सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के ईको-सेंसिटिव जोन में निर्माण पर यूडीए की कार्रवाई रहेगी जारी, हाईकोर्ट ने सीलिंग-डेमोलिशन के आदेश में दखल से इनकार
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर के सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के ईको-सेंसिटिव जोन में होटल, रिसॉर्ट और अन्य निर्माण गतिविधियों से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
जस्टिस समीर जैन की अदालत ने संबंधित रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) की ओर से की गई कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय प्रतिबंधों वाले क्षेत्र में निर्माण को केवल डीम्ड परमिशन, पुराने निर्माण या किए गए निवेश के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जहां निजी व्यावसायिक हित और पर्यावरण संरक्षण का वैधानिक दायित्व आपस में टकराते हैं, वहां पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी।
कोर्ट ने माना कि संबंधित निर्माण प्रतिबंधित क्षेत्र से जुड़ा है और याचिकाकर्ता निर्माण के लिए सक्षम पर्यावरणीय/मॉनिटरिंग अथॉरिटी की आवश्यक स्वीकृति साबित नहीं कर सके। रिकॉर्ड पर मौजूद निरीक्षण सामग्री में भी पर्याप्त उल्लंघन सामने आए।
क्या है पूरा मामला?
अयूब मौलाना सहित याचिकाकर्ताओं ने मामले में होटल/रिसॉर्ट और अन्य निर्माण को लेकर उदयपुर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि कुछ संपत्तियां ईको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना से पहले से अस्तित्व में थीं और उनके पास विभिन्न सरकारी विभागों की मंजूरियां, पट्टे और अन्य दस्तावेज मौजूद थे।
याचिकाकर्ता की ओर से विशेष रूप से दावा किया गया कि उसका रिसॉर्ट वर्ष 2009 से संचालित था और बाद में केवल मौजूदा रिसॉर्ट के विस्तार के लिए आवेदन किया गया था।
यह भी तर्क दिया गया कि प्राधिकरण ने आवेदन पर समय पर निर्णय नहीं लिया, इसलिए UDA Act के तहत डीम्ड परमिशन का लाभ मिला।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि उनके निर्माण को नया होटल या रिसॉर्ट मानने के बजाय पहले से मौजूद प्रतिष्ठान का विस्तार माना जाना चाहिए।
वहीं, दूसरी ओर UDA ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सामान्य विकास कानून के तहत मिली अनुमति या डीम्ड परमिशन का इस्तेमाल विशेष पर्यावरणीय प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
‘पुराना रिसॉर्ट’ होने से नए निर्माण की छूट नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जमीन पर पहले से होटल या रिसॉर्ट मौजूद होने मात्र से भविष्य में किए जाने वाले हर निर्माण या विस्तार का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
बाद में किए गए प्रत्येक निर्माण को उस समय लागू कानून और आवश्यक अनुमतियों के आधार पर परखा जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि Kanha Hotels and Spa Pvt. Ltd. के फैसले पर याचिकाकर्ताओं की निर्भरता उचित नहीं है, क्योंकि उस मामले में परिस्थितियां अलग थीं और वहां आवश्यक वैधानिक अनुमतियों की निरंतर श्रृंखला मौजूद थी। वर्तमान मामले में ऐसी स्थिति नहीं थी।
डीम्ड परमिशन पर्यावरणीय रोक को खत्म नहीं कर सकती
फैसले में कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि डीम्ड परमिशन का सिद्धांत केवल उसी सीमा तक काम कर सकता है, जहां संबंधित कानून इसकी अनुमति देता है।
इसे ऐसी गतिविधि को वैधता देने के लिए नहीं फैलाया जा सकता, जिस पर किसी विशेष पर्यावरणीय व्यवस्था के तहत रोक हो।
अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि निर्माण में भारी निवेश किया जा चुका है या निर्माण काफी आगे बढ़ चुका है, याचिकाकर्ता को उसे जारी रखने का कोई निहित अधिकार (vested right) नहीं देता। बिना सभी जरूरी मंजूरियां हासिल किए निर्माण करने वाला व्यक्ति अपने जोखिम पर ऐसा करता है।
पर्यावरण संरक्षण के आगे निजी व्यावसायिक हित गौण
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 48-A का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
हाईकोर्ट ने precautionary principle का हवाला देते हुए कहा कि पर्यावरणीय नुकसान होने के बाद उसकी भरपाई करने के बजाय कानून का उद्देश्य ऐसे नुकसान को पहले से रोकना है।
सुनवाई का पर्याप्त अवसर मिलने की कोर्ट की राय
याचिकाकर्ताओं की ओर से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि याचिकाकर्ता को नोटिस दिया गया था, उसने जवाब दाखिल किया और उस जवाब पर विचार करने के बाद UDA Act, 2023 की धारा 32 के तहत आदेश पारित किया गया।
सीलिंग और डेमोलिशन की कार्रवाई में दखल नहीं
फैसले के निष्कर्ष में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता निर्माण जारी रखने का कोई लागू करने योग्य कानूनी अधिकार स्थापित नहीं कर सके।
कोर्ट ने उदयपुर की UDA की कार्रवाई में कोई ऐसी गंभीर कानूनी त्रुटि नहीं पाई, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।
इसके साथ ही अदालत ने सभी संबंधित रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और सीलिंग तथा अनधिकृत निर्माण को ध्वस्त करने संबंधी कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
UDA को कानून के अनुसार आदेश लागू करने की स्वतंत्रता दी गई है, हालांकि जहां किसी अन्य वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक हो, उसका पालन करना होगा।
