APO भर्ती परीक्षा 2024: भर्ती विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट का विस्तृत फैसला जारी, RPSC की मूल्यांकन प्रक्रिया सही, याचिकाएँ खारिज
जयपुर। राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) द्वारा आयोजित Assistant Prosecution Officer (APO) भर्ती परीक्षा–2024 के विवाद मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने विस्तृत फैसला जारी किया है।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने लंबी सुनवाई के बाद 27 जनवरी को फैसला सुनाते हुए RPSC की मूल्यांकन प्रक्रिया को सही ठहराया था।
इसके साथ ही इस मामले में सैकड़ों अभ्यर्थियों द्वारा दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि मुख्य परीक्षा के मूल्यांकन में कोई मनमानी, पक्षपात या असंवैधानिकता नहीं पाई गई।
ये है मामला
RPSC ने 7 मार्च 2024 को विज्ञापन जारी कर Assistant Prosecution Officer के 181 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। यह भर्ती लगभग 10 वर्षों बाद आयोजित की गई थी। प्रारंभिक परीक्षा के बाद लगभग 2700 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में शामिल हुए।
मुख्य परीक्षा में दो पेपर रखे गए थे—
पेपर-1 (लॉ): 300 अंक
पेपर-2 (हिंदी एवं अंग्रेज़ी भाषा): 100 अंक
नियमों के अनुसार, प्रत्येक पेपर में 40 प्रतिशत न्यूनतम अंक प्राप्त करना अनिवार्य था। इसमें SC/ST को 5% की छूट दी गई थी।
लेकिन 10 दिसंबर 2025 को जब RPSC ने परिणाम घोषित किया, तो केवल 4 अभ्यर्थियों को ही सफल घोषित किया गया।
यानी 181 में से 177 पद रिक्त रह गए। इसी को लेकर बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में दलीलें दी गईं कि इतनी बड़ी संख्या में पद खाली रह जाना मूल्यांकन प्रणाली की गंभीर खामी को दर्शाता है।
181 पदों पर 2700 में से केवल चार अभ्यर्थियों का चयन होना असामान्य और चौंकाने वाला है।
याचिका में कहा गया कि परीक्षा मूल्यांकन पारदर्शी नहीं था और प्रक्रिया को सार्वजनिक नहीं किया गया।
कई याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान न्यायिक सेवा (RJS) जैसी कठिन परीक्षा में भी इससे बेहतर अंक प्राप्त किए हैं।
भर्ती नियमों में मॉडरेशन, स्केलिंग या पुनर्मूल्यांकन का विकल्प मौजूद था, जिसे अपनाया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ताओं ने भर्ती परीक्षा परिणाम रद्द कर नई निष्पक्ष मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाने या फिर पुनर्मूल्यांकन/मॉडरेशन कराने की मांग की।
RPSC और राज्य सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान RPSC और राज्य सरकार की ओर से याचिकाओं का कड़ा विरोध किया गया।
आयोग ने अदालत में कहा कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार की गई और किसी भी स्तर पर दुर्भावना या पक्षपात नहीं था।
आयोग ने कहा कि परीक्षा में सब्जेक्टिव पैटर्न पहली बार लागू किया गया, जिससे गुणवत्ता आधारित चयन सुनिश्चित किया जा सके।
न्यूनतम अंक सीमा जानने के बावजूद अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी, इसलिए बाद में चुनौती देना कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।
आयोग की ओर से कहा गया कि केवल पद भरने के लिए मानक कम नहीं किए जा सकते।
राज्य सरकार ने भी स्पष्ट किया कि अभियोजन अधिकारियों की भूमिका बेहद संवेदनशील होती है, ऐसे में योग्यता से समझौता नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विस्तृत फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में अदालत की समीक्षा का दायरा सीमित है। अदालत चयन प्रक्रिया की गुणवत्ता नहीं, बल्कि प्रक्रिया की वैधता देखती है।
कोर्ट ने इन-कैमरा (गोपनीय) तरीके से उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन रिकॉर्ड का परीक्षण किया।
सभी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन एक समान मानकों पर किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई ऐसा साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे मूल्यांकन को मनमाना या अवैध कहा जा सके।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा—
“जो अभ्यर्थी नियमों और शर्तों को स्वीकार कर परीक्षा में शामिल होते हैं, वे असफल होने के बाद उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते।”
एस्टॉपल और एक्वायसेंस का सिद्धांत
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अभ्यर्थी परीक्षा नियमों से पहले से अवगत थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभ्यर्थियों ने बिना आपत्ति परीक्षा दी और असफल होने के बाद नियमों को चुनौती देना एस्टॉपल (Estoppel) और एक्वायसेंस (Acquiescence) के सिद्धांत के विरुद्ध है।
हाईकोर्ट ने इस आधार पर पुनर्मूल्यांकन या मॉडरेशन की मांग को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि RPSC की परीक्षा और मूल्यांकन प्रक्रिया कानूनसम्मत, पारदर्शी और निष्पक्ष है। केवल चयन संख्या कम होने से प्रक्रिया अवैध नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती मानकों से समझौता कर पद भरना लोकहित में नहीं है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने परीक्षा को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को रद्द कर दिया है।