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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड वाले पुलिस अधिकारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द, पुनर्बहाली के आदेश

Outstanding Service Record Can’t Be Ignored: Rajasthan High Court Quashes Police Inspector’s Compulsory Retirement

हाईकोर्ट ने कहा “वेरी गुड” और “आउटस्टैंडिंग” ACR वाले अधिकारियों को पुराने मामूली दंडों के आधार पर ‘अप्रभावी’ नहीं ठहराया जा सकता

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग में अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अधिकारों और उसकी सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि उत्कृष्ट और लगातार “वेरी गुड” व “आउटस्टैंडिंग” सेवा रिकॉर्ड वाले अधिकारी को केवल पुराने और मामूली दंडों के आधार पर “अप्रभावी” बताकर सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दंड नहीं है, लेकिन इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित में ही किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 53(1) के अंतर्गत यह आवश्यक है कि कर्मचारी की पूरी सेवा प्रोफाइल का समग्र मूल्यांकन किया जाए। यदि “अप्रभाविता” आधार हो, तो पिछले पाँच वर्षों के कार्य निष्पादन को सर्वोपरि महत्व देना अनिवार्य है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने इंस्पेक्टर अरविंद चरण की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को मनमाना, नियमों के विपरीत और गैर-कानूनी करार देते हुए उसे रद्द कर दिया है।

आउटस्टैंडिंग सेवा फिर भी सेवानिवृत्ति

याचिकाकर्ता अरविंद चरण ने 19 अगस्त 1996 को उप निरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) के रूप में राजस्थान पुलिस सेवा जॉइन की थी।

वर्ष 2009 में वह चयन प्रक्रिया के बाद इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नत हुए।

करीब ढाई दशक की सेवा के दौरान उन्हें चुनाव ड्यूटी सहित कई संवेदनशील जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं।

उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में अधिकांश वर्षों में “वेरी गुड” और “आउटस्टैंडिंग” ग्रेडिंग दर्ज रही।

विशेष रूप से 2012-13 से 2018-19 के बीच उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट पाया गया, जिसमें 2016-17 और 2017-18 में लगातार “आउटस्टैंडिंग” प्रविष्टियाँ शामिल हैं।

इसके बावजूद 9 जुलाई 2020 को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) स्तर से उन्हें राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 53(1) के तहत “अप्रभावी” बताते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दे दिया गया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए अधिकारी ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता अरविंद चरण ने संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत यह रिट याचिका दायर करते हुए 9 जुलाई 2020 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके जरिए उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) पर भेज दिया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने पैरवी करते हुए दलील दी कि याचिकाकर्ता ने 19.08.1996 को उप निरीक्षक के रूप में सेवा प्रारंभ की तथा चयन एवं पदोन्नति प्रक्रिया के बाद 20 फरवरी 2009 को निरीक्षक (Inspector of Police) के पद पर पदोन्नत हुआ

अधिवक्ता ने कहा कि उसके संपूर्ण सेवा काल में सेवा रिकॉर्ड उत्कृष्ट (Outstanding) एवं अति उत्तम (Very Good) रहा है।

सेवाकाल में विभिन्न संवेदनशील दायित्व सौंपे गए, जिनमें लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव ड्यूटी भी शामिल रही।

कुछ वर्षों में लगाए गए दंड केवल लघु दंड (Minor Penalties) थे, जो पहले ही समाप्त हो चुके थे और जिनका पुनः सहारा लेना कानूनन अनुचित है। उनके आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 53(1) तथा दिनांक 21.04.2000 के परिपत्र का पालन किए बिना पारित किया गया।

आदेश में न तो सार्वजनिक हित (Public Interest) दर्शाया गया और न ही यह बताया गया कि याचिकाकर्ता ने अपनी उपयोगिता (Utility) कैसे खो दी।

याचिकाकर्ता ने आदेश को मनमाना, गैर-कानूनी और दंडात्मक प्रकृति का बताते हुए निरस्त करने की प्रार्थना की।

सरकार का अधिकार

मामले में राज्य सरकार एवं पुलिस विभाग की ओर से यह दलील दी गई कि नियम 53(1) के अंतर्गत सरकार को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित में किसी कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे सकती है।

याचिकाकर्ता के विरुद्ध पूर्व में विभागीय स्तर पर कई बार अनुशासनात्मक कार्यवाही हुई थी।

सेवा के दौरान याचिकाकर्ता के कार्य निष्पादन को प्रभावी नहीं पाया गया, जिस कारण विभाग ने यह निर्णय लिया।

कोर्ट के सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट द्वारा पूछे गए सवाल को लेकर सरकार यह स्पष्ट नहीं कर पाई कि—

पिछले पाँच वर्षों के सेवा रिकॉर्ड को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई।

आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी एवं रिव्यू कमेटी ने किस आधार पर याचिकाकर्ता को “अप्रभावी” माना।

उत्कृष्ट एवं आउटस्टैंडिंग ACR प्रविष्टियों को क्यों नजरअंदाज किया गया।

शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 53(1) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह केवल “लोकहित” में और ठोस, प्रासंगिक सामग्री के आधार पर ही की जा सकती है।

अदालत ने कहा कि इस शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या चयनात्मक रूप से नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यदि किसी अधिकारी को “अप्रभावी” बताकर सेवानिवृत्त किया जाना है, तो कार्मिक विभाग के 21 अप्रैल 2000 के परिपत्र के अनुसार पिछले पाँच वर्षों के वास्तविक प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जानी अनिवार्य है।

लेकिन इस मामले में स्क्रीनिंग कमेटी और रिव्यू कमेटी ने इस अनिवार्यता की अनदेखी की और पुराने, समाप्त हो चुके, मामूली दंडों को आधार बना लिया।

“दूसरी सज़ा” नहीं दी जा सकती

हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व में दी गई छोटी-मोटी सजाएँ, जो पहले ही निष्पादित हो चुकी हों, उन्हें आधार बनाकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति करना “डबल पनिशमेंट” (दूसरी सज़ा) के समान है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

कोर्ट के अनुसार, किसी अधिकारी के खिलाफ यदि गंभीर आरोप हों, तो उसके लिए विधि-सम्मत अनुशासनात्मक कार्यवाही का रास्ता खुला है, लेकिन अनिवार्य सेवानिवृत्ति को शॉर्टकट के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

उत्कृष्ट रिकॉर्ड बनाम “अप्रभावी” का विरोधाभास

अदालत ने इस बात पर खास जोर दिया कि जिन वर्षों में अधिकारी की सेवा रिपोर्ट “उत्कृष्ट” और “आउटस्टैंडिंग” रही हो, उसी अवधि में उसे “अप्रभावी” बताना अपने आप में विरोधाभासी है। न्यायमूर्ति फरजंद अली ने कहा कि एक ही समय में किसी अधिकारी को उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रमाणपत्र देना और फिर उसे अयोग्य बताकर बाहर का रास्ता दिखाना न्याय और प्रशासनिक निष्पक्षता दोनों के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों-जैसे नंद कुमार वर्मा बनाम झारखंड राज्य और बैikuntha नाथ दास प्रकरण-का हवाला देते हुए कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति तभी टिकाऊ होती है, जब वह पूरे सेवा रिकॉर्ड के समग्र मूल्यांकन पर आधारित हो और हाल के वर्षों के प्रदर्शन को अधिक महत्व दिया गया हो।

आदेश और परिणाम

इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2020 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को सेवा में पुनः बहाल किया जाए और सेवानिवृत्ति की तिथि से सभी notional benefits (काल्पनिक लाभ) प्रदान किए जाएँ। हालांकि, कोर्ट ने लागत (कॉस्ट) लगाने से इनकार किया।

हाईकोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा कि—

अनिवार्य सेवानिवृत्ति दंड नहीं है, लेकिन इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित में ही किया जाना चाहिए।

नियम 53(1) के अंतर्गत यह आवश्यक है कि कर्मचारी की पूरी सेवा प्रोफाइल का समग्र मूल्यांकन किया जाए। यदि “अप्रभाविता” आधार हो, तो पिछले पाँच वर्षों के कार्य निष्पादन को सर्वोपरि महत्व देना अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता के ACR रिकॉर्ड लगातार Very Good एवं Outstanding रहे हैं, विशेष रूप से 2012-13 से 2018-19 तक। पुराने और समाप्त हो चुके लघु दंडों के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना दोहरे दंड (Double Jeopardy) के समान है।

उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड वाले अधिकारी को एक साथ “अप्रभावी” कहना गंभीर विरोधाभास और मनमानेपन को दर्शाता है।

आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी और रिव्यू कमेटी द्वारा सरकारी परिपत्र 21.04.2000 का स्पष्ट उल्लंघन किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Nand Kumar Verma बनाम State of Jharkhand सहित कई निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि चयनात्मक रिकॉर्ड पर आधारित अनिवार्य सेवानिवृत्ति कानूनन अस्वीकार्य है।

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