टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

बीमारी छिपाने का आरोप साबित नहीं कर सकी LIC, राजस्थान हाईकोर्ट ने बीमा क्लेम देने का दिया आदेश; 6% ब्याज भी देना होगा

Rajasthan High Court Rejects LIC Appeals, Upholds Insurance Claim and 6% Interest

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जीवन बीमा पॉलिसी के 31 साल पुराने मामले में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को बड़ा झटका देते हुए 1995 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर दोनों अपीलें खारिज कर दिया।

बीमा कंपनी का आरोप था कि पॉलिसी लेते समय महिला ने अपनी बीमारी से जुड़ी जरूरी जानकारी छिपाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों के आधार पर इस आरोप को साबित नहीं माना।

जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित ने माना कि बीमा कंपनी पॉलिसी लेते समय बीमारी छिपाने का आरोप कोर्ट में साबित नहीं कर पाई।

वहीं, पॉलिसीधारक के पति मंगीलाल की ओर से ब्याज दर 6% से बढ़ाकर 12% करने की मांग भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसके तहत मंगीलाल शर्मा को बीमा राशि और 6% सालाना ब्याज देने का आदेश दिया गया था।

मंगीलाल शर्मा की ओर से अधिवक्ता दिलीप कावड़िया, जे.एल. पुरोहित और राजीव पुरोहित पेश हुए। वहीं, LIC की ओर से भी अधिवक्ता दिलीप कावड़िया, जे.एल. पुरोहित और राजीव पुरोहित के नाम आदेश में दर्ज हैं।

यह भी पढ़ें: 27 साल से नौकरी कर रहे Ad-hoc डॉक्टर को मिलेगा पूरा सेवा लाभ, राजस्थान हाईकोर्ट ने 1999 से सेवा गिनने के दिए आदेश, सरकार को 8 सप्ताह का समय

पत्नी की मौत के बाद पति ने मांगा था बीमा क्लेम

मामला उदयपुर निवासी मंगीलाल शर्मा और LIC के बीच विवाद से जुड़ा है। मांगीलाल की पत्नी नंदूबाई ने LIC के चित्तौड़गढ़ शाखा कार्यालय से 3 जीवन बीमा पॉलिसियां ली थीं।

ये पॉलिसियां 28 मई 1986 को 40 हजार रुपये, 28 जुलाई 1986 को 35 हजार रुपये और 28 जून 1987 को 50 हजार रुपये की थीं। इस तरह कुल बीमा राशि 1.25 लाख रुपये थी।

नंदूबाई के जिंदा रहने के दौरान इनका प्रीमियम भी जमा किया गया था। लेकिन नंदूबाई की 14 अगस्त 1989 को मौत हो गई।

इसके बाद पति ने तीनों पॉलिसियों के आधार पर बोनस समेत कुल 1,52,150 रुपये का क्लेम किया।

यह भी पढ़ें: हिरासत के 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश करना जरूरी, देरी पर पुलिस को करनी होगी तत्काल रिहाई; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं, हिरासत से शुरू होगी समयसीमा

LIC ने बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर रोक दिया भुगतान

वहीं LIC ने क्लेम देने से इनकार कर दिया। कंपनी का कहना था कि पॉलिसी लेते समय नंदूबाई ने अपने स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी नहीं दी थी।

खास तौर पर बीमा कंपनी ने थायराइड की बीमारी और उससे जुड़े तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया गया।

बीमा कंपनी ने दलील दी कि यदि नंदूबाई स्वास्थ्य संबंधी सवालों का सही जवाब देतीं, तो पॉलिसी जारी करने से पहले उनके आवेदन पर अलग तरीके से विचार किया जाता।

इसी आधार पर LIC ने बीमा कानून की धारा 45 के तहत पॉलिसियां रद्द करने और क्लेम नहीं देने का फैसला किया।

दूसरी ओर, मांगीलाल का कहना था कि उनकी पत्नी ने कोई तथ्य नहीं छिपाया था। मंगीलाल ने कंपनी के इस फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

यह भी पढ़ें: कांस्टेबल (बैंड) भर्ती में 40% अंकों की अनिवार्यता पर हाईकोर्ट की रोक! महिला अभ्यर्थी को राहत, मेरिट के आधार पर नियुक्ति पर विचार के निर्देश

ट्रायल कोर्ट ने बीमा राशि और ब्याज देने का दिया था आदेश

उदयपुर की ट्रायल कोर्ट ने 26 सितंबर 1995 को मंगीलाल के पक्ष में फैसला सुनाया था।

ट्रायल कोर्ट ने मंगीलाल को 1,64,702 रुपये देने का आदेश दिया था। इसके साथ ही 10 जनवरी 1991 से भुगतान होने तक 6% सालाना साधारण ब्याज देने को कहा था।

इस फैसले से असंतुष्ट होकर दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुंचे। मंगीलाल ने ब्याज दर 6% से बढ़ाकर 12% करने की मांग की, जबकि LIC ने बीमा क्लेम और ब्याज देने के फैसले को चुनौती दी।

मेडिकल जांच और गवाहों की बात पर हाईकोर्ट ने किया गौर

हाईकोर्ट ने मामले में बीमा कंपनी के गवाहों और मेडिकल जांच से जुड़े तथ्यों पर गौर किया। कोर्ट के सामने यह बात आई कि बीमा एजेंट ने आवेदन भरते समय नंदूबाई से स्वास्थ्य संबंधी सवाल पूछे थे।

हालांकि, गवाही में यह भी सामने आया कि नंदूबाई की जांच के दौरान थायराइड की स्थिति की जांच ठीक से नहीं की गई थी।

बीमा कंपनी के डॉक्टर की जिम्मेदारी थी कि वह जरूरी मेडिकल जांच करे। लेकिन डॉक्टर ने भी बीमारी से जुड़े कुछ जरूरी पहलुओं को नहीं देखा था।

हाईकोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी की ओर से पेश सबूत यह साबित करने के लिए काफी नहीं थे कि नंदूबाई ने जानबूझकर बीमारी छिपाई थी। केवल आरोप के आधार पर बीमा क्लेम से इनकार नहीं किया जा सकता।

बीमारी छिपाने का आरोप साबित नहीं, LIC की अपील खारिज

हाईकोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी की ओर से पेश साक्ष्यों से यह साबित नहीं हुआ कि नंदूबाई ने पॉलिसी लेते समय जानबूझकर जरूरी तथ्य छिपाए थे।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि बीमा कानून की धारा 45 के तहत पॉलिसियां रद्द करने का आधार साबित नहीं हुआ। ऐसे में LIC की ओर से बीमा क्लेम खारिज करना सही नहीं था।

ब्याज 6 प्रतिशत ही रहेगा, दोनों अपीलें खारिज

मंगीलाल ने 6 प्रतिशत सालाना ब्याज को बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे भी स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामला व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा नहीं था और अधिक ब्याज देने के समर्थन में बाजार दर के आधार पर जरूरी सबूत भी पेश नहीं किए गए थे।

जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित ने मंगीलाल और LIC, दोनों की अपीलें खारिज कर दीं। इसके साथ ही 26 सितंबर 1995 का ट्रायल कोर्ट का फैसला और डिक्री बरकरार रही।

यानी LIC को बीमा राशि और 6 प्रतिशत सालाना ब्याज का भुगतान करना होगा, जबकि मंगीलाल को ब्याज दर 12 प्रतिशत कराने की मांग पर राहत नहीं मिली।

सबसे अधिक लोकप्रिय