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आयु निर्धारण के लिए अस्थि परीक्षण केवल अंतिम विकल्प, यह निर्णायक साक्ष्य नहीं होता, पॉक्सो कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई करने के आदेश -Rajasthan Highcourt

JUSTICE ANOOP KUMAR DHAND

जयपुर, 25 अक्टूबर

Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने जुवेनाइल बनाम राज्य सरकार मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा है कि आयु निर्धारण के लिए अस्थि परीक्षण Ossification test केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए, क्योंकि यह निर्णायक साक्ष्य नहीं होता।

Rajasthan Highcourt ने Special Judge, POCSO Act, No.3, Jaipur Metropolitan-II की अदालत को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता के मामले की पुनः सुनवाई करने के बाद नया आदेश जारी करे।

Rajasthan Highcourt ने कहा कि पॉक्सो कोर्ट को तकनीकी आधार पर आवेदन खारिज करने के बजाय, याचिकाकर्ता की आयु के उचित निर्धारण हेतु मूल अभिलेख (रिकॉर्ड) तथा संबंधित सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापक को तलब करना चाहिए था

Rajasthan Highcourt ने कहा कि अधीनस्थ अदालत ने यह नहीं किया और ऐसा न करने में गलती की है।

यह है मामला

यह मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा है, जिसने यह दावा किया कि अपराध के समय वह 18 वर्ष से कम आयु का (नाबालिग) था, जबकि पुलिस और अभियोजन पक्ष ने उसे वयस्क मानते हुए चार्जशीट दाखिल की थी।

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के कटेला बाज़ार निवासी आरोपी के खिलाफ जयपुर के वैशाली नगर थाने में 21 नवंबर 2024 को एक नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने का मामला दर्ज किया गया था।

आरोपी ने अपने बचाव में पॉक्सो कोर्ट के समक्ष दावा किया कि उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2009 है, इस प्रकार अपराध के समय वह केवल 15 वर्ष का था।

उसने अदालत में अपने स्कूल रिकॉर्ड और ग्राम पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र को साक्ष्य के रूप में पेश किया।

लेकिन जयपुर महानगर पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने आरोपी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि दस्तावेजों की विश्वसनीयता संदिग्ध है और आधार कार्ड व अस्थि-परीक्षण (Ossification Test) से उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष पाई गई है।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपी याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु कुमार शर्मा ने हाईकोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत ने बिना उचित जांच के आवेदन खारिज कर दिया और स्कूल प्रमाणपत्रों की सत्यता की पुष्टि के लिए प्रधानाध्यापक को गवाही हेतु नहीं बुलाया

अधिवक्ता ने कहा कि अस्थि-परीक्षण (Ossification Test) से आयु का केवल अनुमान लगाया जाता है, यह निर्णायक साक्ष्य नहीं है।

सरकार का पक्ष

मामले की सुनवाई के दौरान Addl. GA-cum-PP अमित पुनिया और दीनदयाल शर्मा ने सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया।

लोक अभियोजक ने कहा कि आरोपी का आधार कार्ड वर्ष 2017 में बना था, जिसमें उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2005 दर्ज है, और इस प्रकार वह अपराध के समय वयस्क था।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि मेडिकल रिपोर्ट में आरोपी की उम्र लगभग 20 वर्ष पाई गई है।

हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने कहा कि —

“आयु निर्धारण के लिए अस्थि परीक्षण केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए, क्योंकि यह निर्णायक साक्ष्य नहीं होता।”

Rajasthan Highcourt ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रिशिपाल सिंह सोलंकी बनाम उत्तर प्रदेश तथा पी. युवाप्रकाश बनाम राज्य का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि —

“यदि स्कूल या जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध हों तो उन्हें प्राथमिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, न कि सीधे मेडिकल रिपोर्ट पर निर्भर रहना चाहिए।”

Rajasthan Highcourt ने कहा कि पॉक्सो कोर्ट ने तकनीकी आधार पर आवेदन खारिज कर गलती की है। अदालत को चाहिए था कि वह सरकारी प्राथमिक विद्यालय, कटेला ग्रांट (उत्तर प्रदेश) से मूल रिकॉर्ड तलब करती और प्रधानाध्यापक को गवाही के लिए बुलाती।

तीन माह में दोबारा सुनवाई का आदेश

बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पॉक्सो कोर्ट को निर्देश दिया कि तीन माह के भीतर स्कूल के मूल रिकॉर्ड और प्रधानाध्यापक का बयान लेकर आरोपी की आयु का पुनर्निर्धारण करे और उसके बाद नया आदेश पारित करे।

Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों से संबंधित मामलों में मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी कहा कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 94(2) में स्पष्ट है कि

“आयु निर्धारण के लिए सबसे पहले स्कूल या मैट्रिक प्रमाणपत्र की जांच की जाए, उसके बाद जन्म प्रमाणपत्र और अंत में इन साक्ष्यों की अनुपलब्धता की स्थिति में मेडिकल परीक्षण किया जाए।”

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