हाईकोर्ट ने कहा-13 वर्षों के बाद किसी अभ्यर्थी को साक्षात्कार में सम्मिलित कराने का आदेश देना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि चयन प्रक्रिया की अंतिमता के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।”
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने नगर निकाय सेवा में चयन से जुड़े एक पेंडिंग मामले में अपीलकर्ता को राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि अत्यधिक देरी के बाद अदालत से हस्तक्षेप की अपेक्षा नहीं की जा सकती, विशेषकर तब, जब चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो और पदों पर नियुक्तियां हो चुकी हों।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने 13 वर्ष पुराने चयन से जुड़े इस मामले में याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया।
क्या है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 2012 में आकाश कुमार नामा के नाम से दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें राज्य स्तरीय नगर पालिका (अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा) आयोग और राज्य सरकार के विरुद्ध अपील दायर की गई थी।
अपीलकर्ता आकाश कुमार नामा ने वर्ष 2011 में नगर निकायों में असिस्टेंट फायर ऑफिसर पद के लिए निकाली गई भर्ती के लिए आवेदन किया था।
चयन प्रक्रिया के तहत जून 2012 में साक्षात्कार आयोजित किए गए थे। अपीलकर्ता का दावा था कि उसे साक्षात्कार का कॉल लेटर प्राप्त नहीं हुआ, जिसके कारण वह इंटरव्यू में शामिल नहीं हो सका।
इसके बाद अपीलकर्ता ने इस आधार पर रिट याचिका दायर की कि उसे चयन प्रक्रिया से वंचित किया गया है और उसे न्यायिक राहत दी जाए।
मामले में एकल पीठ ने 10 मार्च 2025 को याचिका को खारिज कर दिया।
एकल पीठ के फैसले के खिलाफ आकाश कुमार ने खंडपीठ में अपील दायर की।
अपीलकर्ता की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता डॉ अभिनव शर्मा, पूजा शर्मा ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता इन-सर्विस कैंडिडेट था, इसलिए उसकी आयु (40 वर्ष से अधिक) चयन में बाधा नहीं हो सकती।
केवल आयु के आधार पर रिट याचिका को खारिज करना उचित नहीं था। संबंधित पदों पर रिक्तियां उपलब्ध थीं और यह तथ्य रिकॉर्ड पर पहले से मौजूद था।
कॉल लेटर न मिलने के कारण अपीलकर्ता साक्षात्कार में शामिल नहीं हो सका, जो प्रशासनिक चूक का परिणाम था।
अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि अदालत को कम से कम उसे साक्षात्कार का अवसर देने पर विचार करना चाहिए था।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की कुछ दलीलों से सैद्धांतिक रूप से सहमति जताई, लेकिन व्यवहारिक और विधिक स्थिति को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि—
केवल 40 वर्ष की आयु पार कर लेने के आधार पर अपीलकर्ता को स्वतः ही चयन प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।
लेकिन कॉल लेटर प्राप्त हुआ या नहीं, यह तथ्यात्मक विवाद (disputed question of fact) है, जिसकी जांच रिट क्षेत्राधिकार में संभव नहीं है।
चयन प्रक्रिया वर्ष 2012 में पूरी हो चुकी है और संबंधित पदों पर नियुक्तियां भी हो चुकी हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2015 में एक नया विज्ञापन जारी किया गया था और उस चयन प्रक्रिया को भी अंतिम रूप दिया जा चुका है।
13 साल की देरी बनी सबसे बड़ा कारण
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि—
“लगभग 13 वर्षों के बाद किसी अभ्यर्थी को साक्षात्कार में सम्मिलित कराने का आदेश देना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि चयन प्रक्रिया की अंतिमता के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद चयन प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना न तो न्यायसंगत है और न ही प्रशासनिक दृष्टि से संभव है।
रिट याचिका को बताया ‘अप्रासंगिक’
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समय बीतने के साथ-साथ यह याचिका otiose (अप्रासंगिक/निरर्थक) हो चुकी है।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि पद भर चुके हैं, नई चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अपीलकर्ता को अब किसी भी प्रकार की व्यावहारिक राहत नहीं दी जा सकती, इसलिए अपील स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही विशेष अपील को खारिज कर दिया।