ड्राइवर न मिलने पर वकील ने चलाई एम्बुलेंस, समय पर बची महिला अधिवक्ता की जान
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर परिसर में आपातकालीन सेवाओं को लेकर पूर्व में जारी आदेशों की आज गंभीर लापरवाही के रूप में पोल खुल गई।
हाईकोर्ट परिसर में तैनात आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा उस वक्त पूरी तरह नाकाम साबित हुई, जब एक महिला अधिवक्ता को अचानक मेडिकल इमरजेंसी का सामना करना पड़ा और मौके पर एम्बुलेंस चालक मौजूद ही नहीं था।
घटना सुबह लगभग 11:30 बजे की है, जब हाईकोर्ट परिसर में कार्यरत एक महिला अधिवक्ता की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
स्थिति गंभीर होते देख तत्काल एम्बुलेंस बुलाने की कोशिश की गई, लेकिन डिस्पेंसरी स्टाफ और मौजूद अधिवक्ताओं को एम्बुलेंस का ड्राइवर मौके पर नहीं मिला।
जब चालक को फोन किया गया तो मोबाइल स्विच ऑफ मिला, जिससे स्थिति और भी चिंताजनक हो गई।
आपातकाल में सिस्टम ठप, इंसानियत आई आगे
हाईकोर्ट जैसे संवेदनशील और प्रतिष्ठित संस्थान में, जहां हर दिन सैकड़ों अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी और आमजन मौजूद रहते हैं, वहां आपातकालीन सेवा का इस तरह फेल होना कई सवाल खड़े करता है।
महिला अधिवक्ता की हालत लगातार बिगड़ रही थी, इसी बीच अधिवक्ता रविंद्र सिंह शेखावत ने साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए खुद एम्बुलेंस चलाने का निर्णय लिया।
उन्होंने बिना समय गंवाए एम्बुलेंस की कमान संभाली और महिला अधिवक्ता को लेकर सीधे एसएमएस अस्पताल की ओर रवाना हुए।
ईंधन भी था कम, फिर भी नहीं रुके कदम
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं थी। रास्ते में यह भी सामने आया कि एम्बुलेंस में ईंधन बेहद कम था। इसके बावजूद अधिवक्ता रविंद्र सिंह शेखावत ने हिम्मत नहीं हारी और किसी तरह एम्बुलेंस को केवल एसएमएस अस्पताल तक पहुंचाने में सफल रहे।
यह एक ऐसा क्षण था, जहां हर सेकंड संघर्ष और जिम्मेदारी से भरा हुआ था।
एसएमएस अस्पताल पहुंचते ही महिला अधिवक्ता को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई।
डॉक्टरों के अनुसार, यदि कुछ और देर हो जाती तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी।
समय पर अस्पताल पहुंचने के कारण महिला अधिवक्ता को आवश्यक उपचार मिल सका और उनकी जान बचाई जा सकी।

अधिवक्ताओं की सूझबूझ से टली बड़ी अनहोनी
इस पूरे घटनाक्रम में हाईकोर्ट परिसर में मौजूद अधिवक्ताओं की तत्परता और सहयोग भी सराहनीय रहा।
सभी ने मिलकर स्थिति को संभाला और महिला अधिवक्ता को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने का प्रयास किया।
यह घटना एक ओर जहां मानवीय संवेदनशीलता का उदाहरण बनी, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक लापरवाही को भी उजागर कर गई।
हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना?
गौरतलब है कि माननीय राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा पहले ही हाईकोर्ट परिसर में आपातकालीन सेवाओं के लिए एम्बुलेंस एवं नर्सिंग स्टाफ की व्यवस्था के आदेश दिए जा चुके हैं।
ऐसे में ड्राइवर का मौके से नदारद होना, फोन का स्विच ऑफ होना और एम्बुलेंस में ईंधन की कमी — यह सब आदेशों के पालन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
यदि आज किसी अधिवक्ता ने साहस न दिखाया होता, तो परिणाम बेहद दुखद हो सकता था। यह घटना बताती है कि कागज़ों में मौजूद व्यवस्थाएं ज़मीनी हकीकत में कितनी कमजोर हैं।
अधिवक्ता समुदाय में रोष
घटना के बाद हाईकोर्ट परिसर में अधिवक्ताओं के बीच गंभीर नाराजगी देखी गई। कई अधिवक्ताओं ने मांग की है कि एम्बुलेंस सेवा की तत्काल जांच हो और लापरवाह कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए.
अधिवक्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट जैसे संस्थान में इस प्रकार की लापरवाही अस्वीकार्य है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
आज की यह घटना सिर्फ एक महिला अधिवक्ता की मेडिकल इमरजेंसी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। सवाल यह है कि
अगर ड्राइवर मौजूद नहीं था तो जिम्मेदार कौन?
एम्बुलेंस में ईंधन की निगरानी क्यों नहीं हुई?
आपातकालीन सेवा की मॉनिटरिंग कौन कर रहा है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक हर अधिवक्ता और आमजन की सुरक्षा संदेह के घेरे में रहेगी।
फिलहाल, महिला अधिवक्ता सुरक्षित हैं, और एक अधिवक्ता की बहादुरी ने आज एक जान बचा ली — लेकिन यह घटना प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई है।