; निचली कोर्ट का आदेश बरकरार

No Fixed Formula for Delay in Written Statement, Rajasthan High Court Upholds Lower Court Order

जयपुर। सिविल मुकदमे में लिखित बयान दाखिल करने में देरी हो जाए तो क्या कोर्ट उसे हर परिस्थिति में स्वीकार करने से इनकार कर देगा?

राजस्थान हाईकोर्ट ने सिविल मुकदमों में लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा को लेकर अहम फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि समय-सीमा खत्म होने के बाद देरी माफ करने का कोई तय फॉर्मूला नहीं है। हर मामले में देरी की वजह और उसके हालात देखकर फैसला करना होगा।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि तय समय निकलने के बाद लिखित बयान दाखिल करने वाले पक्ष को अपने आप राहत मिल जाएगी। उसे देरी के लिए पर्याप्त कारण या उचित स्पष्टीकरण देना होगा।

जस्टिस सुदेश बंसल ने यह टिप्पणी निचली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर की, जिसमें देरी माफ करते हुए एक प्रतिवादी का लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी गई थी।

हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के Order 8 Rule 1 में लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा तय करने का मकसद मुकदमे की सुनवाई को तेजी से आगे बढ़ाना है। सिर्फ तकनीकी आधार पर किसी पक्ष को अपना पक्ष रखने से नहीं रोका जा सकता।

करीब पांच साल बाद दाखिल हुआ लिखित बयान

मामला जून 2021 में दायर एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने स्थायी निषेधाज्ञा की मांग को लेकर यह मुकदमा दायर किया था। मामले में 10 प्रतिवादियों को पक्षकार बनाया गया था और जून 2021 में सभी को समन भी मिल चुके थे।

इनमें से एक प्रतिवादी ने अप्रैल 2026 में अपना लिखित बयान दाखिल किया। यानी मुकदमा दायर होने के करीब 5 साल बाद लिखित बयान रिकॉर्ड पर लाया गया।

प्रतिवादी ने देरी माफ करने के लिए भी आवेदन दिया था। निचली कोर्ट ने आवेदन मंजूर करते हुए लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने के निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता ने समय-सीमा का दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि लिखित बयान दाखिल करने में हुई देरी के लिए प्रतिवादी ने कोई ठोस कारण नहीं बताया था।

उनका कहना था कि CPC के Order 8 Rule 1 में लिखित बयान दाखिल करने की समय-सीमा तय है। ऐसे में समय-सीमा खत्म होने के बाद लिखित बयान स्वीकार करने का निचली कोर्ट के पास कोई पर्याप्त आधार नहीं था।

हाईकोर्ट ने इस दलील को नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि गैर-वाणिज्यिक सिविल मामलों में समय-सीमा खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि उसके बाद कोर्ट लिखित बयान स्वीकार ही नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि उचित कारण होने पर देरी माफ कर लिखित बयान रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा-समय-सीमा का मकसद मुकदमा आगे बढ़ाना

हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को भी ध्यान में रखा।

कैलाश बनाम नानकू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आदेश 8 नियम 1 में लिखित बयान के लिए तय समय-सीमा को हर परिस्थिति में अनिवार्य नहीं माना जा सकता।

इस प्रावधान का मकसद मुकदमे की सुनवाई में अनावश्यक देरी रोकना और प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाना है। इसका मकसद ऐसा नहीं है कि केवल प्रक्रिया की समय-सीमा के कारण किसी मामले की सुनवाई ही प्रभावित हो जाए।

हाईकोर्ट ने एटकॉम टेक्नोलॉजीज लिमिटेड बनाम वाई.ए. चुनावाला एंड कंपनी के फैसले का भी जिक्र किया।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह प्रावधान सिर्फ मुकदमे की प्रक्रिया से जुड़ा है, किसी पक्ष के मूल अधिकार से नहीं। इसलिए उचित मामले में निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अदालत की शक्ति बनी रहती है।

देरी माफ करने का कोई तय फॉर्मूला नहीं, कारण बताना जरूरी

जस्टिस सुदेश बंसल ने कहा कि समय-सीमा खत्म होने के बाद लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति मांगने वाले पक्ष को देरी की पर्याप्त वजह बतानी होगी।

लेकिन इन वजहों को परखने के लिए कोई ऐसा तय फॉर्मूला नहीं बनाया जा सकता, जो हर मामले पर एक जैसा लागू हो। अलग-अलग मामलों में देरी की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।

इसलिए कोर्ट को पूरे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखकर यह तय करना होगा कि देरी माफ की जानी चाहिए या नहीं।

लिखित बयान में देरी माफ करने से पहले क्या देखेगा कोर्ट?

हाईकोर्ट ने कहा कि गैर-वाणिज्यिक सिविल मुकदमों में लिखित बयान दाखिल करने में हुई देरी के लिए कोई एक तय फॉर्मूला नहीं हो सकता। कोर्ट को हर मामले में देरी की वजह, मामले के हालात और दूसरे पक्ष पर पड़े असर को देखकर फैसला करना होगा।

निचली कोर्ट के फैसले में दखल से इनकार

हाईकोर्ट ने पाया कि लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने से याचिकाकर्ता को ऐसा कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ, जिसके आधार पर निचली कोर्ट के आदेश में दखल दिया जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मामले के हालात को देखते हुए प्रतिवादी को पूरी देरी के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

इसी आधार पर जस्टिस सुदेश बंसल ने याचिका खारिज कर दी और देरी माफ कर लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने के निचली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

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