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दस्तावेज़ रोककर छात्रों से फीस वसूलना असंवैधानिक, राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) को कड़ी फटकार, अगले एक दिन में तत्काल छात्रा के मूल प्रमाणपत्र लौटाने के आदेश

Rajasthan High Court Slams JNU Medical College for Withholding Student’s Original Certificates, Orders Immediate Return Within 24 Hours

5 दिसंबर को याचिकाकर्ता छात्रा की दिल्ली पर्ल यूनिवर्सिटी में परीक्षा, हाईकोर्ट ने 3 दिसंबर को आदेश देते हुए कहा कि तत्काल या अगले दिन 4 दिसंबर को मूल प्रमाणपत्र सौंप दे

जयपुर, 4 दिसंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों द्वारा फीस वसूलने के लिए छात्रों के दस्तावेज़ों को रोककर हथियार बनाने को बेहद गंभीर मानते हुए इसे असंवैधानिक बताया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर की एक छात्रा के मूल दस्तावेज़ वापस नहीं करने के मामले में यूनिवर्सिटी को कड़ी फटकार लगाते हुए तत्काल याचिकाकर्ता छात्रा के मूल दस्तावेज़ लौटाने के आदेश दिए हैं।

Justice Anuroop Singhi की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल फैसले के जरिए स्पष्ट रूप से कहा कि

किसी भी परिस्थिति में शैक्षणिक संस्थान छात्रों के मूल प्रमाणपत्रों को फीस वसूली का हथियार बनाकर रोक नहीं सकते।

एकलपीठ ने जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) प्रशासन को आदेश दिया है कि विश्वविद्यालय छात्रा के ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) और माइग्रेशन सर्टिफिकेट तत्काल और किसी भी स्थिति में अगले दिन तक लौटाने होंगे।

5 दिसंबर से परीक्षा

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि स्वास्थ्य कारणों से उसे MBBS कोर्स छोड़ना पड़ा और अब उसने दिल्ली की पर्ल यूनिवर्सिटी में डिजाइन कोर्स में दाखिला लिया है।

जहां नई यूनिवर्सिटी की परीक्षाएं 5 दिसंबर से शुरू हो रही हैं और उनमें शामिल होने के लिए मूल दस्तावेज़ जमा करना अनिवार्य है।

दस्तावेज़ न मिलने की स्थिति में उसका नया एडमिशन रुक सकता है और वह परीक्षा भी नहीं दे पाएगी।

याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन साल की फीस पहले ही जमा की जा चुकी है, इसलिए दस्तावेज़ लौटाने से इनकार पूरी तरह गैरकानूनी है। उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि फीस वसूली के लिए संस्थान के पास कानूनी रास्ते मौजूद हैं, लेकिन दस्तावेज़ रोकना छात्रों पर “दबाव की गैरकानूनी नीति” है।

दस्तावेज़ केवल प्रवेश के समय सत्यापन के लिए

याचिकाकर्ता छात्रा ईशिता गुप्ता की ओर से अधिवक्ता पुनीत सिंघवी, श्रद्धा मेहता, आयुष सिंह और इशान वर्मा ने पैरवी करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय ने बिना किसी कानूनी अधिकार के उसके ट्रांसफर सर्टिफिकेट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट अपने पास रोक रखे हैं, जो कि याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत संपत्ति है और जिससे उसका पूरा भविष्य संकट में पड़ गया है।

अधिवक्ताओं ने अदालत से कहा कि विश्वविद्यालय मूल दस्तावेज़ रोकने का अधिकार नहीं रखता क्योंकि किसी भी कानून, नियम, प्रवेश पुस्तिका या संस्थान की गाइडलाइन में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो विश्वविद्यालय को इन दस्तावेज़ों को रोकने का अधिकार देता हो।

अधिवक्ताओं ने कहा कि दस्तावेज़ केवल प्रवेश के समय सत्यापन के लिए जमा किए गए थे, न कि फीस वसूली का साधन बनाने के लिए।

फीस वसूली के लिए कानूनी रास्ते मौजूद

याचिकाकर्ता छात्रा की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि फीस वसूली के लिए कानूनी रास्ते मौजूद हैं, दस्तावेज़ रोकना अवैध है।

इसके बावजूद कि तीन साल की फीस पहले ही जमा की जा चुकी है। यदि विश्वविद्यालय को शेष फीस वसूलनी है, तो उसके लिए सिविल कार्रवाई, रिकवरी, नोटिस आदि कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं।

अधिवक्ताओं ने कहा कि जब तीन वर्षों की फीस जमा है और कोर्स छोड़ने का कारण स्वास्थ्य है, तब दस्तावेज़ रोकने का कोई आधार नहीं बचता।

अधिवक्ताओं ने अन्य हाईकोर्ट्स के फैसलों — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के Sukhmanpreet Singh केस, Monika vs. PT BD Sharma केस और मद्रास हाईकोर्ट — M. Kesavan केस का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी बकाया शुल्क के कारण मूल दस्तावेज़ नहीं रोके जा सकते।

याचिकाकर्ता की दलील थी कि इन तीनों फैसलों में एक ही बात दोहराई गई है — “मूल दस्तावेज़ रोकना पूरी तरह गैर-कानूनी है।”

यूनिवर्सिटी की दलील: “संपूर्ण कोर्स की फीस वसूलने का अधिकार”

जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया कि प्रवेश के समय छात्रा और उसके अभिभावकों से लिया गया शपथ-पत्र स्पष्ट करता है कि फीस किसी भी परिस्थिति में वापस नहीं होगी।

अगर छात्र कोर्स बीच में छोड़ता है, तो विश्वविद्यालय को यह अधिकार है कि वह शेष कोर्स की फीस बैंक गारंटी (BG) या पोस्ट डेटेड चेक (PDC) के माध्यम से वसूल सके।

यदि दस्तावेज़ लौटा दिए जाते हैं, तो छात्र आसानी से कॉलेज छोड़कर चला जाएगा और संस्थान को फीस वसूली के लिए परेशानी उठानी पड़ेगी।

यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि मेडिकल सीटें सीमित होती हैं और छात्र के जाने के बाद सीट खाली रह जाती है, जिससे वित्तीय नुकसान होता है।

यूनिवर्सिटी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले Islamic Academy of Education vs. State of Karnataka (2003) के अनुसार संस्थानों को कोर्स की फीस वसूलने का अधिकार है।

युनिवर्सिटी की दलील खारिज

हाईकोर्ट की एकलपीठ ने जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) की ओर से दी गयी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि

“किसी भी शैक्षणिक संस्थान को फीस वसूली के लिए छात्र के मूल दस्तावेज़ रोकने का अधिकार नहीं है। राज्य सरकार की प्रवेश पुस्तिका में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। संस्थान फीस वसूली के लिए अन्य विधिक उपाय अपना सकता है, लेकिन दस्तावेज़ रोकना छात्र के करियर को नुकसान पहुँचाने जैसा है।”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि

छात्र के मूल दस्तावेज़ उसकी व्यक्तिगत संपत्ति हैं। किसी भी संस्था को इन पर कोई “लियन” या अधिकार नहीं होता। दस्तावेज़ जमा कराने का उद्देश्य केवल सत्यापन है, न कि उन्हें वसूली का साधन बनाना।

क्या है पूरा मामला

जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU) में अध्ययनरत छात्रा ईशिता गुप्ता ने वर्ष 2022 में MBBS कोर्स में प्रवेश लिया था।

छात्रा ने 2022-23 और 2023-24 में प्रथम व द्वितीय वर्ष की पढ़ाई पूरी की और 2024-25 का शुल्क भी जमा कर दिया था।

स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण उसने कोर्स छोड़ने का निर्णय लिया और बाद में दिल्ली की पर्ल यूनिवर्सिटी में डिजाइन कोर्स में दाखिला ले लिया।

दिल्ली की पर्ल यूनिवर्सिटी ने छात्रा से उसके मूल प्रमाणपत्र मांगे, जिसके बिना 5 दिसंबर से शुरू होने वाली परीक्षाओं में बैठना संभव नहीं था। छात्रा के बार-बार अनुरोध करने के बावजूद विश्वविद्यालय ने दस्तावेज़ लौटाने से मना कर दिया।

इस पर याचिकाकर्ता छात्रा ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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