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27 साल से नौकरी कर रहे Ad-hoc डॉक्टर को मिलेगा पूरा सेवा लाभ, राजस्थान हाईकोर्ट ने 1999 से सेवा गिनने के दिए आदेश, सरकार को 8 सप्ताह का समय

Rajasthan High Court Directs State to Count Ad-hoc Doctor’s Service from 1999

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने Ad-hoc नियुक्ति पर लंबे समय से काम कर रहे डॉक्टर की सेवा से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने डॉ. योगेंद्र तनेजा की 12 नवंबर 1999 से की गई सेवा को सभी सेवा लाभों के लिए गिनने का आदेश दिया है।

जस्टिस कुलदीप माथुर ने बीकानेर में डिप्टी चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर (फैमिली वेलफेयर) के पद पर कार्यरत डॉ. तनेजा की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर इस संबंध में आदेश जारी करने को कहा है।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता तनुज जैन ने एडिशनल गवर्नमेंट काउंसिल मुकेश दवे की ओर से पक्ष रखा।

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डॉक्टर ने 1999 से सेवा गिनने की मांग की

डॉ. योगेंद्र तनेजा की नियुक्ति 12 नवंबर 1999 को अस्थायी यानी Ad-hoc आधार पर हुई थी।

उनका कहना था कि शुरुआती नियुक्ति अस्थायी या एडहॉक आधार पर होने के बावजूद उन्होंने विभाग में नियमित पद से जुड़े काम किए।

उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि उनकी सेवा की गणना शुरुआती नियुक्ति की तारीख से की जाए।

डॉक्टर का कहना था कि उनकी शुरुआती सेवा को वरिष्ठता, वेतन और अन्य सेवा लाभों के लिए गिना जाना चाहिए। उन्होंने पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए समान लाभ देने की मांग की।

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सरकार ने पहले के फैसलों का दिया हवाला

राज्य सरकार की ओर से पुराने फैसले डॉ. परितोष उज्ज्वल के मामले का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया गया।

सरकार का कहना था कि भर्ती के लिए चयन समिति बनाई गई थी, जबकि डॉ. तनेजा के मामले में उम्मीदवारों को विज्ञापन के जरिए आवेदन करने और दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था।

इसलिए दोनों मामलों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. तनेजा के मामले में भी भर्ती प्रक्रिया कानून के अनुसार पूरी की गई थी। दोनों मामलों में ऐसा कोई बड़ा अंतर नहीं है, जिसके आधार पर उन्हें पहले दिए गए लाभ से वंचित रखा जाए।

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पहले के मामलों में भी Ad-hoc सेवा को माना गया- हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने डॉ. परितोष उज्ज्वल और डॉ. दिनेश कुमार सोनी से जुड़े पुराने दोनों फैसलों का जिक्र किया।

डॉ. परितोष उज्ज्वल के मामले में राज्य सरकार की अपील हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच खारिज कर चुकी थी। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर SLP और उसकी समीक्षा याचिका भी खारिज हो गई थीं।

उस मामले में कोर्ट ने माना था कि डॉक्टरों की नियुक्ति खाली पदों पर हुई थी और भर्ती के लिए स्क्रीनिंग कमेटी के जरिए प्रक्रिया अपनाई गई थी। उन्हें वेतनमान, इंक्रीमेंट और अन्य भत्ते भी दिए जा रहे थे। ऐसे में उनकी शुरुआती सेवा को नजरअंदाज करना उचित नहीं था।

उस मामले में राज्य सरकार को शुरुआती नियुक्ति की तारीख से सेवा की निरंतरता का लाभ देने के आदेश दिए गए थे।

डॉक्टर को सभी सर्विस बेनिफिट देने के आदेश

हाईकोर्ट ने माना कि डॉ. तनेजा का मामला पहले के मामलों से मिलता-जुलता है। ऐसे में उन्हें भी उन मामलों में दिए गए सेवा लाभ मिलने चाहिए।

इसी आधार पर कोर्ट ने डॉ. तनेजा की याचिका स्वीकार कर ली।

राज्य सरकार और संबंधित विभागों को आदेश दिया कि डॉ. तनेजा की सेवा 12 नवंबर 1999 से गिनी जाए और उन्हें सभी सेवा लाभों के लिए सेवा निरंतरता का लाभ दिया जाए।

राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर इस संबंध में उचित आदेश जारी करना होगा।

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