हाईकोर्ट ने कहा अवैध बर्खास्तगी का लाभ सरकार को नहीं, कर्मचारी को मिलेगा, राज्य बीमा एवं सामान्य भविष्य निधि से सेवानिवृत्त कर्मचारी को पेंशन देने के आदेश,
जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने सेवा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अवैध रूप से सेवा से हटाए गए कर्मचारी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता और ऐसी अवैधता का लाभ राज्य को नहीं दिया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी को अदालत द्वारा रद्द कर दिया जाता है, तो उसे कानूनी कल्पना (legal fiction) के तहत उसी तिथि से सेवा में माना जाएगा, जिस तिथि को उसकी सेवा अवैध रूप से समाप्त की गई थी।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने महेंद्र कुमार शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।
याचिकाकर्ता महेंद्र कुमार शर्मा को वर्ष 1985 में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के पद पर अस्थायी/दैनिक वेतन आधार पर नियुक्त किया गया था।
वर्ष 1987 में उसकी सेवाएं अचानक समाप्त कर दी गईं, जबकि उसी दौरान नए कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। इससे आहत होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के आदेश पर वर्ष 1993 में उन्हें पुनः सेवा में बहाल किया गया, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने उन्हें वह लाभ नहीं दिए, जो समान परिस्थितियों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों को दिए गए थे।
वर्ष 1992 में राज्य सरकार ने राजस्थान अधीनस्थ कार्यालय मंत्रीकर्मचारी सेवा नियम, 1957 के नियम 25 में उपनियम (10) जोड़ते हुए 1985 से 1990 के बीच कार्यरत दैनिक वेतन/अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण का प्रावधान किया था, बशर्ते वे दक्षता परीक्षा उत्तीर्ण करें।
याचिका में दावा किया गया कि याचिकाकर्ता को यह अवसर समय पर नहीं दिया गया।
बाद में 1996 में एक बार फिर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं, जिसे 2009 में हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए पुनः बहाल करने और नियम 25(10) के तहत विचार करने का आदेश दिया।
एकलपीठ के इस आदेश पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी मुहर लगा दी। इसके बावजूद विभाग ने 2012 में दक्षता परीक्षा पास करने की तिथि से ही उन्हें नियमित मानते हुए नई पेंशन योजना लागू कर दी और पूर्व सेवा को पेंशन योग्य नहीं माना।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार के इस रवैये को मनमाना और पूर्व आदेशों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि जब 2009 के फैसले में स्पष्ट रूप से “काल्पनिक वेतन निर्धारण (Notional Fixation) और अन्य परिणामी लाभ” देने का आदेश दिया था, तो विभाग इसे केवल औपचारिकता मानकर नहीं टाल सकता।
समानता के अधिकार का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि काल्पनिक वेतन निर्धारण का उद्देश्य कर्मचारी को उस स्थिति में रखना है, जिसमें वह अवैध कार्रवाई न होने पर होता, भले ही वास्तविक बकाया वेतन न दिया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को 1993 में आयोजित दक्षता परीक्षा में बैठने का अवसर केवल इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि उनकी सेवा अवैध रूप से समाप्त कर दी गई थी।
ऐसी स्थिति में कर्मचारी को इस देरी का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विभाग की परिभाषा स्वीकार की जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा और समान परिस्थितियों में कार्यरत कर्मचारियों के साथ भेदभाव होगा।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता 2019 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं और यदि लाभ 2012 से ही सीमित रखे जाते हैं, तो वे पेंशन जैसे महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित रह जाएंगे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार के 13 जून 2012 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उसी तिथि से काल्पनिक वेतन निर्धारण और सभी परिणामी सेवा लाभ दिए जाएं, जिस तिथि से समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को यह लाभ मिला था।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता को राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के तहत पेंशनरी लाभ देने का आदेश दिया। हालांकि, उस अवधि के लिए वास्तविक बकाया वेतन नहीं दिया जाएगा, जब उन्होंने वास्तव में कार्य नहीं किया।
बेहद जटिल मामला
सेवा में नियुक्ति और प्रारंभिक स्थिति
याचिकाकर्ता महेंद्र कुमार शर्मा को 15 जनवरी 1985 को राज्य बीमा एवं सामान्य भविष्य निधि (State Insurance & GPF Department) में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के पद पर अस्थायी/दैनिक वेतन आधार पर नियुक्त किया गया।
निरंतर सेवा में कार्यरत होने के बावजूद अक्टूबर 1987 में याचिकाकर्ता की सेवाएं अचानक समाप्त कर दी गईं।
याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त करने के बाद भी विभाग ने नए कर्मचारियों की नियुक्ति कर दी।
पहली कानूनी लड़ाई और पुनर्बहाली
सेवा समाप्ति से आहत होकर याचिकाकर्ता ने 1988 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिका 5 फरवरी 1993 को निस्तारित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Surendra Kumar Gyani बनाम राज्य सरकार के अनुसार सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट के आदेश की पालना में 8 जुलाई 1993 को याचिकाकर्ता को पुनः सेवा में लिया गया और 17 जुलाई 1993 को उन्होंने कार्यभार ग्रहण किया।
नियमितीकरण का अवसर नहीं मिलना
राज्य सरकार ने 12 अक्टूबर 1992 को राजस्थान अधीनस्थ कार्यालय मंत्रीकर्मचारी सेवा नियम, 1957 के नियम 25(10) में संशोधन किया, जिसके तहत 1 जनवरी 1985 से 31 मार्च 1990 के बीच कार्यरत दैनिक वेतन/अस्थायी LDC कर्मचारियों के नियमितीकरण का प्रावधान किया गया था, बशर्ते वे विभागीय दक्षता परीक्षा उत्तीर्ण करें।
याचिकाकर्ता के साथ नियुक्त अन्य कर्मचारियों को 24 जनवरी 1993 और 14 अगस्त 1994 की परीक्षाओं में बैठने का अवसर मिला, जिसके जरिए उन्हें 30 मार्च 1993 को नियमित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता महेंद्र कुमार शर्मा को यह अवसर नहीं दिया गया, जबकि वे समान परिस्थितियों में थे।
दूसरी बार सेवा समाप्ति और लंबा संघर्ष
वर्ष 1996 में विभाग ने RPSC से चयनित अभ्यर्थियों की उपलब्धता के आधार पर एक बार फिर याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दीं।
विभाग के इस आदेश के खिलाफ 1996 में याचिका दायर की गई, जिसे 3 दिसंबर 2009 को स्वीकार करते हुए 19.02.1996 की सेवा समाप्ति को अवैध घोषित किया गया।
हाईकोर्ट ने इस फैसले में याचिकाकर्ता को पुनः सेवा पर बहाल करने का आदेश दिया।
इसके साथ ही नियम 25(10) के तहत विचार करने और काल्पनिक वेतन निर्धारण (Notional Fixation) व अन्य परिणामी लाभ देने के आदेश दिए, लेकिन बीच की अवधि का वास्तविक बकाया वेतन नहीं देने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार की अपील
फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की। 8 फरवरी 2011 को खंडपीठ ने सरकार की अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा।
अवमानना, पुनर्बहाली और विवादित आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश लागू नहीं करने पर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की, जिस पर 9 फरवरी 2011 को पुनः सेवा में लिया गया।
जिसके बाद पहले दैनिक वेतन पर और बाद में 10 अगस्त 2011 को नियमित वेतनमान में रखा गया।
याचिकाकर्ता ने 15 फरवरी 2012 को दक्षता/टाइपिंग परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन विभाग ने 13 जून 2012 के आदेश से याचिकाकर्ता को केवल 15.02.2012 से नियमित मानते हुए नई पेंशन योजना के अंतर्गत शामिल किया, जिससे उनकी पूर्व सेवा और पेंशन अधिकार समाप्त हो गए।
सेवानिवृत्ति और अंतिम राहत
वर्ष 2019 में याचिकाकर्ता के अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पेंशन लाभ नहीं दिया गया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अवैध सेवा समाप्ति के कारण याचिकाकर्ता को नुकसान नहीं उठाना चाहिए; उसे उसी तिथि से सेवा में माना जाएगा, जिस तिथि से समान कर्मचारियों को लाभ मिला।
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के अंतर्गत पेंशन का हकदार माना।