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“प्रशासनिक शक्ति का उपयोग अदालती फैसलो को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता।” RFC पेंशन विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 9 जून 2020 की अधिसूचना असंवैधानिक

Administrative Power Cannot Override Judicial Orders: Rajasthan High Court Quashes RFC Pension Withdrawal Notification

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने राजस्थान फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन (RFC) के सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों से जुड़े बहुचर्चित पेंशन विवाद में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला देते हुए 9 जून 2020 की उस अधिसूचना को अवैध और असंवैधानिक करार दिया, जिसके माध्यम से RFC ने वर्ष 1990 की पेंशन विनियमावली को 21 जून 2004 से पूर्वव्यापी प्रभाव से वापस लेने का निर्णय लिया था।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि एक बार किसी मुद्दे पर अदालत का न्यायिक फैसला अंतिम रूप से हो जाने के बाद, उसी विषय को नए आवरण में पुनः जीवित कर न्यायिक आदेशों को निष्प्रभावी करने का प्रयास विधि-सम्मत नहीं है।

1990 की पेंशन विनियमावली और 2004 का आदेश

RFC ने अपने कर्मचारियों के लिए वर्ष 1990 में पेंशन विनियमावली लागू की थी, जो 1 अप्रैल 1987 से प्रभावी मानी गई।

लेकिन 12 अगस्त 2004 को एक कार्यालय आदेश जारी कर पेंशन योजना को वापस लेने का निर्णय लिया गया और कर्मचारियों को पुनः अंशदायी भविष्य निधि (CPF) योजना के अधीन लाने का प्रयास किया गया।

विभाग के इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। वर्ष 2018 में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 7 मई 2018 के फैसले में विभाग के 2004 के आदेश को अवैध ठहराते हुए कर्मचारियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया—

श्रेणी-I: वे कर्मचारी जो 12 अगस्त 2004 से पूर्व सेवानिवृत्त हुए।

श्रेणी-II: वे कर्मचारी जो 12 अगस्त 2004 के बाद सेवानिवृत्त हुए, लेकिन सेवानिवृत्ति से पूर्व पेंशन योजना का विकल्प चुन चुके थे।

श्रेणी-III: वे कर्मचारी जो उस समय सेवा में थे।

हाईकोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि पेंशन विनियमावली 1990 तब तक प्रभावी रहेगी जब तक उसे विधि के अनुसार, राज्य वित्त निगम अधिनियम, 1951 की धारा 48 के तहत विधिवत प्रक्रिया अपनाकर वापस नहीं लिया जाता।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और अंतिमता

RFC और राज्य सरकार दोनों ने राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, किंतु विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLP) खारिज कर दी गईं।

इसके साथ ही 2004 के आदेश को अवैध ठहराने वाला निर्णय अंतिम हो गया।

इसके बावजूद, RFC ने 21 जुलाई 2017 को एक नई अधिसूचना जारी कर पुनः पेंशन विनियमावली को पूर्वव्यापी प्रभाव से वापस लेने का प्रयास किया, जिसे 26 फरवरी 2020 को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया, हालांकि निगम को विधि अनुसार नई प्रक्रिया अपनाने की स्वतंत्रता दी गई।

9 जून 2020 की अधिसूचना: फिर वही प्रयास

26 फरवरी 2020 के निर्णय के बाद RFC के निदेशक मंडल ने 18 मार्च 2020 को बैठक कर वित्तीय स्थिति और कानूनी राय के आधार पर पेंशन विनियमावली को 21 जून 2004 से पूर्वव्यापी प्रभाव से वापस लेने का प्रस्ताव पारित किया।

राज्य सरकार और SIDBI से अनुमति प्राप्त कर 9 जून 2020 को अधिसूचना जारी कर दी गई।
इसी अधिसूचना को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता Sandeep Saxena, Ashwinee Kumar Jaiman और Dharam Veer Jashmani ने 9 जून 2020 की अधिसूचना को पूर्णतः अवैध, असंवैधानिक एवं अदालत के पूर्व आदेशों के विपरीत बताया।

अधिवक्ताओं ने कहा कि विवाद पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुका है, इसलिए उसी विषय को पुनः अधिसूचना जारी कर जीवित करना न्यायिक आदेश की अवमानना के समान है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि याचिकाकर्ता श्रेणी-II में आते हैं, अर्थात् वे 12 अगस्त 2004 के बाद सेवानिवृत्त हुए, लेकिन सेवानिवृत्ति से पूर्व पेंशन योजना का विकल्प चुन चुके थे।

अधिवक्ता ने कहा कि खंडपीठ ने स्पष्ट कहा था कि ऐसे कर्मचारियों को पेंशन लाभ मिलेगा, इसलिए 9 जून 2020 की अधिसूचना उनके अर्जित अधिकारों का हनन है।

अधिवक्ता ने कहा कि अधिसूचना को 21 जून 2004 से प्रभावी बताया गया, जबकि पूर्वव्यापी प्रभाव देकर अर्जित पेंशन अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।

यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन है।

अधिवक्ता ने कहा कि सरकार या निगम सामान्य कानून बदल सकते हैं, लेकिन किसी विशिष्ट न्यायिक आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।

अधिवक्ता ने कहा कि 26 फरवरी 2020 के निर्णय में RFC को “कानून के अनुसार आगे कार्यवाही करने” की स्वतंत्रता दी गई थी, लेकिन वह स्वतंत्रता केवल श्रेणी-III (सेवा में कार्यरत कर्मचारियों) से संबंधित थी।

अधिवक्ता ने कहा कि श्रेणी-I और श्रेणी-II के अधिकार पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुके थे, इसलिए RFC द्वारा सभी श्रेणियों पर लागू करना न्यायालय की मंशा के विपरीत है।

अधिवक्ता ने कहा कि 9 जून 2020 की अधिसूचना का उद्देश्य 7 मई 2018 के न्यायिक निर्णय को कमजोर करना है। यह “Rule of Law” के विरुद्ध है।

सुनवाई के दौरान RFC ने अपनी खराब वित्तीय स्थिति का हवाला दिया, जिस पर याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वित्तीय कठिनाई संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करने का आधार नहीं हो सकती।

RFC का जवाब

RFC की ओर से याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता B.S. Chhaba, Rahul Gupta, AAAG, Hardik Singh, AAAG, Satyam Bhardwaj, Virendra Lodha, Ankit Rathore, Ramdhan, Asst. G.C. और Asst. G.C. Shruti ने कहा कि राज्य वित्त निगम अधिनियम, 1951 की धारा 48 निगम को विनियम बनाने और वापस लेने का अधिकार देती है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि अधिसूचना जारी करने से पहले 18 मार्च 2020 की बोर्ड बैठक में निर्णय लिया गया था और SIDBI से परामर्श लिया गया था।

अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि इस मामले में राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त की गई और उसके बाद ही राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित की गई।

अधिवक्ताओं ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 21 जुलाई 2017 की अधिसूचना रद्द करते समय निगम को “कानून के अनुसार आगे बढ़ने” की स्वतंत्रता दी थी।

इसलिए प्रक्रिया विधि अनुसार पूर्ण की गई और उसी के तहत मिली स्वतंत्रता के आधार पर 9 जून 2020 की अधिसूचना जारी की गई।

अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि

निगम की वित्तीय स्थिति अत्यंत दयनीय है और लगभग 1/3 कर्मचारी रिवर्स डेपुटेशन पर भेजे गए। कई क्षेत्रीय कार्यालय बंद कर दिए गए। इसलिए प्रशासनिक व्यय कम करने के लिए पेंशन योजना वापस लेना आवश्यक था।

अधिवक्ताओं ने दलील दी कि धारा 48(3) के तहत विनियमों को पूर्वव्यापी प्रभाव से भी लागू या निरस्त किया जा सकता है।

जवाब में कहा गया कि निगम का उद्देश्य न्यायिक आदेश को निरस्त करना नहीं था, बल्कि विधि के अनुसार प्रक्रिया अपनाकर नया निर्णय लेना था।

इसलिए यह नई और स्वतंत्र कार्रवाई है, न कि पुराने आदेश की पुनरावृत्ति।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि 9 जून 2020 की अधिसूचना उसी मुद्दे को फिर से जीवित करने का प्रयास है, जिसे पहले ही न्यायालय अवैध ठहरा चुका है।

हाईकोर्ट ने कहा कि

निगम ने पूर्व में लिए गए निर्णय को बार-बार दोहराया है और वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर न्यायिक आदेशों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट तक मामला अंतिम रूप से तय हो चुका हो, तब प्रशासनिक निर्णय के जरिए उसे पलटना विधि के शासन के विपरीत है।

कोर्ट ने कहा कि

हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद पूर्वव्यापी प्रभाव से योजना समाप्त करना मनमाना और असंवैधानिक है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि 26 फरवरी 2020 के निर्णय में दी गई “आगे विधि अनुसार कार्यवाही की स्वतंत्रता” का अर्थ यह नहीं था कि पहले से तय श्रेणी-I और श्रेणी-II के अधिकारों को पुनः समाप्त किया जा सकता है।

“Rule of Law सर्वोपरि”

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विधायिका या प्रशासन सामान्य कानून में संशोधन कर सकते हैं, लेकिन किसी विशिष्ट मामले में पारित न्यायिक आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।

कोर्ट ने माना कि 9 जून 2020 की अधिसूचना का उद्देश्य पहले दिए गए न्यायिक फैसलों को कमजोर करना था। ऐसा प्रयास संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है।

कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से श्रेणी-II के कर्मचारियों के संदर्भ में कहा कि जिन्होंने सेवानिवृत्ति से पूर्व पेंशन विकल्प चुना था, जिनके अधिकार 2018 के निर्णय से सुरक्षित हो चुके थे, उन्हें पुनः अनिश्चितता में डालना न्यायसंगत नहीं है।

बार-बार एक ही मुद्दे को उठाकर कर्मचारियों को वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझाए रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने 9 जून 2020 की अधिसूचना को अवैध और असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

“प्रशासनिक शक्ति का उपयोग न्यायिक आदेशों को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता।”

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