जयपुर, 11 अक्टूबर
Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने चेक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने समय-सीमा पार (time-barred) ऋण के लिए लिखित रूप से चेक जारी किया है, तो वह भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 25(3) के तहत वैध व प्रवर्तनीय देनदारी (legally enforceable debt) मानी जाएगी।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने रतिराम यादव व 5 अन्य आपराधिक निगरानी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने चेक के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि इस तरह का मामला Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का मामला माना जाएगा।
Rajasthan Highcourt ने इसके साथ ही आरोपियों को राहत देने वाले अपीलीय कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बहाल किया है।
बचाव पक्ष की दलील
राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई के दौरान दलील दी गई कि गोपाल शर्मा ने सभी चेक केवल “सुरक्षा (security)” के रूप में दिए थे, जिनका दुरुपयोग किया गया।
बचाव पक्ष ने कहा कि अपीलीय कोर्ट ने यह माना है कि गोपाल शर्मा द्वारा वर्ष 2009 में ऋण लिया गया था, जबकि चेक 2013 के थे। ऐसे में यह ऋण समय-सीमा से बाहर था और इसलिए वह “legally enforceable debt” नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता के तर्क
अधिवक्ता ने बचाव पक्ष की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि अपीलीय कोर्ट ने आरोपी को बरी करने का फैसला पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना दिया है।
अधिवक्ता ने कहा कि बरी किए जाने का आधार केवल यह था कि कथित ऋण समय-सीमा पार (time-barred) था और ऐसा कोई पत्र या लिखित दस्तावेज भी नहीं था जिससे देनदारी कानूनी रूप से प्रवर्तनीय (legally enforceable debt) मानी जा सके।
अधिवक्ता ने कहा कि यदि कोई देनदार लिखित रूप में एवं अपने हस्ताक्षर से समय-सीमा पार ऋण (time-barred debt) का भुगतान करने का वचन देता है, तो वह वचन एक वैध एवं प्रवर्तनीय अनुबंध (valid and enforceable contract) माना जाएगा।
समय-सीमा पार ऋण के भुगतान हेतु जारी किया गया चेक भी इस श्रेणी में आता है। अतः केवल इस आधार पर आरोपी को बरी करना विधिसम्मत नहीं है।
अगर दिए गए चेक को अस्वीकार किया जाता है तो यह व्यापारिक भरोसे को समाप्त करता है।
हाईकोर्ट का फैसला
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद फैसला सुनाते हुए कहा —
“जब कोई व्यक्ति स्वयं हस्ताक्षरित चेक जारी करता है, तो यह माना जाएगा कि उसने अपनी देनदारी को स्वीकार किया है। यदि वह देनदारी पहले समय-सीमा से बाहर भी हो, तो धारा 25(3) के अंतर्गत यह एक ‘लिखित और हस्ताक्षरित वचन’ बन जाता है, जो वैध है।”
हाईकोर्ट ने कहा —
“खाली या सुरक्षा के तौर पर दिए गए चेक भी अभियुक्त के हस्ताक्षर होने पर वैध माने जाएंगे। एक बार चेक जारी करने के बाद देनदारी को नकारा नहीं जा सकता।”
हाईकोर्ट ने A.V. Murthy v. B.S. Nagabasavanna (2002), S. Natarajan v. Sama Dharman (2021) तथा Bir Singh v. Mukesh Kumar (2019) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समय-सीमा पार ऋण के लिए दिया गया चेक “legally enforceable debt” की श्रेणी में आएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि “समय-सीमा पार देनदारी के लिए भी यदि देनदार स्वेच्छा से लिखित चेक जारी करता है, तो वह उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई से मुक्त नहीं रह सकता।”
फैसला बरकरार
Rajasthan Highcourt ने इस मामले में अपीलीय कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
इस मामले में आरोपी गोपाल शर्मा की निगरानी याचिकाएँ खारिज कर दी गईं, वहीं शिकायतकर्ता रतिराम यादव की याचिकाएँ स्वीकार की गईं।
ट्रायल कोर्ट द्वारा चेक बाउंस मामले में दी गई सजा को भी बहाल कर दिया गया है।
ये हैं पूरा मामला
याचिकाकर्ता रतिराम यादव ने आरोपी गोपाल शर्मा को वर्ष 2009 में उधार राशि दी थी।
इस उधार के बदले में आरोपी गोपाल शर्मा ने वर्ष 2013 के ₹1,25,000/- के चार चेक बीकानेर और जयपुर बैंक, मुरलीपुरा शाखा, जयपुर के दिए।
रतिराम द्वारा ये चेक बैंक में पेश किए जाने पर खाते में राशि नहीं होने के चलते चेक बाउंस हो गए।
रतिराम यादव की शिकायत पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी गोपाल शर्मा को चेक बाउंस का दोषी मानते हुए जयपुर की अदालत में सजा का ऐलान किया।
आरोपी ने जयपुर की अदालत के फैसले को अपीलीय कोर्ट में चुनौती दी, जहां अपीलीय कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।
अपील कोर्ट के फैसले के खिलाफ परिवादी रतिराम ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।