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अनिल अंबानी को Rajasthan Highcourt से बड़ी राहत, बिना आधार अभियोजन स्वीकृति और कोर्ट प्रसंज्ञान आदेश रद्द

जयपुर, 14 अक्टूबर।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में Reliance Infrastructure Limited (पूर्व में बी.एस.ई.एस. लिमिटेड) और इसके नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन अनिल अंबानी सहित एक अन्य को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दायर मामलों को समाप्त कर दिया है।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने अनिल अंबानी, ओंकार रावत और Reliance Infrastructure Limited के खिलाफ अतिरिक्त श्रम आयुक्त जयपुर द्वारा 9 जून 2017 को जारी आदेश तथा जयपुर की मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पारित प्रसंज्ञान आदेश — दोनों को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दी गई अभियोजन स्वीकृति और उसके आधार पर लिया गया प्रसंज्ञान आदेश “बिना विचार और विधिक आधार” के जारी किए गए थे। इसलिए दोनों आदेशों को निरस्त किया जाता है।

न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि किसी मामले में संज्ञान (Cognizance) बिना उचित विचार और तथ्यों के लिया गया हो, तो वह न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसे मामलों को जारी रखना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।

जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि “ऐसी कार्यवाही यदि जारी रहने दी जाए तो यह न्याय का गंभीर हनन होगा।” इसलिए, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्याय के हित में हस्तक्षेप किया।

अदालत ने टिप्पणी की कि इस प्रकार की कार्यवाही न्याय प्रणाली पर अनावश्यक भार डालती है और निर्दोष व्यक्तियों के लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बनती है।

अनिल अंबानी की दलीलें

मामले में याचिकाकर्ता अनिल अंबानी, ओंकार रावत और Reliance Infrastructure Limited का कहना था कि उन्हें एक ऐसे फौजदारी मुकदमे में फंसाया गया, जो न तो कानून के अनुसार बनता है और न ही तथ्यों पर आधारित है।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह संज्ञान और अभियोजन स्वीकृति पूर्णतया अवैध और मशीनी रूप से पारित किए गए हैं, जबकि लेबर कोर्ट के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि बी.एस.ई.एस. लिमिटेड का इस मामले में कोई दायित्व नहीं है।

उन्होंने कहा कि कानूनी दायरे से बाहर होने के बावजूद अधिकारियों को मुकदमे में फंसाया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

पूरा मामला जयपुर के ज्योति नगर निवासी शंभूसिंह से जुड़ा है, जिन्हें बी.एस.ई.एस. लिमिटेड से निकाले जाने के बाद विवाद उत्पन्न हुआ था।

बी.एस.ई.एस. लिमिटेड में चपरासी के पद पर कार्यरत शंभूसिंह ने अपनी सेवा समाप्ति को अवैध बताते हुए लेबर कोर्ट में मामला दर्ज कराया था।

वर्ष 1999 में दर्ज हुए इस मुकदमे के दौरान शंभूसिंह और एम/एस ट्रानसेक्स सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत उन्हें दिल्ली कार्यालय में पुनः नियुक्ति दी जानी थी। शंभूसिंह ने अपने बकाया वेतन की मांग छोड़ने पर सहमति जताई और यह भी तय हुआ कि उनका बी.एस.ई.एस. लिमिटेड से कोई संबंध नहीं रहेगा।

हालांकि, वर्ष 2004 में ट्रानसेक्स सर्विसेज ने दोबारा शंभूसिंह की सेवाएं समाप्त कर दीं। इसके बाद उन्होंने 2005 में एक नया मुकदमा दायर किया।

लेबर कोर्ट प्रथम, जयपुर ने वर्ष 2015 में अपना एवार्ड सुनाते हुए स्पष्ट किया कि शंभूसिंह और बी.एस.ई.एस. लिमिटेड के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है, बल्कि विवाद केवल ट्रानसेक्स सर्विस प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित है।

प्रसंज्ञान आदेश और हाईकोर्ट की टिप्पणी

इसके बावजूद, 9 जून 2017 को अतिरिक्त श्रम आयुक्त जयपुर ने Reliance Infrastructure Limited और अनिल अंबानी के खिलाफ लेबर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना के आरोप में अभियोजन स्वीकृति दे दी।
इसके आधार पर 11 सितंबर 2017 को मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट, जयपुर ने उनके खिलाफ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 29 सहपठित धारा 34 के तहत प्रसंज्ञान लिया।

हाईकोर्ट ने इन आदेशों को न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए कहा —
जब एवार्ड में बी.एस.ई.एस. लिमिटेड के खिलाफ कोई आदेश ही नहीं था, तो अभियोजन स्वीकृति या संज्ञान लेने का कोई औचित्य नहीं बनता।

अदालत ने माना कि यह कार्यवाही अनुचित, अवैध और न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है, जो निर्दोष व्यक्तियों के लिए अनावश्यक उत्पीड़न का कारण बनती है।

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