राजस्थान हाईकोर्ट की अधिकारियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी, कहा अधिकारी को कानूनी प्रक्रिया की समझ नहीं
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर कार्यरत कर्मचारियों के साथ भी मनमाना और अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अंतरिम स्टे आदेश के बावजूद एक कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवा समाप्त करने की कार्रवाई को राजस्थान हाईकोर्ट ने न केवल अवैध और मनमानी करार दिया, बल्कि संबंधित अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर टिप्पणी की।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने सीकर निवासी इरफान अली के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए तुरंत कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर पुनः बहाल करने का आदेश दिया।
एकलपीठ ने याचिकाकर्ता कंप्यूटर ऑपरेटर की दूसरी रिट याचिका को स्वीकार करते हुए उसे अपने पद से हटाने का 8 फरवरी 2025 का सेवा समाप्ति आदेश रद्द करते हुए ये आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही 15 अक्टूबर 2024 को स्वीकृत अतिरिक्त संविदात्मक पद पर नियम 2022 के तहत याचिकाकर्ता का समायोजन (एब्जॉर्प्शन) करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि सेवा समाप्ति अवैध और मनमानी पाई गई, इसलिए याचिकाकर्ता को बैक वेजेज (पिछला वेतन) और अन्य सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की पहली रिट याचिका—जिसमें नियम 2022 के तहत चयन न किए जाने को चुनौती दी गई थी—को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि उसकी नियुक्ति संबंधित योजना के तहत थी।
अधिकारी को कानून समझ नहीं..
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने इस मामले में दिए फैसले में अधिकारियों पर भी बेहद सख्त टिप्पणी की है।
एकलपीठ ने कहा कि इस मामले में सरकारी अधिकारी द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा और अपनाई गई प्रक्रिया यह दर्शाती है कि या तो अधिकारी को कानूनी प्रक्रिया की समझ नहीं थी, या फिर यह एक प्रकार की “अनुचित श्रम प्रथा” (Unfair Labour Practice) का उदाहरण है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने फैसले में कहा कि यह रिकॉर्ड पर आया तथ्य है कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति उस समय की गई, जब हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश प्रभावी था।
हाईकोर्ट ने इसे स्पष्ट तौर पर “अदालती आदेश का खुला उल्लंघन” बताया।
ये है मामला
सीकर के खंडेला निवासी याचिकाकर्ता इरफान अली को 1 अगस्त 2019 को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी संस्था के तहत कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में नियुक्ति दी गई।
वर्ष 2023 में राज्य सरकार ने राजस्थान कॉन्ट्रैक्चुअल हायरिंग टू सिविल सर्विस पोस्ट्स रूल्स, 2022 के तहत डेटा एंट्री ऑपरेटर/कंप्यूटर ऑपरेटर के पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए।
याचिकाकर्ता ने भी अनुभव के आधार पर आवेदन किया, लेकिन यह कहकर उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई कि वे संबंधित योजना (एमएनडीवाई/एमएनआरवाई) के तहत नियुक्त नहीं थे।
इस अस्वीकृति के खिलाफ इरफान अली ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
मामले की सुनवाई के दौरान 7 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए राज्य सरकार और विभाग को याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगा दी।
अंतरिम आदेश के बावजूद सेवा समाप्ति
हाईकोर्ट के इस स्पष्ट स्टे आदेश के बावजूद 7 फरवरी 2025 को राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दीं।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने सेवा समाप्त करते हुए यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने सेवा प्रदाता (आउटसोर्स एजेंसी) के माध्यम से नया अनुबंध नहीं किया, इसलिए उनकी सेवाएं खत्म की गईं।
सेवा समाप्ति के बाद याचिकाकर्ता ने दूसरी याचिका दायर करते हुए 7 फरवरी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
निष्पक्ष सुनवाई के हकदार संविदाकर्मी
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ जग्गो बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविदा कर्मचारी भी निष्पक्ष सुनवाई और न्यायसंगत व्यवहार के हकदार हैं।
कोर्ट ने कहा-
“यह स्थापित सिद्धांत है कि संविदा पर कार्यरत कर्मचारी भी किसी प्रतिकूल कार्रवाई से पहले उचित सुनवाई के अधिकारी हैं, विशेषकर तब जब उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग हो।”
कोर्ट ने आगे कहा कि लंबे समय तक अस्थायी या संविदा आधार पर कर्मचारियों से काम लेना, जबकि वे संस्थान के कार्य के लिए अनिवार्य हों, न केवल अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के विपरीत है, बल्कि इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है और कर्मचारियों का मनोबल भी टूटता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति न केवल मनमानी थी, बल्कि दुर्भावनापूर्ण (मलाफाइड) भी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने अपने अनुबंध में यह शर्त जोड़ने की मांग की थी कि उनकी स्थिति लंबित रिट याचिका के परिणाम पर निर्भर करेगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि “संविदा” शब्द का अर्थ यह नहीं कि कर्मचारी को बिना कारण, बिना सुनवाई और बिना कानून का पालन किए हटा दिया जाए।