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स्कूल औद्योगिक कानून से बाहर नहीं, वर्षों तक कर्मचारियों से नियमित कार्य कराते हुए दैनिक वेतनभोगी बनाए रखना संविधान का उल्लंघन

Schools Not Outside Labour Laws: Rajasthan High Court Directs Regularisation of Navodaya Vidyalaya Workers After 32 Years

नवोदय विद्यालय श्रमिकों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मेस हेल्परों को नियमित करने का आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने श्रम अधिकारों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वर्षों तक कर्मचारियों से स्थायी और नियमित कार्य लेकर उन्हें अस्थायी या दैनिक वेतनभोगी बनाए रखना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन भी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि स्कूल को औद्योगिक कानूनों से बाहर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि एक संगठित संस्थान है, जहाँ रसोई, सफाई और अन्य सेवाओं के माध्यम से श्रमिकों से निरंतर श्रम लिया जाता है।

जस्टिस आनंद शर्मा ने अजमेर जिले की जवाहर नवोदय विद्यालय, नांदला और चार श्रमिको की रिट याचिकाओं का एक साथ निस्तारण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

राजस्थान हाईकोर्ट ने नवोदय विद्यालय में 32 वर्षों तक नियमित कार्य करने के बाद याचिकाकर्ताओं को हटाने के आदेश को रद्द कर दिया है।

ये है मामला

जवाहर नवोदय विद्यालय अजमेर में कार्यरत दो मेस हेल्परों—धनराज चौधरी और अमर सिंह—से जुड़ा था, जिन्हें वर्ष 1993 से अस्थायी रूप से नियुक्त किया गया था।

विद्यालय प्रबंधन का दावा था कि इन्हें केवल “अतिरिक्त कार्यभार” और “आपात परिस्थितियों” के लिए रखा गया था, जबकि वास्तविकता यह रही कि दोनों कर्मचारी लगातार वर्षों तक नियमित और स्थायी प्रकृति का कार्य करते रहे।

इन कर्मचारियों की 1996 में सेवाएं समाप्त किए जाने के बाद श्रमिकों ने लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

लेबर कोर्ट ने 2001 में उनके पक्ष में फैसला देते हुए पुनर्नियुक्ति, सेवा की निरंतरता और बकाया वेतन का आदेश दिया।

लेबर कोर्ट के फैसले के खिलाफ नवोदय विद्यालय प्रशासन की ओर से हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर की गईं।

विद्यालय ‘उद्योग’ है या नहीं?

याचिका में याचिकाकर्ता नवोदय विद्यालय की ओर से यह तर्क दिया गया कि विद्यालय ‘उद्योग’ की परिभाषा में नहीं आता, इसलिए औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 उन पर लागू नहीं होता।

श्रमिको की ओर से अधिवक्ता सुनिल समदड़िया, अरिहंत समदड़िया ने सुप्रीम कोर्ट के बेंगलुरु वाटर सप्लाई बनाम ए. राजप्पा और ए. सुंदराम्बल बनाम गोवा सरकार मामलों का हवाला देते हुए कहा कि विद्यालय में शिक्षण के अलावा अनेक सहायक और मैनुअल गतिविधियाँ होती हैं, जो उसे ‘उद्योग’ की श्रेणी में लाती हैं।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि—

“विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि एक संगठित संस्थान है, जहाँ रसोई, सफाई और अन्य सेवाओं के माध्यम से श्रमिकों से निरंतर श्रम लिया जाता है। ऐसे में औद्योगिक कानूनों से इसे बाहर नहीं रखा जा सकता।”

अवैध समाप्ति और हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने पाया कि श्रमिकों की सेवाएं 240 दिन पूरे करने के बावजूद बिना नोटिस और बिना मुआवजा दिए समाप्त की गईं, जो कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25F का सीधा उल्लंघन है। इस आधार पर लेबर कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।

इस मामले में पूर्व में हाईकोर्ट ने केवल बकाया वेतन पर रोक लगाई थी और पुनर्नियुक्ति पर नहीं, तब भी विद्यालय प्रशासन ने 2009 में श्रमिकों की सेवाएं दोबारा समाप्त कर दीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि—

“कोर्ट की अनुमति के बिना सेवा समाप्ति करना न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने का प्रयास है। यह न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि अदालत की अवमानना की श्रेणी में भी आता है।”

राज्य-संस्थान ‘संवैधानिक नियोक्ता’

याचिका पर सुनवाई के दौरान श्रमिकों की ओर से यह तथ्य पेश किया गया कि याचिकाकर्ता श्रमिक 32 वर्षों से अधिक समय से उसी पद पर कार्यरत हैं, जबकि मेस हेल्पर का पद विद्यालय में स्वीकृत और स्थायी है।

नवोदय विद्यालय प्रशासन ने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के उमादेवी निर्णय का हवाला देते हुए नियमितीकरण से इनकार किया, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उमादेवी का उद्देश्य श्रमिकों का शोषण रोकना था, न कि उसे बढ़ावा देना।

“राज्य और उसके संस्थान निजी नियोक्ता नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक नियोक्ता’ हैं। वे बजट संतुलन के नाम पर वर्षों तक श्रमिकों को अस्थायी बनाकर नहीं रख सकते।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का प्रभाव

राजस्थान हाईकोर्ट ने जग्गो बनाम भारत संघ (2024), धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और श्रीपाल बनाम नगर निगम गाजियाबाद (2025) जैसे ताजा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबी अवधि तक निरंतर सेवा अपने आप में नियमितीकरण का आधार बनती है, विशेषकर जब कार्य स्थायी प्रकृति का हो।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने जवाहर नवोदय विद्यालय प्रशासन द्वारा कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने के 31 मार्च 2009 के आदेश को रद्द करने का फैसला दिया।

साथ ही श्रमिकों को 10 वर्ष की सेवा पूर्ण करने की तिथि से नियमित करने का आदेश दिया।

साथ ही उन्हें सेवा की निरंतरता, वेतन निर्धारण, वरिष्ठता और पेंशन सहित सभी लाभ दिए जाने का आदेश दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी प्रक्रियाएं तीन माह में पूर्ण करने का आदेश देते हुए श्रमिकों को तीन वर्षों का बकाया वेतन देने का भी आदेश दिया है।

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