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33 साल पुराने मुकदमे में कोर्ट ने दोषियों को किया जेल भेजने से इनकार, कहा- लंबे समय बाद दोबारा जेल भेजना न्याय के हित में नहीं

Convicted After 33 Years, But No Jail: Rajasthan High Court Shows Leniency in 1992 Assault Case

हाईकोर्ट ने किया प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का विशेष उल्लेख, कहा ट्रायल कोर्ट ने उदारतापूर्वक उपयोग नहीं किया

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 33 वर्ष पुराने एक आपराधिक मामले में आरोपियों को उनके अपराध के लिए दोषी घोषित किया है, लेकिन अपराध के समय युवा अवस्था में रहे इन आरोपियों को 33 साल बाद जेल भेजने से इनकार किया है।

जस्टिस अरुण मोंगा की एकलपीठ ने एक अहम और मानवीय फैसले में कहा कि इस स्तर पर आरोपियों को दोबारा कारावास में भेजना न्याय के हित में नहीं होगा, बल्कि यह अनावश्यक रूप से उन्हें और अधिक परेशान करेगा।

हाईकोर्ट ने अपराध की घटना के बाद दोषियों के अच्छे आचरण को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि—

33 वर्षों तक आरोपियों का साफ-सुथरा आचरण यह दर्शाता है कि आरोपियों के मामले में सुधार का उद्देश्य पहले ही पूरा हो चुका है। इतने लंबे समय बाद उनसे अच्छे आचरण के लिए बांड या जमानत भरवाना केवल औपचारिकता होगी और इसका कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में दोषियों की दोषसिद्धि (conviction) को बरकरार रखा, लेकिन जेल की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करते हुए फिर से जेल भेजने से इनकार किया है।

जस्टिस अरुण मोंगा की एकलपीठ ने बाबूलाल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

33 साल बाद जेल भेजना ‘न्याय’ नहीं

हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि आरोपी अब 50 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं और गरीब पृष्ठभूमि से हैं, दशकों से समाज में सामान्य जीवन जी रहे हैं और इतने वर्षों बाद उन्हें दोबारा जेल भेजना न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।

अदालत ने कहा कि सुधारात्मक न्याय का उद्देश्य पहले ही पूरा हो चुका है, क्योंकि आरोपियों का आचरण 33 वर्षों तक साफ रहा है।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि दोषसिद्धि बरकरार रहेगी, लेकिन कारावास की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर जुर्माने की शर्तें यथावत रहेंगी।

1992 में उस्तरे से हमला करने का आरोप

यह मामला 19-20 मार्च 1992 की रात का है। बीकानेर के माधाराम कॉलोनी क्षेत्र में रहने वाले जमीला, उनके पति जमालदीन और बेटे रफीक के घर तड़के करीब 3 बजे कुछ लोगों ने जबरन घुसकर हमला किया।

अभियोजन के अनुसार बाबूलाल के हाथ में उस्तरा था और अन्य आरोपियों के पास चेन और लाठियां थीं।

आरोपियों ने घर में घुसकर मारपीट की, जमीला, जमालदीन और उनके बेटे रफीक को चोटें आईं।

घटना के बाद पुलिस थाना नयाशहर में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसे बाद में एफआईआर में परिवर्तित किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने माना दोषी

बीकानेर की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 23 अक्टूबर 1996 को फैसला सुनाते हुए आरोपियों को धारा 324 IPC (खतरनाक हथियार से चोट), धारा 452 IPC (घर में घुसकर हमला), धारा 147 IPC (दंगा) और धारा 149 IPC (सामान्य उद्देश्य) के तहत दोषी ठहराया।

अदालत ने धारा 307 IPC (हत्या का प्रयास) के आरोप साबित नहीं होने पर उससे अलग किया।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को बाबूलाल और अन्य ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील के जरिए चुनौती दी।

अपील में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि घटना का कोई ठोस मकसद (motive) नहीं बताया गया, एफआईआर में देरी हुई, सभी प्रमुख गवाह एक ही परिवार के सदस्य हैं, स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और वे hostile हो गए, जिनके बयानों में विरोधाभास हैं।

राज्य सरकार की दलील

मामले में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि एफआईआर समय पर दर्ज हुई, घायलों की मेडिकल रिपोर्ट आरोपों की पुष्टि करती है।

सरकार ने कहा कि मामूली विरोधाभास इतने पुराने मामले में स्वाभाविक हैं।

हाईकोर्ट का फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामले में घटना के तुरंत बाद रिपोर्ट दर्ज की गई थी, घायलों की मेडिको-लीगल रिपोर्ट में धारदार हथियार से चोटों की पुष्टि होती है। केवल इस आधार पर गवाही खारिज नहीं की जा सकती कि गवाह परिवार के सदस्य हैं। स्वतंत्र गवाहों के hostile होने से पूरा मामला कमजोर नहीं होता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि में कोई कानूनी खामी नहीं है, इसलिए आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

सजा पर दिखाई नरमी?

आरोपियों का अपराध साबित होने के बावजूद राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसले में नरमी का रुख अपनाया।

हाईकोर्ट ने सजा के बिंदु पर कहा कि घटना के समय सभी आरोपी बेहद युवा थे और कुछ आरोपी किशोर अवस्था में थे, जिनकी शुरुआती 20 की उम्र थी। सभी आरोपी प्रथम अपराधी (first-time offenders) थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले 33 वर्षों में कोई आपराधिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।

कोर्ट ने कहा कि जांच, ट्रायल और अपील की लंबी प्रक्रिया आरोपियों के लिए अपने आप में एक बड़ी सजा बन चुकी है।

जस्टिस अरुण मोंगा ने धारा 360 CrPC, धारा 361 CrPC और प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा कि—

यदि आरोपी युवा और प्रथम अपराधी हों, और अपराध आजीवन कारावास या मृत्यु दंड से दंडनीय न हो, तो अदालत को प्रोबेशन पर रिहाई पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने प्रोबेशन पर विचार न कर गंभीर कानूनी त्रुटि की, क्योंकि ऐसा न करने पर विशेष कारण दर्ज करना अनिवार्य था।

प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में खासतौर से प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 पर जोर देते हुए कहा कि यह धारा अदालत को व्यापक और कल्याणकारी अधिकार देती है कि यदि अपराध मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है, तो आरोपी को अच्छे आचरण पर प्रोबेशन पर छोड़ा जा सकता है।

इस प्रावधान के तहत अदालत को अपराध की प्रकृति, आरोपी का चरित्र, उसकी उम्र, पूर्व आचरण और सुधार की संभावना जैसे कारकों पर विचार करना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य युवाओं या पहली बार अपराध करने वालों को कठोर दंड के माध्यम से आदतन अपराधी बनने से रोकना है।

जहां यह कानून लागू होता है, वहां इसका उदारतापूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए।

वैकल्पिक प्रावधान नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 360 और प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट केवल वैकल्पिक प्रावधान नहीं हैं, बल्कि अदालत पर यह कर्तव्य डालते हैं कि सजा तय करते समय इन पर गंभीरता से विचार किया जाए।

यदि कोई मामला प्रोबेशन के दायरे में आता है और फिर भी उसका लाभ नहीं दिया जाता, तो अदालत को विशेष और ठोस कारण दर्ज करना अनिवार्य है।

वर्तमान मामले में आरोपी घटना के समय कम उम्र के थे, सभी पहली बार अपराध करने वाले थे और जिन अपराधों में उन्हें दोषी ठहराया गया, वे न तो मृत्यु दंड और न ही आजीवन कारावास से दंडनीय हैं।

ऐसे में निचली अदालत का यह दायित्व था कि वह प्रोबेशन पर रिहाई पर विचार करती। लेकिन ऐसा न कर और कोई विशेष कारण दर्ज न करके, निचली अदालत ने कानून की स्पष्ट त्रुटि की।

कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन संबंधी प्रावधानों पर विचार न करना और कारण दर्ज न करना, सुधारात्मक न्याय व्यवस्था की भावना के विपरीत है।

कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अपराधी को समाज का उपयोगी सदस्य बनाना भी है।

अदालत ने माना कि यदि उस समय निचली अदालत आरोपियों को एक वर्ष के लिए अच्छे आचरण पर प्रोबेशन का लाभ देती, तो यह अधिक उपयुक्त होता। इसके बजाय उन्हें कारावास की सजा देना एक गलत दृष्टिकोण था।

देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि अब आरोपी अपने पचास के दशक में पहुंच चुके हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले 33 वर्षों से वे जांच, मुकदमे और अपील की मानसिक पीड़ा, अपमान और अनिश्चितता झेलते रहे हैं। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी गरीब पृष्ठभूमि से हैं और अपने परिवारों का भरण-पोषण मुश्किल से कर पाते हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे और अपील में हुई देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार नहीं हैं।

लगभग 30 वर्षों तक अपील लंबित रहने के दौरान, कुछ अल्पकालिक हिरासत को छोड़कर, आरोपी जमानत पर रहे और इस दौरान उनके खिलाफ कोई नकारात्मक आचरण सामने नहीं आया।

यह दर्शाता है कि आरोपी आदतन अपराधी नहीं हैं और उनके द्वारा दोबारा अपराध किए जाने की संभावना भी नहीं है।

दोबारा कारावास में भेजना न्याय के हित में नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि 33 वर्षों तक साफ-सुथरा आचरण यह दर्शाता है कि आरोपियों के मामले में सुधार का उद्देश्य पहले ही पूरा हो चुका है। इतने लंबे समय बाद उनसे अच्छे आचरण के लिए बांड या जमानत भरवाना केवल औपचारिकता होगी और इसका कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होगा।

अदालत ने कहा कि इस स्तर पर आरोपियों को दोबारा कारावास में भेजना न्याय के हित में नहीं होगा, बल्कि यह अनावश्यक रूप से उन्हें और अधिक परेशान करेगा।

इन विशेष परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि न्याय के उद्देश्य तभी पूरे होंगे, जब आरोपियों की कारावास की सजा को उतनी अवधि तक सीमित किया जाए, जितनी अवधि वे पहले ही जेल में बिता चुके हैं। हालांकि, जुर्माने की सजा और उसके भुगतान न करने पर होने वाली सजा को यथावत रखा गया।

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