हाईकोर्ट ने कहा“राइट टू रिमेन साइलेंट” यानी चुप रहने का अधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल आधार
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नार्को टेस्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी आरोपी को नार्को एनालिसिस टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही उसने पहले इसकी सहमति दे दी हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को अपनी सहमति वापस लेने का पूरा अधिकार है और उसे जबरन इस प्रकार के टेस्ट के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने झुंझुनूं निवासी सुभाष सैनी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।
इस मामले में याचिकाकर्ता आरोपी ने पहले नार्को टेस्ट के लिए सहमति दी थी, लेकिन बाद में उसे वापस लेने की मांग की थी।
क्या था पूरा मामला
चिरावा थाना में दर्ज एक मुकदमे की जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के नार्को टेस्ट की अनुमति मांगी थी। आरोपी ने प्रारंभ में सहमति दे दी थी, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने 18 मई 2015 को टेस्ट की अनुमति दे दी।
हालांकि, बाद में आरोपी ने यह कहते हुए अपनी सहमति वापस ले ली कि वह स्वयं के खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इसके बावजूद निचली अदालत ने 9 जुलाई 2015 को उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में दलीलें पेश करते हुए कहा कि प्रारंभिक सहमति परिस्थितिजन्य थी।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने प्रारंभ में नार्को एनालिसिस टेस्ट के लिए सहमति दी थी, लेकिन बाद में उसे यह समझ आया कि यह उसके संवैधानिक अधिकारों के विपरीत है। इसलिए उसने समय रहते अपनी सहमति वापस लेने का निर्णय लिया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) स्पष्ट रूप से यह सुरक्षा देता है कि किसी भी आरोपी को स्वयं के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
यह तर्क रखा गया कि नार्को टेस्ट के दौरान व्यक्ति अर्धचेतन अवस्था में होता है और उसकी इच्छाशक्ति नियंत्रित नहीं रहती, जिससे वह अनजाने में स्वयं के खिलाफ बयान दे सकता है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी प्रक्रिया के लिए सहमत होता है, तो उसे यह अधिकार भी है कि वह बाद में उस सहमति को वापस ले सके।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल इस आधार पर उसकी अर्जी खारिज कर दी कि उसने पहले सहमति दी थी, जबकि यह कानूनन सही नहीं है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यदि नार्को टेस्ट उसकी इच्छा के विरुद्ध कराया जाता है, तो यह अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 20(3) दोनों का उल्लंघन होगा।
सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से लोक अभियोजक (Public Prosecutor) ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वयं स्वेच्छा से नार्को टेस्ट के लिए सहमति दी थी, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने विधिवत आदेश पारित किया।
सरकार ने कहा कि जांच एजेंसी ने कोर्ट की अनुमति और आरोपी की सहमति के आधार पर पूरी प्रक्रिया तय की थी, इसलिए बाद में सहमति वापस लेना उचित नहीं है।
राज्य ने यह तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से निर्णय लिया और उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
प्रतिवादी पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी का जांच में सहयोग करना आवश्यक है और इस प्रकार की सहमति वापस लेना जांच को प्रभावित कर सकता है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी भी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि “राइट टू रिमेन साइलेंट” यानी चुप रहने का अधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल आधार है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग जैसे वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग केवल आरोपी की स्वेच्छा और पूर्ण सहमति से ही किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Selvi बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक (2010) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति पर जबरन नार्को टेस्ट करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
इसके अलावा, हालिया Amlesh Kumar बनाम स्टेट ऑफ बिहार (2025) फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी को नार्को टेस्ट कराने का अधिकार तो है, लेकिन यह उसका पूर्ण (absolute) अधिकार नहीं है। कोर्ट को परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही अनुमति देनी होती है।
सहमति वापस लेना आरोपी का अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में सबसे अहम बात यह कही कि यदि आरोपी ने पहले सहमति दे दी हो, तब भी वह बाद में उसे वापस ले सकता है।
कोर्ट ने कहा कि सहमति को अपरिवर्तनीय (irrevocable) नहीं माना जा सकता। यदि आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध टेस्ट के लिए बाध्य किया जाता है, तो यह उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) तथा आत्म-अभियोग से संरक्षण (अनुच्छेद 20(3)) का उल्लंघन होगा।
नार्को टेस्ट की वैधानिक स्थिति
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि नार्को टेस्ट के दौरान प्राप्त जानकारी स्वयं में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होती।
हालांकि, यदि उस जानकारी के आधार पर कोई नया तथ्य या सबूत मिलता है, तो उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत स्वीकार किया जा सकता है।
कोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 18 मई 2015 और 9 जुलाई 2015 के आदेशों को रद्द करते हुए आरोपी की याचिका स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।