सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के अलग अलग कानूनी बिंदूओ पर दिए गए फैसले
जयपुर। देश की न्यायपालिका में यह कानूनी प्रश्न हमेशा खड़ा होता है कि क्या आपराधिक मामलों में तीसरा पक्ष अपील दायर कर सकता है।
अगर वह तीसरा पक्ष न पीड़ित है और न ही आरोपी से जुड़ा हो, तो क्या उसे किसी मामले में अपील दायर करने का अधिकार है।
कानूनी विशेषज्ञो के अनुसार ऐसे मामलो में यू तो कई फैसले नजीर माने जाते हैं लेकिन हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट के एक रिपोर्टेबल जजमेंट से अपराधिक मामलो में अपील दायर करने के अधिकार के बार में स्पष्ट व्याख्या की गयी हैं.
तीसरे पक्ष द्वारा अपील दायर करने से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला भी है, जिसमें आरोपी और पीड़ित के बीच समझौता होने पर पत्र के जरिए दायर की गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में अपना फैसला सुनाया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट से दर्ज मामलों में बरी किए जाने के खिलाफ अपील का अधिकार केवल राज्य को माना है और तीसरे पक्ष का अधिकार होने से इनकार किया है।
तीन फैसलों को जानते हैं विवरण के साथ।
केस 1: सुप्रीम कोर्ट ने दी जब तीसरे पक्ष को अनुमति
Ramji Lal Bairwa Versus State of Rajasthan,
November 07, 2024 — Supreme Court of India
(Justice C.T. Ravikumar, Justice Sanjay Kumar)
7 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने रामजीलाल बैरवा की पत्र याचिका को स्वीकार करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
रामजीलाल बैरवा ने एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक स्कूली नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़ के गंभीर अपराध में आरोपी शिक्षक और पीड़ित पक्ष के बीच हुए समझौते के मामले में अपील दायर की।
पीड़ित और आरोपी के बीच हुए समझौते के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे पक्ष की इस अपील पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आपसी समझौते को सिरे से खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में समझौते के आधार पर एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल निजी विवाद नहीं होते, बल्कि समाज के विरुद्ध गंभीर अपराध होते हैं।
जस्टिस सी. टी. रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ ने यह अहम फैसला Ramji Lal Bairwa एवं अन्य बनाम राज्य सरकार मामले में सुनाया, जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा एफआईआर रद्द किए जाने के आदेश को कानून-विरुद्ध करार देते हुए निरस्त कर दिया गया।
“फटी जैकेट सिली जा सकती है, लेकिन बच्चे का टूटा दिल नहीं”
जस्टिस सी. टी. रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने फैसले की शुरुआत एक गंभीर टिप्पणी के साथ की।
कोर्ट ने प्रसिद्ध कवि लॉन्गफेलो के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि “एक फटी हुई जैकेट को तो दोबारा ठीक किया जा सकता है, लेकिन किसी बच्चे के टूटे हुए दिल को दोबारा नहीं जोड़ा जा सकता।”
अदालत ने माना कि बाल यौन शोषण का असर पीड़िता पर जीवनभर बना रहता है और यह उसके मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
ये है पूरा मामला
यह मामला राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले का है, जहां जनवरी 2022 में एक 16 वर्षीय नाबालिग छात्रा के पिता ने अपनी बेटी के साथ स्कूल में हुई छेड़छाड़ को लेकर एफआईआर दर्ज करवाई थी।
आरोप था कि स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक छात्रा के साथ कक्षा में अकेले होने का फायदा उठाकर अश्लील हरकतें करने लगा।
एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे।
हालांकि, एफआईआर दर्ज होने के कुछ ही हफ्तों बाद आरोपी शिक्षक और पीड़िता के पिता के बीच समझौता हो गया।
इसके आधार पर आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की और हाईकोर्ट ने समझौते को स्वीकार करते हुए एफआईआर और आगे की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
तीसरे पक्ष को मिली चुनौती देने की अनुमति
इस फैसले की सबसे अहम बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार या पीड़ित पक्ष किसी गलत आदेश को चुनौती नहीं देता, तो सार्वजनिक हित में कोई भी जागरूक नागरिक सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
कोर्ट ने माना कि यदि ऐसे मामलों में केवल तकनीकी आधार पर याचिका को खारिज किया जाए, तो इससे अपराधियों को बिना ट्रायल के बच निकलने का रास्ता मिल जाएगा।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए एफआईआर, जांच और आगे की आपराधिक कार्यवाही को पुनः शुरू करने का आदेश दिया। है।
केस 2: तीसरे पक्ष को कोई अधिकार नहीं – राजस्थान हाईकोर्ट
S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 7209/2025
Kailash Ram Versus State of Rajasthan
Order dated 12/11/2025, RAJASTHAN HIGHCOURT
Justice Anoop Kumar Dhand
राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रणाली में locus standi (पक्षकार बनने का अधिकार) को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी आपराधिक शिकायत को वापस लेने के निर्णय का विरोध करने का अधिकार किसी तीसरे पक्ष को नहीं है, यदि वह न तो पीड़ित है और न ही उस मामले से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित व्यक्ति।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि आपराधिक कानून के दायरे में “पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन” (PIL) की अवधारणा लागू नहीं होती और आपराधिक कार्यवाही को निजी प्रतिशोध या हस्तक्षेप का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस अनूप कुमार धांड ने कैलाश राम बनाम राज्य सरकार व अन्य मामले में सुनाया।
अदालत ने अजमेर की निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया, जिसके तहत मूल शिकायतकर्ता को अपनी आपराधिक शिकायत वापस लेने की अनुमति दी गई थी।
क्या था मामला
मामले में मूल शिकायतकर्ता शेखर मेवाड़ा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के ओएसडी राजीव दत्ता के साथ ही कुछ व्यक्तियों के खिलाफ मानव तस्करी और दस्तावेज़ों की जालसाजी जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट, अजमेर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत पर मजिस्ट्रेट ने पुलिस से तथ्यात्मक रिपोर्ट (फैक्चुअल रिपोर्ट) तलब की। पुलिस जांच में आरोपों को प्रथम दृष्टया गलत पाया गया।
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने यह निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता ने बिना ठोस साक्ष्यों के और bona fide (सद्भावना) के अभाव में शिकायत दर्ज कराई थी।
इसी चरण पर शिकायतकर्ता ने स्वयं शिकायत वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
तीसरे पक्ष की याचिका
इस आदेश को चुनौती देते हुए कैलाश राम नामक व्यक्ति ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि शिकायत में संज्ञेय अपराधों का खुलासा होता है, इसलिए शिकायत को वापस लेने की अनुमति देना गलत है और अभियोजन को जारी रहना चाहिए।
हालांकि याचिकाकर्ता न तो इस मामले में शिकायतकर्ता था और न ही पीड़ित।
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने या वापस लेने का अधिकार केवल शिकायतकर्ता, पीड़ित या राज्य सरकार को है।
कोई भी तीसरा व्यक्ति, जो न तो पीड़ित है और न ही प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित, उसे आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यदि ऐसे हस्तक्षेप की छूट दी जाए, तो कोई भी meddlesome bystander (अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाला) किसी के भी खिलाफ निरर्थक आपराधिक कार्यवाही शुरू कर सकता है, जिससे अभियुक्त की जीवन और स्वतंत्रता को गंभीर क्षति पहुंचेगी।
हाईकोर्ट ने locus standi की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ है—किसी व्यक्ति का न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर किसी आदेश को चुनौती देने का कानूनी अधिकार। यह अधिकार तभी उत्पन्न होता है, जब व्यक्ति यह दिखा सके कि उसके कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या उसे प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचा है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक कानून किसी तीसरे पक्ष को, जो न पीड़ित है और न ही शिकायतकर्ता, अभियोजन चलाने का अधिकार नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें जनता दल बनाम एच. एस. चौधरी, पी. एस. आर. साधनंतम बनाम अरुणाचलम और नेशनल कमीशन फॉर वीमेन बनाम राज्य (दिल्ली) शामिल हैं।
इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने लगातार यह सिद्धांत दोहराया है कि आपराधिक मामलों में तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप सामान्यतः अस्वीकार्य है। आपराधिक कानून को व्यक्तिगत या सामाजिक एजेंडे के लिए हथियार नहीं बनाया जा सकता।
राज्य और लोक अभियोजक को अभियोजन वापस लेने का विशेषाधिकार प्राप्त है और अदालत की भूमिका केवल यह देखने तक सीमित है कि यह निर्णय सद्भावना में लिया गया है या नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत लोक अभियोजक को अभियोजन वापस लेने का अधिकार प्राप्त है। इसी तरह, शिकायतकर्ता को भी यह अधिकार है कि वह यदि आगे कार्यवाही नहीं करना चाहता, तो अपनी शिकायत वापस ले सके।
यह अधिकार किसी तीसरे व्यक्ति की इच्छा या आपत्ति पर निर्भर नहीं करता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता न तो पीड़ित है, न शिकायतकर्ता और न ही यह कोई जनहित याचिका है, इसलिए उसे शिकायत की वापसी को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।
ट्रायल कोर्ट का आदेश विधिसम्मत और संतोषजनक पाया गया, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
केस 3: पुलिस रिपोर्ट से दर्ज मामलों में बरी के खिलाफ अपील का अधिकार केवल राज्य को – दिल्ली हाईकोर्ट
SMT SUDHA SHARMA versus STATE NCT OF DELHI
IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CRL. REV. P. 627/2023, Judgment delivered on: 06.01.2026
JUSTICE AMIT MAHAJAN
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जिन आपराधिक मामलों की शुरुआत पुलिस रिपोर्ट (चार्जशीट) के आधार पर होती है, उनमें अभियुक्त के बरी होने के खिलाफ अपील दायर करने का अधिकार केवल राज्य सरकार को होता है।
ऐसे मामलों में कोई तीसरा पक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 के तहत अपील नहीं कर सकता, जब तक कि वह विधि में परिभाषित “पीड़ित” की श्रेणी में न आता हो।
जस्टिस अमित महाजन ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए की।
याचिका में महिला ने एक संपत्ति से जुड़े कथित जालसाजी के मामले में अभियुक्त को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी, जबकि राज्य सरकार ने स्वयं उस बरी के आदेश के खिलाफ कोई अपील दाखिल नहीं की थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378 विशेष रूप से बरी के खिलाफ अपील से संबंधित है और पुलिस रिपोर्ट पर आधारित मामलों में यह अधिकार पूरी तरह राज्य सरकार के पास निहित होता है, जिसे लोक अभियोजक के माध्यम से प्रयोग किया जाता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 378 के तहत शिकायतकर्ता द्वारा अपील का प्रावधान केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है, जो सीधे शिकायत के आधार पर दर्ज किए गए हों।
धारा 372 के तहत “पीड़ित” के रूप में अपील के अधिकार के दावे की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता न तो इस मामले में शिकायतकर्ता थी और न ही उसे सीधे तौर पर कोई ऐसी क्षति या चोट पहुंची थी, जिसे अभियुक्त पर लगाए गए अपराधों से जोड़ा जा सके।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को बरी के खिलाफ अपील या पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त नहीं है और इसी आधार पर उसकी याचिका खारिज कर दी गई।