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नाबालिग की सहमति कानूनन बचाव नहीं, राजस्थान हाईकोर्ट ने रेप केस में दोषसिद्धि रखी बरकरार; उम्रकैद को 20 साल में बदला

Rajasthan High Court Upholds Conviction in Minor Rape Case, Reduces Life Term to 20 Years

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पोक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए 12 साल की बच्ची से दुष्कर्म के दोषी की उम्रकैद की सजा घटाकर 20 साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दी।

दोषी की सजा में यह बदलाव उसकी उम्र, सामाजिक और पारिवारिक स्थिति समेत सुधार की संभावना को देखते हुए किया गया है। हालांकि, कोर्ट ने दोषी को बरी करने से इनकार करते हुए उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी है।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की बेंच ने आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के अपराध में दी गई 20 साल की कठोर कैद में किसी तरह की छूट नहीं मिलेगी।

आरोपी की ओर से अधिवक्ता राज कुमार कसाना ने पक्ष रखा। राज्य की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अमित पुनिया और शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता विजय सिंह शेखावत ने पैरवी की।

12 साल की बच्ची को घर से ले जाने और रेप का है आरोप

यह मामला जयपुर जिले के फागी थाना इलाके का है। आरोप है कि 4 मई 2018 को गणेश बैरवा नाबालिग को अपने साथ ले गया था।

अगले दिन बच्ची के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने IPC की धारा 363 और 366 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

ट्रायल के दौरान आरोपी के खिलाफ 9 गवाह पेश किए गए। जिसके बाद जयपुर जिला POCSO कोर्ट ने 28 जनवरी 2020 को आरोपी गणेश बैरवा को IPC की धारा 363, 366, 376(2)(n), 376AB और POCSO एक्ट की धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।

ट्रायल कोर्ट ने दुष्कर्म का दोषी मानते हुए बैरवा को बाकी पूरी जिंदगी जेल में बिताने यानी उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

आरोपी ने सहमति से साथ जाने की दलील दी

हाईकोर्ट में दोषी की ओर से दलील दी गई कि उसे झूठा फंसाया गया है और गवाहों के बयान में अंतर होने का दावा किया।

दोषी बैरवा ने कहा कि बच्ची अपनी मर्जी से उसके साथ घर से गई थी और भंकरोटा में उसके साथ किराए के मकान में रह रही थी। ऐसे में यह सहमति का मामला था।

इसी आधार पर बैरवा ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर उसे बरी करने की मांग की। वहीं राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने दोषसिद्धि को सही बताते हुए अपील खारिज करने की मांग की।

नाबालिग की सहमति कानून में मायने नहीं रखती- हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने स्कूल सर्टिफिकेट, स्कॉलर रजिस्टर और एडमिशन फॉर्म के आधार पर पीड़िता की उम्र की जांच की। रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि 3 अक्टूबर 2006 दर्ज थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय बच्ची की उम्र करीब 12 साल थी। ऐसे में आरोपी की यह दलील स्वीकार नहीं की जा सकती कि वह अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर नाबालिग ने सहमति भी दी हो, तब भी उसकी सहमति कानून की नजर में मायने नहीं रखती।

हाईकोर्ट ने बच्ची की गवाही को भरोसेमंद माना

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्ची की गवाही को सिर्फ उसकी उम्र के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, ऐसी गवाही को सावधानी से परखना जरूरी है और यह देखना चाहिए कि बच्चा किसी के सिखाने पर बयान तो नहीं दे रहा।

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने मजिस्ट्रेट और कोर्ट सामने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म के स्पष्ट आरोप लगाए थे। जिरह के दौरान उसका बयान कमजोर नहीं पड़ा।

मेडिकल जांच में भी डॉक्टर ने पीड़िता के हाइमन के फटे होने की बात कही थी। कोर्ट ने इसे अहम सबूत माना।

गवाहों के बयानों में विरोधाभास की दलील पर कोर्ट ने कहा कि ये अंतर मामूली थे। घटना के काफी समय बाद किसी व्यक्ति के लिए पूरी घटना को वैसे ही दोहराना संभव नहीं होता। ऐसे छोटे अंतरों के आधार पर गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।

आरोपी पेश नहीं कर सका बेगुनाही के सबूत

फैसले में हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 29 का भी हवाला दिया। इसके तहत, अभियोजन पक्ष जरूरी बातें साबित कर दे तो कानून आरोपी को दोषी मानकर चलता है। लेकिन आरोपी को इस अनुमान को गलत साबित करना होता है।

इस मामले में पीड़ित पक्ष ने अपराध से जुड़े जरूरी तथ्य साबित कर दिए थे। लेकिन आरोपी ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दे पाया, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर होता।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर ही आरोपी को दोषी ठहराया था। इसलिए हाईकोर्ट को इस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।

20 साल की उम्र और आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने पर घटाई सजा

सजा के सवाल पर आरोपी के वकील ने कहा कि घटना के समय उसकी उम्र करीब 20 साल थी और वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आता है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। इसी आधार पर अधिकतम सजा को कम करने की मांग की।

फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों पर विचार करते हुए दोषी के सुधरने और पुनर्वास की संभावना पर भी ध्यान दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी घटना के समय युवा था। उसके खिलाफ कोई आपराधिक पृष्ठभूमि या आदतन अपराधी होने का तथ्य रिकॉर्ड पर नहीं था।

साथ ही सरकारी पक्ष यह भी साबित नहीं कर पाया कि आरोपी में सुधार या पुनर्वास की संभावना नहीं है।

उम्रकैद की सजा बदली, दोषसिद्धि बरकरार

इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी उम्रकैद की सजा को 20 साल के कठोर कारावास में बदलने का फैसला सुनाया।

हालांकि हाईकोर्ट ने अपहरण और शादी के लिए मजबूर करने से संबंधित अपराधों में ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई सजा बरकरार रखी।

इस तरह कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए केवल सजा में बदलाव किया और उसकी अपील आंशिक रूप से मंजूर कर ली।

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