टॉप स्टोरी

‘तलाक के बाद पिता की सहमति नहीं होने पर भी नहीं रोक सकते बच्चे का पासपोर्ट’, हाईकोर्ट का पासपोर्ट अथॉरिटी को तुरंत पासपोर्ट जारी करने का आदेश; कहा- बच्चे का भविष्य किसी एक अभिभावक की इच्छा पर निर्भर नहीं

चर्चित खबरें

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 1990 की पदोन्नति के 30 साल बाद कर्मचारी को मिलेगा पूरा वेतन-भत्ता

जयपुर, 21 सितंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में याचिकाकर्ता कर्मचारी को बड़ी राहत दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 1990 में अजमेर नगर निगम में जमादार से एलडीसी के पद पर पदोन्नत हुए याचिकाकर्ता को उसकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2005 तक कुल 15 साल के सभी वेतन-भत्ते और लाभ देने के आदेश दिए हैं।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने पुष्पेंद्र सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने प्रतिवादी विभाग को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को उसकी पदोन्नति 28 मई 1990 से वास्तविक वेतन और भत्ते दे।

हाईकोर्ट ने उक्त बकाया राशि का भुगतान अगले दो माह में करने के आदेश दिए हैं।
देरी होने पर प्रतिवादी विभाग को संपूर्ण राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।

जमादार के पद पर नियुक्ति

अजमेर नगर निगम में याचिकाकर्ता को वर्ष 1976 में जमादार के पद पर नियुक्ति मिली थी।

विभाग में 1990 में हुई डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) की बैठक में उससे जूनियर कर्मचारियों को पदोन्नत कर दिया गया, लेकिन याचिकाकर्ता को पदोन्नति नहीं दी गई।

इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने 1990 में राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

2001 में राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर निकाय को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को भी उसके कनिष्ठों की तिथि से पदोन्नत किया जाए।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2008 में याचिकाकर्ता को 28 मई 1990 से एलडीसी पद पर नियमित पदोन्नति दी गई।

लेकिन अजमेर निकाय की ओर से केवल काल्पनिक लाभ (notional benefits) दिए गए और वास्तविक वेतन-भत्ते देने से इनकार कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने एक बार फिर उसके साथ हुए इस भेदभाव को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता का तर्क

राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुनील समदड़िया और अरिहंत समदड़िया ने पैरवी करते हुए सरकार के फैसले को गलत बताया।

अधिवक्ताओं ने कहा कि सरकार का आदेश उस स्थिति में लागू होता है जब याचिकाकर्ता की कोई गलती हो।

लेकिन इस मामले में खुद सरकार ने याचिकाकर्ता के साथ अन्याय किया है।

उन्होंने कहा कि इस मामले में पहले ही याचिकाकर्ता को अपने से जूनियर की पदोन्नति पर बहुत कुछ सहन करना पड़ा है, जबकि उसने भी उनके समान ही कार्य किया है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि चूंकि इस मामले में सरकार की तरफ से अन्याय हुआ है, इसलिए नो वर्क नो पे का सिद्धांत यहां लागू नहीं किया जा सकता।

सरकार ने किया विरोध

हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि नियमों के अनुसार, पूर्व वर्षों की रिक्तियों के लिए बाद में की गई डीपीसी में चयनित कर्मचारियों को केवल काल्पनिक लाभ मिलते हैं, वास्तविक वेतन नहीं।

सरकार ने वित्त विभाग के 30 जुलाई 2012 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि इस आदेश के अनुसार याचिकाकर्ता को केवल काल्पनिक लाभ ही दिए जा सकते हैं।

इस आदेश में राजस्थान सरकार के वित्त विभाग ने यह स्पष्ट किया था कि यदि किसी पूर्व वर्ष की रिक्तियों पर बाद में डीपीसी (Departmental Promotion Committee) आयोजित की जाती है, तो चयनित कर्मचारी को केवल काल्पनिक लाभ (notional benefits) मिलेंगे और वास्तविक वेतन व भत्ते उसी तारीख से मिलेंगे जब वह पदभार ग्रहण करेगा।

साथ ही आदेश में यह भी प्रावधान था कि यह नियम 01 अप्रैल 2012 से प्रभावी माना जाएगा।

30 जुलाई 2012 का यह आदेश पूर्व प्रभाव (retrospective effect) से लागू नहीं होता।

सरकार की दलील खारिज

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के रमेश कुमार बनाम भारत संघ (2015) के अनुसार, ऐसे मामलों में “नो वर्क नो पे” का सिद्धांत लागू नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पदोन्नति में देरी विभाग की लापरवाही से हुई है, तो कर्मचारी को उसके हक़ का पूरा वेतन और भत्ता मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्त विभाग का 30 जुलाई 2013 का आदेश इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि यह निर्देश 1 अप्रैल 2012 से प्रभावी हुआ है, जबकि याचिकाकर्ता को 2008 में ही 1990 से पदोन्नति दी जा चुकी थी।

सबसे अधिक लोकप्रिय

Father’s Consent Not Mandatory for Child’s Passport After Divorce, Rajasthan High Court Orders Immediate Issuance

‘तलाक के बाद पिता की सहमति नहीं होने पर भी नहीं रोक सकते बच्चे का पासपोर्ट’, हाईकोर्ट का पासपोर्ट अथॉरिटी को तुरंत पासपोर्ट जारी करने का आदेश; कहा- बच्चे का भविष्य किसी एक अभिभावक की इच्छा पर निर्भर नहीं