केंद्रीय बैंक के अधिकारी की बर्खास्तगी बरकरार, राजस्थान हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण सेवा कानून से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्रीय बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी ए.के. टंडन की सेवा से बर्खास्तगी को बरकरार रखा है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में यदि प्रक्रिया का पालन किया गया हो, पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों और दंड ‘अत्यधिक व चौंकाने वाला’ न हो, तो अनुच्छेद 226 व 227 के तहत न्यायिक समीक्षा की सीमाओं में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
जस्टिस आनंद शर्मा ने 23 वर्ष पुराने मामले का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता ए.के. टंडन की याचिका को खारिज करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट अपीलीय प्राधिकरण की तरह कार्य नहीं कर सकता और न ही विभागीय जांच में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
ये है मामला
याचिकाकर्ता ए.के. टंडन, जो कि Central Bank of India में अधिकारी के पद पर कार्यरत थे, उनके विरुद्ध Central Bank of India Officer Employees’ (Discipline & Appeal) Regulations, 1976 के तहत विभागीय जांच प्रारंभ की गई थी।
19 दिसंबर 1996 को आरोप-पत्र जारी किया गया।
जांच के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 12 फरवरी 2002 को सेवा से बर्खास्तगी करने का निर्णय दिया।
इस निर्णय के खिलाफ दायर की गई अपील पर 6 जून 2002 को अपीलीय प्राधिकारी ने भी बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा।
इसके विरुद्ध याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपीलीय प्राधिकारी के फैसले को अत्यधिक कठोर दंड और आरोपों की तुलना में अनुपातहीन होने के आधार पर चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि विभागीय जांच में चयनात्मक साक्ष्यों पर भरोसा किया गया और बचाव पक्ष के महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी की गई।
याचिकाकर्ता के लंबे समय से बीमार होने का भी कारण बताते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता ने कई बार चिकित्सीय प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर जांच में स्थगन (Adjournment) की मांग की, जिसे नजरअंदाज किया गया।
जांच अधिकारी ने उन्हें पर्याप्त अवसर दिए बिना एकतरफा (Ex-parte) कार्यवाही की, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
याचिका में कहा गया कि अपीलीय प्राधिकारी ने स्वतंत्र रूप से विचार किए बिना यांत्रिक ढंग से आदेश पारित कर दिया।
बैंक प्रबंधन का पक्ष
याचिका के विरोध में बैंक प्रबंधन की ओर से कहा गया कि पूरी विभागीय जांच नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप की गई।
बैंक ने कहा कि याचिकाकर्ता को हर स्तर पर अपना पक्ष रखने, गवाहों से जिरह करने और बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।
चिकित्सा प्रमाण-पत्रों की सत्यता संदिग्ध थी और याचिकाकर्ता को मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश दिए गए, जिनका याचिकाकर्ता ने पालन नहीं किया।
जांच अधिकारी की विस्तृत जांच के बाद आरोप सिद्ध पाए, जो गंभीर प्रकृति के थे।
अनुशासनात्मक व अपीलीय प्राधिकारी, दोनों ने कारणयुक्त और विचारपूर्ण आदेश पारित किए।
हाईकोर्ट का फैसला
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि—
न्यायिक समीक्षा का दायरा निर्णय लेने की प्रक्रिया तक सीमित है, न कि निर्णय के सही-गलत पर।
यदि जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए की गई हो, तो अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
साक्ष्यों की पर्याप्तता या विश्वसनीयता पर पुनर्विचार करना हाईकोर्ट का कार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि चिकित्सा प्रमाण-पत्रों के संबंध में जांच अधिकारी ने विस्तृत निष्कर्ष दर्ज किए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने से बचने का प्रयास किया, जिससे उनकी मंशा पर संदेह उत्पन्न होता है।
दंड अत्यधिक नहीं
याचिकाकर्ता का यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया गया कि बर्खास्तगी का दंड अत्यधिक है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिद्ध आरोपों की प्रकृति और पद से जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए दंड चौंकाने वाला या असंगत नहीं है।
केवल यह कहना कि दंड कठोर है, न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता।
जब तक दंड ऐसा न हो जिसे कोई भी विवेकशील नियोक्ता न दे, तब तक अदालत को संयम बरतना चाहिए।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा है।
फैसले में अंतिम आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि या अवैधता नहीं है।
अनुशासनात्मक व अपीलीय प्राधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हुए फैसला लिया है।