राजस्थान हाईकोर्ट ने संपूर्ण राज्य के हाईवे पर अवैध निर्माण की सूची तैयार करने के आदेश, अवैध निर्माण पर जताई सख्त नाराजगी, कहा-सड़क सुरक्षा से कोई समझौता नहीं, मानव जीवन सर्वोपरि
जोधपुर। राष्ट्रीय राजमार्गों पर बढ़ते सड़क हादसों और अवैध निर्माणों को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर मुख्यपीठ ने एक अहम और सख्त आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग के मध्य बिंदु से 75 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार का निर्माण पूरी तरह अवैध बताते हुए ऐसे सभी निर्माणों को हर हाल में 6 फरवरी तक हटाने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।
मानव जीवन से समझौता नहीं
यह याचिका जोधपुर रिंग रोड और राष्ट्रीय राजमार्ग-125 से जुड़े क्षेत्रों में अवैध रूप से स्थापित धर्मकांटों (वेट ब्रिज) और अन्य निर्माणों से संबंधित थी, जिनके कारण बार-बार गंभीर सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि “विकास और व्यापार के नाम पर मानव जीवन से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय राजमार्गों को अवैध गतिविधियों का अड्डा बनने नहीं दिया जाएगा।”
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि संबंधित पक्ष तय समय-सीमा में स्वयं अवैध निर्माण नहीं हटाते हैं, तो प्रशासन को बाध्य होकर इन्हें हटाना होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। यदि नियमों की अनदेखी के कारण नागरिकों की जान जाती है, तो यह राज्य की जवाबदेही का गंभीर विषय बन जाता है।
सड़क हादसों ने बढ़ाई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी सामने आया कि हाल ही में जोधपुर क्षेत्र में एक भीषण सड़क दुर्घटना हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।
यह हादसा एक अवैध धर्मकांटे से लगभग 300 मीटर की दूरी पर हुआ था।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि हाईवे किनारे अवैध निर्माणों के कारण दृश्यता बाधित होती है, वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही बढ़ती है और भारी वाहनों के ठहराव से दुर्घटनाओं की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब मानव जीवन दांव पर हो, तब किसी भी प्रकार की प्रशासनिक ढिलाई या कानूनी तकनीकी बहाने स्वीकार्य नहीं हो सकते।
याचिकाकर्ता की दलीलें
हिम्मतसिंह गहलोत की ओर से दायर जनहित याचिका में पैरवी करते हुए अधिवक्ता राजेश जोशी और ऋषि सोनी ने दलील दी कि—
संबंधित स्थानों पर एनएचएआई की अनुमति के बिना निर्माण किए गए हैं, राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम और दिशा-निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है।
याचिका में कहा गया कि निर्माण के समय 75 मीटर की निर्धारित सीमा का पालन नहीं किया गया, जिसके चलते इन अवैध ढांचों के कारण सड़क सुरक्षा गंभीर खतरे में है।
उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि अवैध निर्माणों को तुरंत हटाने के आदेश दिए जाएं, ताकि भविष्य में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोका जा सके।
एनएचएआई ने नियमों की स्थिति स्पष्ट की
सुनवाई के दौरान नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि नियमों के अनुसार हाईवे के मध्य बिंदु से 75 मीटर तक किसी भी प्रकार का स्थायी या अस्थायी निर्माण प्रतिबंधित है। इसमें दुकानें, धर्मकांटे, गोदाम, कार्यालय या किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि शामिल है।
एनएचएआई ने यह भी कहा कि यह प्रतिबंध केवल भूमि उपयोग से संबंधित नहीं है, बल्कि सड़क सुरक्षा, यातायात नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं की सुगमता से भी जुड़ा हुआ है।
एकलपीठ के आदेश में आंशिक संशोधन
हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को पारित एकलपीठ के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
खंडपीठ ने कहा—
“कोई भी अंतरिम संरक्षण अवैध निर्माण को वैध नहीं बना सकता। यदि कोई निर्माण नियमों के विपरीत है, तो उस पर किसी भी प्रकार की न्यायिक या प्रशासनिक ढाल स्वीकार्य नहीं होगी।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेशों का दुरुपयोग कर अवैध गतिविधियों को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना के समान है।
स्वयं हटाने का आश्वासन, फिर भी सख्त समय-सीमा
मामले में एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि यदि 75 मीटर की सीमा के भीतर कोई भी निर्माण पाया जाता है, तो संबंधित पक्ष स्वयं दो सप्ताह के भीतर उसे हटा देगा।
इस पर कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि 6 फरवरी 2026 तक सभी अवैध निर्माण स्वयं हटाए जाएं।
यदि ऐसा नहीं किया गया, तो 9 फरवरी 2026 तक प्रशासन अनिवार्य रूप से कार्रवाई करेगा।
कार्रवाई में किसी भी प्रकार की कोताही स्वीकार नहीं की जाएगी।
राज्य सरकार और एनएचएआई को आदेश
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केवल इस याचिका तक सीमित न रहते हुए राज्य सरकार और एनएचएआई को व्यापक आदेश जारी किए हैं।
कोर्ट ने आदेश दिया कि—
राजस्थान में सभी राष्ट्रीय राजमार्गों के आसपास मौजूद अनधिकृत निर्माणों की सूची तैयार की जाए, यह जानकारी हलफनामे के साथ अदालत में प्रस्तुत की जाए।
यह भी बताया जाए कि इन निर्माणों को हटाने के लिए क्या ठोस कार्ययोजना बनाई गई है।
भविष्य में ऐसे अवैध निर्माण रोकने के लिए निगरानी तंत्र कैसे मजबूत किया जाएगा।
मामले में अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है। उस दिन राज्य सरकार और एनएचएआई को अपने-अपने हलफनामों के साथ जवाब देना होगा और आगे की कार्रवाई की समय-सीमा क्या होगी।