मोटर वाहन अधिनियम से मुआवजा लेने के बाद वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट के तहत दावा अवैध, मुआवजा राशि वापस बीमा कंपनी को ब्याज सहित लौटाने के आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मुआवजा कानून से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि एक ही सड़क दुर्घटना या घटना के लिए पीड़ित या आश्रित दो अलग-अलग कानूनों के तहत मुआवजा नहीं ले सकते।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मुआवजा प्राप्त कर लिया है, तो वह उसके बाद वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट, 1923 के तहत अलग से दावा नहीं कर सकता।
यह अहम फैसला जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से दायर दो सिविल मिक्स्ड अपीलों को स्वीकार करते हुए वर्कमैन कम्पनसेशन कमिश्नर द्वारा दिए गए बाद के मुआवजा आदेशों को रद्द कर दिया है।
मुआवजा राशि लौटाने के आदेश
हाईकोर्ट ने एक ही मामले में मोटर वाहन अधिनियम से मुआवजा प्राप्त करने के बाद वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट के तहत प्राप्त की गई मुआवजा राशि को बीमा कंपनी को ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि दावेदारों ने वर्कमैन कम्पनसेशन के तहत जो राशि प्राप्त की है, उसे साधारण ब्याज सहित बीमा कंपनी को वापस लौटाया जाए।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यह भुगतान बिना किसी देरी के किया जाए।
ये हैं मामला
यह मामला दो अलग-अलग दुर्घटनाओं से जुड़ा है, जिसमें—
पहला हादसा या घटना: 21 अप्रैल 2009, जिसमें जगदीश नामक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
दूसरा हादसा: 29 जनवरी 2003, जिसमें कई लोग घायल हुए।
इन दोनों मामलों में मृतक/घायलों के आश्रितों ने पहले मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में मुआवजा याचिकाएँ दायर कीं।
इस मामले में MACT द्वारा एक मामले में लगभग ₹4.44 लाख और दूसरे मामले में लगभग ₹4.43 लाख का मुआवजा मंजूर किया गया, जिसे संबंधित दावेदारों ने प्राप्त भी कर लिया।
दूसरा दावा और विवाद की शुरुआत
MACT से मुआवजा प्राप्त करने के बावजूद, दावेदारों ने इसके बाद वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट, 1923 के तहत वर्कमैन कम्पनसेशन कमिश्नर (WCC) के समक्ष दो नई याचिकाएँ दायर कर दीं।
इन याचिकाओं पर WCC ने एक मामले में ₹4.11 लाख, दूसरे मामले में ₹2.95 लाख सहित 12% ब्याज के साथ मुआवजा दे दिया।
इसी को लेकर नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की और कहा कि यह कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।
बीमा कंपनी की दलील
बीमा कंपनी की ओर से अदालत में कहा गया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 167 स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि किसी हादसे पर मुआवजा पाने के लिए दो कानून उपलब्ध हैं, तो दावेदार को केवल एक कानून चुनने का अधिकार है, दोनों का नहीं।
दावेदार पहले ही MACT से मुआवजा प्राप्त कर चुके थे, इसलिए WCC के समक्ष दूसरा दावा अवैध और असंवैधानिक है।
यह स्थिति “डॉक्ट्रिन ऑफ इलेक्शन” (Doctrine of Election) के विरुद्ध है, जिसमें एक बार विकल्प चुन लेने के बाद दूसरा विकल्प नहीं अपनाया जा सकता।
बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डबल मुआवजा कानूनन निषिद्ध है।
दावेदारों की ओर से दलील
दावेदारों की ओर से यह तर्क दिया गया कि MACT में दावा वाहन मालिक/चालक के खिलाफ किया गया था, जबकि WCC में दावा नियोक्ता (Employer) के खिलाफ था।
दोनों दावे अलग-अलग आधार पर हैं, इसलिए दोनों मुआवजे मिल सकते हैं। यदि दोनों जगह मुआवजा दिया गया है, तो राशि को आपस में समायोजित (Adjust) किया जा सकता है।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट की अहम कानूनी व्याख्या
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में धारा 167, मोटर वाहन अधिनियम का विस्तृत विश्लेषण किया और कहा—
“जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु या चोट के लिए मोटर वाहन अधिनियम और वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट—दोनों के तहत मुआवजा संभव हो, वहां दावेदार को केवल एक कानून के तहत दावा करने का विकल्प है, दोनों के तहत नहीं।”
कोर्ट ने इसे Doctrine of Election से जोड़ते हुए कहा कि जब दो समान राहत के विकल्प उपलब्ध हों और दावेदार एक विकल्प चुन ले, तो वह दूसरे विकल्प का उपयोग नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले National Insurance Company Ltd. बनाम Mastan सहित अन्य निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि दोहरी राहत लेना कानून के उद्देश्य के विपरीत है।
अदालतों को “मोलभाव का मंच” (Bargaining Forum) नहीं बनाया जा सकता। मुआवजा कानून का उद्देश्य न्याय है, लाभ कमाना नहीं।
वर्कमैन कम्पनसेशन के आदेश रद्द
इन सभी तथ्यों और कानून की व्याख्या के आधार पर हाईकोर्ट ने वर्कमैन कम्पनसेशन कमिश्नर द्वारा दिए गए दोनों मुआवजा आदेशों को रद्द कर दिया।
दावेदारों द्वारा दायर बाद की याचिकाओं को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।