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सरंक्षित वनभूमि में हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट से जुड़े मामले को राजस्थान हाईकोर्ट की हरी झण्डी, गीताजंल ग्रुप का स्टील प्रोजेक्ट

Rajasthan High Court Allows Ojaswi Marbles Mining Lease, Imposes ₹1 Lakh Cost for Misuse of Court Process

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सीकर के नीमका थाना ​में सरंक्षित वनभूमि पर आवंटित माइंस को हरी झण्डी देते हुए ओजस्वी मार्बल्स के पक्ष में फैसला दिया हैं.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने लंबे समय से विवादित खनन, वन भूमि और औद्योगिक विकास से जुड़े इस विवाद का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता के दावों को फर्जी और असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया हैं.

गौरतलब हैं इस केस को लंबे समय तक जोधपुर मुख्यपीठ में सुनवाई की जा रही थी. जिसके चलते क्षेत्राधिकार को लेकर भी आपत्ति दर्ज कि गयी थी.

ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड, गीतांजलि स्टील प्राइवेट लिमिटेड और प्रेमीदेवी की ओर से दायर अलग अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया हैं.

ओजस्वी मार्बल्स और गीतांजलि स्टील

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ओजस्वी मार्बल्स और गीतांजलि स्टील को बड़ी राहत देते हुए खनन कार्य प्रारंभ करने की अनुमति दी हैंं.

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही गीतांजलि स्टील द्वारा स्थापित किए जाने वाले स्टील प्लांट के लिए भूमि आवंटन की शर्तों में समय-सीमा को अदालत की रोक की अवधि से जोड़कर पुनः निर्धारित किया

वन भूमि पर खान आवंटन

राजस्थान के सीकर जिले के नीमकाथाना तहसील स्थित रामलियास गांव की लगभग 166 हेक्टेयर भूमि से जुड़ी है।

इस भूमि को वर्ष 1973 में राजस्थान वन अधिनियम, 1953 के तहत अधिसूचित कर संरक्षित वन भूमि घोषित किया गया था।

बाद में इस भूमि को खनन एवं औद्योगिक प्रयोजनों के लिए ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित कर दी गयी थी.

ओजस्वी मार्बल्स को वर्ष 2014 में खनन पट्टे के लिए लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी हुआ था।

हालांकि, वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियों में देरी के कारण पट्टा समय पर क्रियान्वित नहीं हो सका।

इसी दौरान दिवंगत प्रेम देवी की ओर से एक याचिका दायर की गई, जिसमें उक्त भूमि पर खतेदारी और स्वामित्व का दावा किया गया। यह दावा उनके कथित पावर ऑफ अटॉर्नी धारक बलराम शर्मा के माध्यम से किया गया था।

पावर ऑफ अटॉर्नी का दुरुपयोग

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बलराम शर्मा के पास स्म्ट. प्रेम देवी की ओर से मुकदमा लड़ने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि कि जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर याचिका दायर की गई, वह स्वयं एक संदिग्ध और कानूनी रूप से अमान्य समझौते पर आधारित थी।

अदालत ने “Delegatus non potest delegare” (जिसे अधिकार सौंपा गया है, वह आगे किसी और को नहीं सौंप सकता) के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि यह पूरा मामला वन भूमि पर अवैध दावा स्थापित करने और औद्योगिक परियोजना को बाधित करने का प्रयास प्रतीत होता है।

खंडपीठ ने यह भी रेखांकित किया कि स्म्ट. प्रेम देवी न तो मूल राजस्व कार्यवाही में पक्षकार थीं और न ही उन्होंने समय पर किसी वैधानिक मंच पर अपने अधिकारों का दावा किया। बाद में उच्च न्यायालय आकर इस प्रकार की याचिका दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

एक लाख रुपये का जुर्माना

हाईकोर्ट ने दिवगंत प्रेम देवी की विशेष अपील को खारिज करते हुए बलराम शर्मा पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे भूमि राजस्व की तरह वसूलने का आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के “अनैतिक और दुर्भावनापूर्ण” मुकदमों के कारण न केवल अदालत का समय बर्बाद होता है, बल्कि जनहित से जुड़े विकास कार्य भी बाधित होते हैं।

यह टिप्पणी अपने आप में एक कड़ा संदेश है कि कोर्ट अब ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लेगी, जहां निजी स्वार्थ के लिए कानून का सहारा लिया जाता है।

ओजस्वी मार्बल्स की दलील

दूसरी ओर, ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड के मामले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी को जारी किया गया खनन पट्टा पूरी तरह वैध है और यह MMDR Act, 1957 की धारा 10A(2)(c) के अंतर्गत संरक्षित है।

हाईकोर्ट ने कहा कि लेटर ऑफ इंटेंट और केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति कट-ऑफ तिथि (11 जनवरी 2017) से पहले मिल चुकी थी।

यदि सरकारी विभागों की देरी के कारण पट्टा समय पर क्रियान्वित नहीं हो पाया, तो इसका खामियाजा निजी कंपनी को नहीं भुगतना चाहिए।

खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक अन्य फैसले से इस मामले को अलग बताते हुए कहा कि यहां तथ्यों की स्थिति पूरी तरह भिन्न है और ओजस्वी मार्बल्स को खनन कार्य शुरू करने से रोका नहीं जा सकता।

गीतांजलि स्टील परियोजना

ओजस्वी मार्बल्स की सहयोगी कंपनी गीतांजलि स्टील प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका को भी अदालत ने स्वीकार कर लिया। कंपनी ने स्टील प्लांट स्थापित करने के लिए लगभग 19 करोड़ रुपये का निवेश और भारी स्टांप ड्यूटी अदा की है।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि परियोजना को शुरू करने की समय-सीमा अब उस तारीख से मानी जाएगी, जब खनन गतिविधियां वास्तव में प्रारंभ होंगी। इससे कंपनी को वर्षों से चली आ रही कानूनी अड़चनों के बाद वास्तविक राहत मिली है।

विकास बनाम दुरुपयोग

फैसले के अंतिम हिस्से में अदालत ने कहा कि ऐसे औद्योगिक प्रोजेक्ट, जो रोजगार सृजन और आर्थिक विकास से जुड़े हों, उन्हें “बेईमान और अवसरवादी मुकदमों” के कारण रोका नहीं जाना चाहिए। न्यायालय ने उम्मीद जताई कि स्टील प्लांट शीघ्र ही शुरू होगा और क्षेत्र के विकास में योगदान देगा।

यह फैसला न केवल राजस्थान में खनन और औद्योगिक निवेश के लिए एक सकारात्मक संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका अब विकास विरोधी, निराधार और फर्जी मुकदमों के प्रति बेहद सख्त रुख अपना रही है।

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