एडीजे कोर्ट ने चेहरा विकृत मानते हुए सुनाई थी उम्रकैद की सजा, जयपुर ग्रामीण के फूलैरा क्षेत्र में सितंबर 2014 की घटना
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने Acid attack से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा में संशोधन किया है।
जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने Acid attack से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को कम करते हुए भुगती हुई सजा करीब 12 साल 4 माह 16 दिन के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता को एसिड से चोटें जरूर आई थीं, लेकिन अदालत के सामने पेश किए गए मेडिकल साक्ष्य यह साबित नहीं कर पाए कि ये चोटें गंभीर या स्थायी विकृति वाली थीं।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि
अगर चोटें गंभीर और स्थायी साबित होतीं, तो उम्रकैद पूरी तरह उचित होती, लेकिन इस मामले में मेडिकल साक्ष्य उस स्तर तक नहीं पहुंचे।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को Acid attack के लिए दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन सजा में कमी करने का फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध चिकित्सकीय साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं हो पाया कि पीड़िता को Acid attack से गंभीर या स्थायी विकृति वाली चोटें आई थीं।
इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की सजा को अब तक भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।
मामला वर्ष 2014 का
यह मामला वर्ष 2014 का है, जब जयपुर ग्रामीण के फूलैरा क्षेत्र में एक युवती पर Acid attack का आरोप लगाया गया था।
अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2014 में आरोपी ने अपनी बहन को ले जा रही एक युवती पर एसिड फेंक दिया, जिससे उसे चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों पर जलने की चोटें आईं।
घटना के बाद पीड़िता को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया और लंबे समय तक उपचार चला।
पीड़िता की नानी द्वारा दी गई सूचना के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 326-A (एसिड से गंभीर चोट पहुंचाना) और 326-B (एसिड फेंकने या प्रयास) के तहत चार्जशीट दायर की।
उम्रकैद की सजा, चेहरा विकृत
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी ठहराते हुए धारा 326-A के तहत आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
वहीं धारा 326-B के तहत आरोपी को सात वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने से दंडित किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि Acid attack के कारण पीड़िता को गंभीर चोटें आईं और उसका चेहरा विकृत हो गया।
हाईकोर्ट में अपील
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।
अपील में आरोपी की ओर से दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी गई, बल्कि सजा की अवधि को लेकर राहत की मांग की गई।
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आरोपी घटना के समय मात्र 21 वर्ष का था, उसके खिलाफ कोई आपराधिक पूर्व रिकॉर्ड नहीं है और वह पहले ही 12 वर्ष से अधिक समय तक जेल में रह चुका है।
अपील में यह भी कहा गया कि मेडिकल साक्ष्य यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं करते कि पीड़िता को स्थायी विकृति या गंभीर चोटें हुई थीं।
सरकार का कड़ा विरोध
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक ने आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत दिए जाने का विरोध किया।
लोक अभियोजक ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि यह मामला केवल एक साधारण आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि समाज को झकझोर देने वाला Acid attack जैसा जघन्य अपराध है, जिसे किसी भी परिस्थिति में हल्के में नहीं लिया जा सकता।
लोक अभियोजक ने दलील दी कि आरोपी ने जानबूझकर पीड़िता के सिर, चेहरे और शरीर पर एसिड डाला, जिससे उसे गंभीर जलन की चोटें आईं और उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़िता को शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी गंभीर क्षति हुई है, जिसकी भरपाई किसी भी सजा से पूरी तरह संभव नहीं है।
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि निचली अदालत ने सभी साक्ष्यों, गवाहों और चिकित्सकीय प्रमाणों का समुचित मूल्यांकन करते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और उसके अपराध की गंभीरता को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
ऐसे में निचली अदालत के निर्णय में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न्यायसंगत नहीं होगा।
सरकार ने यह भी कहा कि एसिड अटैक जैसे अपराधों में कड़ा दंड आवश्यक है, ताकि समाज में एक सख्त संदेश जाए और ऐसे अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
सरकार ने कहा कि यदि इस तरह के मामलों में सजा में ढील दी जाती है, तो इससे न केवल पीड़िताओं के साथ अन्याय होगा, बल्कि समाज में गलत संदेश भी जाएगा।
अभियोजन पक्ष ने कोर्ट का ध्यान इस तथ्य की ओर भी दिलाया कि निचली अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना था कि एसिड अटैक के कारण पीड़िता के चेहरे पर विकृति आई है। ऐसे में आजीवन कारावास की सजा पूरी तरह उचित और कानूनसम्मत है।
सरकार ने कहा कि आरोपी की ओर से प्रस्तुत तर्क केवल सहानुभूति प्राप्त करने के उद्देश्य से हैं, जबकि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है।
मेडिकल साक्ष्यों पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में पेश किए गए चिकित्सकीय साक्ष्यों का विस्तार से विश्लेषण किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता को चोटें आना निर्विवाद है, लेकिन डॉक्टरों की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट में कहीं भी यह स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है कि चोटें स्थायी रूप से विकृत करने वाली या गंभीर प्रकृति की थीं।
अदालत ने यह भी कहा कि जिन डॉक्टरों ने पीड़िता का इलाज किया, उन्होंने यह स्पष्ट राय नहीं दी कि चोटें “ग्रेवियस” थीं या पीड़िता का चेहरा स्थायी रूप से विकृत हो गया था।
डिस्चार्ज समरी और अन्य चिकित्सकीय दस्तावेजों में भी ऐसी कोई स्पष्ट टिप्पणी दर्ज नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि केवल तस्वीरों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि स्थायी विकृति हुई है, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस चिकित्सकीय राय मौजूद न हो।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 326-A के तहत न्यूनतम सजा 10 वर्ष है, जबकि अधिकतम सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान अदालत को विवेकाधिकार देता है कि वह मामले के तथ्यों, चोटों की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए सजा तय करे।
अपराध और दंड में संतुलन जरूरी
अदालत ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है, बल्कि अपराध और दंड के बीच संतुलन बनाए रखना भी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सजा न तो इतनी कठोर होनी चाहिए कि वह अनुचित लगे और न ही इतनी हल्की कि अपराध की गंभीरता कम आंकी जाए।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरोपी ने अब तक 12 वर्ष से अधिक समय जेल में बिताया है। इसके अलावा उसे स्थायी पैरोल पर रिहा किए जाने के बाद उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ। अदालत ने माना कि यह आरोपी के बाद के आचरण को दर्शाता है और सजा निर्धारण में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सजा में किया गया संशोधन
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों और दलीलों के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को संशोधित करते हुए इसे आरोपी द्वारा पहले से भुगती गई सजा तक सीमित कर दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और जुर्माने की राशि 50 हजार रुपये जमा कराने का आदेश दिया है।