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सुप्रीम कोर्ट का सवाल: कटऑफ पार करने पर दिव्यांगों को आरक्षित क्यों माना जाए?

नई दिल्ली 13 सितंबर

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि जब कोई दिव्यांग उम्मीदवार सामान्य (अनारक्षित) वर्ग की कटऑफ अंक सीमा पार कर लेता है, तो भी उसे केवल ‘आरक्षित वर्ग’ में ही क्यों गिना जाता है।

अदालत ने कहा कि यह न केवल उम्मीदवार की मेहनत और योग्यता को कमतर आंकता है, बल्कि आरक्षण की असली भावना के भी विपरीत है।

कोर्ट का यह सवाल उन लाखों युवाओं के पक्ष में है जो चाहते हैं कि उनकी पहचान उनकी मेहनत और योग्यता से हो, न कि उनकी शारीरिक स्थिति से।

अदालत की टिप्पणी

सुनीता भंडारे फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा— “आरक्षण का मकसद अवसर उपलब्ध कराना है, पहचान छीनना नहीं।

यदि कोई उम्मीदवार बिना किसी रियायत के सामान्य वर्ग की मेरिट सूची में आता है, तो उसे उसी श्रेणी में स्थान मिलना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

अदालत ने केंद्र सरकार से इस व्यवस्था पर 14 अक्टूबर, 2025 तक विस्तृत जवाब माँगा। साथ ही, 8 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों को सुगमता और अवसर समानता परियोजना के तहत 6 माह में अध्ययन रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया-

मामले की अगली सुनवाई अगली सुनवाई मार्च 2026 में होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यही सिद्धांत नौकरी में पदोन्नति पर भी लागू होना चाहिए ताकि दिव्यांग उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर मिल सके।

वर्तमान व्यवस्था की समस्या

मौजूदा नियमों के अनुसार, दिव्यांग उम्मीदवार चाहे सामान्य कटऑफ पार कर लें, उसे आरक्षित कोटे में ही समायोजित किया जाता है। इसका असर दो तरह से होता है—मेहनती और योग्य उम्मीदवार को सामान्य वर्ग की सूची में स्थान नहीं मिलता।

वहीं, अन्य दिव्यांग उम्मीदवार भी अपने आरक्षित अवसर से वंचित हो जाते हैं। यानी यह व्यवस्था उन सभी के साथ अन्याय करती है, जिनके लिए आरक्षण की सुविधा बनाई गई थी।

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