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कैदी भी इंसान, संविधान उन्हें भी गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता हैं- राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Flags Inhuman Jail Conditions, Seeks Immediate Prison Reforms

जेलों में कैदियों को पर्याप्त पानी, स्वच्छता और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश, जिला स्तरीय कमेटी, मोनिटरिंग के आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में बंद कैदियों की बुनियादी मानवीय जरूरतों—विशेषकर पीने और कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत गरिमा-पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य सरकार की व्यवस्थाओं को अपर्याप्त करार दिया है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने अपने रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया कि कैदी भी इंसान हैं और संविधान उन्हें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने अपने फैसले की शुरूआत नेल्शल मंडेला के शब्दों से करते हुए कहा कि

किसी राष्ट्र को वास्तव में तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक उसकी जेलों को न देखा जाए। किसी राष्ट्र का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह अपने सबसे उच्च नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि वह अपने सबसे निम्न और कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जेल सुधारों को कागजों से निकालकर जमीनी स्तर पर लागू करने पर बल देते हुए कई दिशानिर्देश भी जारी किए हैं.

जेलों का उद्देश्य दंड देना नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि

जेलों का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है, बल्कि अपराधियों को सुधार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में पुनः स्थापित करना है। यदि जेलों में अमानवीय परिस्थितियाँ होंगी, तो सुधार और पुनर्वास की अवधारणा अर्थहीन हो जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने औपनिवेशिक दंडात्मक व्यवस्था से हटकर सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक दृष्टिकोण अपनाया है, फिर भी व्यवहार में आज भी जेलों में बंद कैदियों को पीने के साफ पानी, कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।

कैदियों का मूल मानवाधिकार

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वच्छता और साफ-सफाई कैदियों का मूल मानवाधिकार है। इसके बावजूद प्रशासनिक उदासीनता, संसाधनों की कमी, भ्रष्टाचार और प्रभावी निगरानी के अभाव के कारण जेलों में स्वच्छता की स्थिति दयनीय बनी हुई है।

हाईकोर्ट ने कहा कि कई जेलों में न तो पर्याप्त शौचालय हैं और न ही साफ पानी की निरंतर आपूर्ति।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह प्रश्न उठाया कि राजस्थान जैसे गर्म और शुष्क राज्य में किसी भी कैदी को सप्ताह में केवल एक बार कपड़े धोने की अनुमति देना मानव गरिमा के पूर्णतः विपरीत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह कल्पना से परे है कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में स्वच्छ और स्वस्थ रह सकता है।

महिला कैदियों के बदतर हालात

महिला कैदियों और किशोर बंदियों के संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी आवश्यकताएँ अलग और विशेष हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता संबंधी सुविधाएँ, पर्याप्त पानी, सुरक्षित शौचालय और गोपनीयता मिलना अनिवार्य है। इन सुविधाओं का अभाव न केवल उनके स्वास्थ्य, बल्कि उनकी गरिमा का भी उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कैदियों की समस्याएँ इसलिए अनसुनी रह जाती हैं क्योंकि उन्हें अपराधी मानकर समाज और प्रशासन द्वारा हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

यदि वे अपनी शिकायतें उठाते भी हैं, तो उनकी आवाज़ शायद ही कभी सुनी जाती है।

सुविधाएँ नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार दोनों को निर्देश दिया कि कि जेल सुधार केवल कागजी नियमों और कानूनों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उनका प्रभावी और ईमानदार क्रियान्वयन अनिवार्य है। मॉडल प्रिजन एक्ट, 2023 और राजस्थान प्रिजन नियम, 2022 जैसे कानून तभी सार्थक होंगे, जब वे वास्तविक रूप से कैदियों के जीवन में सुधार लाएँगे।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्याप्त जल आपूर्ति केवल सुविधाएँ नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक अधिकार हैं। जब तक जेलों में बंद व्यक्तियों को न्यूनतम मानवीय गरिमा नहीं दी जाएगी, तब तक किसी भी न्याय व्यवस्था को पूर्ण और न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट के सख्त आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने Peoples Watch Rajasthan की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मुख्य महानगर/मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और डीएलएसए सचिवों को तीन सप्ताह में जेलों का औचक निरीक्षण करने और कैदियों से निजी बातचीत कर रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं.

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही प्रत्येक जिले में शिकायत निवारण समिति का गठन करने का आदेश दिया हैं.

इस समिति में प्रत्येक जिले में जिला मजिस्ट्रेट, जिला न्यायाधीश, सीजेएम, सामाजिक कल्याण अधिकारी, जेल अधीक्षक और डीएलएसए सचिव की समिति गठित कर कैदियों की शिकायतों का निस्तारण करेंगे.

राजस्थान हाईकोर्ट ने हर जेल में सूचना पट्ट लगाकर कैदियों को लिखित शिकायत का अधिकार बताने की सूचना देने का आदेश दिया हैं.

राज्य को अंतरिम आदेश,केन्द्र पक्षकार

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार को पीने व कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी और स्वच्छता-स्वास्थ्य के लिए तत्काल नीति/तंत्र बनाने का आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव को कोर्ट आदेशो की पालना की मोनिटरिंग कर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया हैं.

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका में गृह मंत्रालय, भारत सरकार को पक्षकार बनाने का आदेश दिया हैं.

याचिका में आरोप

Peoples Watch Rajasthan की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि राजस्थान जेल नियम, 1951 के तहत कैदियों को कपड़े धोने के लिए दी जाने वाली सामग्री (वॉशिंग सोडा/डिटर्जेंट) की मात्रा अत्यंत कम है और पानी की उपलब्धता भी अपर्याप्त है।

याचिका में कहा गया कि नियम 120 के तहत पुरुष कैदियों को ¾ औंस और महिला कैदियों को 1½ औंस वॉशिंग सोडा प्रति सप्ताह दिया जाना निर्धारित था, जिसे याचिकाकर्ता ने स्वच्छता बनाए रखने के लिए नाकाफी बताया।

याचिका में पीने के पानी और कपड़े धोने के पानी की नियमित आपूर्ति न होने की शिकायत की गई।

राज्य सरकार की दलील

याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कहा गया कि जेलों में प्रचलित नियमों के अनुसार सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं और इसलिए अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि नियमों का पालन किया जा रहा है और व्यवस्थाएँ पर्याप्त हैं।

हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सरकार के तर्को से असहमत होते हुए कई सख्त टिप्पणीयां की.

हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वच्छता और साफ-सफाई कैदियों का मूल मानवाधिकार है, परंतु व्यवहार में इन तक पहुंच सीमित है।

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार, संसाधनों की कमी और अवसंरचना के अभाव के कारण जेलों में स्वच्छता संकट बना रहता है।

अंतरराष्ट्रीय मानकों और सुधार रिपोर्टों का हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने यूएन नेल्सन मंडेला नियम (2015), मुल्ला समिति (1980-83), आईसीआरसी के मानक, बीपीआरडी का मॉडल प्रिजन मैनुअल और मॉडल प्रिज़न्स एंड करेक्शनल सर्विसेज़ एक्ट, 2023 का विस्तार का हवाला देते हुए कहा कि

इन रिपोर्टों में 24×7 पानी, पर्याप्त शौचालय, नियमित स्नान, महिलाओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएँ, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वच्छ रसोई और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन जैसे मानक सुझाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि ये मानक केवल दस्तावेज़ों तक सीमित न रहें।

ग्राउंड रियलिटी अलग

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राजस्थान प्रिजन रूल्स, 2022 लागू हो चुके हैं और इनमें पानी, स्नान, कपड़े धोने जैसी व्यवस्थाओं में सुधार किया गया है।

बावजूद इसके, ग्राउंड रियलिटी अलग है। कैदियों को आज भी पर्याप्त पानी और स्वच्छता सुविधाएँ नहीं मिल पा रहीं। राजस्थान की कठोर जलवायु में किसी कैदी को सप्ताह में केवल एक बार कपड़े धोने तक सीमित रखना अकल्पनीय बताया गया।

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