जोधपुर, 3 नवम्बर 2025:
राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने दिवंगत पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश बी.डी. सरस्वत के निधन के 13 साल बाद एक ऐतिहासिक फैसले में उनको बर्खास्त करने के राज्यपाल के आदेश को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने दिवंगत जिला न्यायाधीश के बर्खास्तगी आदेश को असंवैधानिक करार दिया है।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने सोमवार को वर्ष 2010 में पारित सरस्वत की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उनके खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों” के विपरीत थी और साक्ष्यों के अभाव में आरोप साबित नहीं होते थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट और हाईकोर्ट फुल कोर्ट बैठक की कार्यवाही में गंभीर कानूनी खामियाँ थीं तथा निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
गलत आदेश से दंडित नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने 30 पेज के फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए दंडित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने कोई आदेश पारित किया जो बाद में गलत पाया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक यह सिद्ध न हो कि आदेश दुर्भावनापूर्ण, पक्षपाती या भ्रष्ट मंशा से पारित हुआ, तब तक उसे ‘दुर्व्यवहार’ नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरस्वत ने तीसरी जमानत याचिका पर कानूनी रूप से अनिवार्य ‘वैधानिक जमानत’ (Statutory Bail) दी थी क्योंकि आरोपी को 90 दिनों से अधिक हिरासत में रखा गया था और चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी।
कोर्ट ने कहा, इस परिस्थिति में जमानत देना न्यायिक विवेक नहीं बल्कि वैधानिक बाध्यता थी।
जांच और अनुशासनात्मक प्रक्रिया पर सवाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जांच अधिकारी ने ऐसे दस्तावेजों पर भरोसा किया जो आरोप-पत्र में शामिल ही नहीं थे।
फुल कोर्ट ने बिना किसी ठोस कारण बताए जांच रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और राज्यपाल से बर्खास्तगी की अनुशंसा कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया न्याय के मूल सिद्धांतों और अनुशासनिक नियमों के अनुरूप नहीं थी।
कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी और फुल कोर्ट दोनों ने असंबंधित व बाहरी साक्ष्यों (extraneous evidence) पर भरोसा किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी “विवेकशील व्यक्ति” इन साक्ष्यों के आधार पर ऐसे निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकता था कि दिवंगत न्यायाधीश ने पक्षपातपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट और फुल कोर्ट द्वारा उसे स्वीकार करने के फैसले दोनों को तर्कहीन और प्रमाणहीन बताते हुए रद्द कर दिया है।
राज्यपाल का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि राज्यपाल का बर्खास्तगी आदेश “गैर-युक्तिसंगत” और “निरर्थक” (non-speaking order) था।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्यपाल का आदेश न्यायिक आदेश जितना विस्तृत होना आवश्यक नहीं होता, बशर्ते उसमें विचार और विवेक के प्रयोग के संकेत हों।
फुल कोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में फुल कोर्ट की बैठक में लिए गए निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि फुल कोर्ट एक संवैधानिक संस्था है और उसका निर्णय संविधान प्रदत्त प्रशासनिक अधिकारों के तहत लिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि फुल कोर्ट अनेक संवैधानिक पदाधिकारियों की सामूहिक बुद्धि से निर्णय लेती है।
ऐसे में यह मान लिया जाता है कि उसने विचारपूर्वक और सचेत निर्णय लिया है। इसलिए प्रत्येक तथ्य पर विस्तृत टिप्पणी देना आवश्यक नहीं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुल कोर्ट की अनुशंसा में कोई प्रक्रिया संबंधी त्रुटि नहीं थी, परंतु जांच अधिकारी और फुल कोर्ट दोनों के निष्कर्ष साक्ष्यों से मेल नहीं खाते थे।
संपूर्ण वेतन-भत्ते देने के आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य नियम के अनुसार यदि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी अवैध पाई जाती है, तो पुनर्स्थापन के साथ पूर्ण वेतन और भत्तों (Back Wages) का भुगतान किया जाता है।
हाईकोर्ट ने सरस्वत के परिजनों को 8 अप्रैल 2010 से 28 फरवरी 2011 तक का पूर्ण वेतन, सेवा निरंतरता तथा सभी सेवानिवृत्ति लाभ (पेंशन सहित) देने के आदेश दिए हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि इस प्रकार के अनुशासनिक कदम यदि केवल न्यायिक आदेशों के आधार पर उठाए जाएँ, तो यह न्यायिक स्वतंत्रता और जजों के निडर होकर निर्णय करने की भावना को प्रभावित करेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि “न्यायिक विवेक का प्रयोग गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा है।”
15 साल बाद मिला न्याय
वर्ष 2005 में दिवंगत जिला न्यायाधीश बी.डी. सरस्वत विशेष एनडीपीएस (NDPS) कोर्ट, प्रतापगढ़ में विशेष जज नियुक्त थे।
एनडीपीएस के एक आरोपी की तीसरी जमानत याचिका स्वीकार करने पर अधिवक्ता अशोक कुमार वैष्णव ने शिकायत दर्ज करवाई थी।
इसके बाद 6 मार्च 2009 को जांच अधिकारी ने रिपोर्ट सौंपी, जिस पर 1 जुलाई 2009 और 2 फरवरी 2010 को फुल कोर्ट ने सरस्वत की बर्खास्तगी की अनुशंसा की।
राज्यपाल ने 8 अप्रैल 2010 को उन्हें सेवा से बर्खास्त किया।
सरस्वत ने राज्यपाल के आदेश, फुल कोर्ट की अनुशंसा और जांच अधिकारी की रिपोर्ट को हाईकोर्ट में याचिका के माध्यम से चुनौती दी।
परिजनों ने लड़ी कानूनी लड़ाई
इस प्रक्रिया के दौरान 26 मई 2012 को सरस्वत का निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी और बच्चों ने यह मामला आगे बढ़ाया।
बाद में पत्नी के निधन के बाद पुत्र अमित सरस्वत और पुत्री मधु सरस्वत ने न्याय के लिए लड़ाई जारी रखी।
कानूनी बिंदुओं पर बहस
सरस्वत के परिजनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एस. सिंघवी ने पैरवी की और कहा कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन हुआ।
उन्होंने कहा कि सरस्वत ने 5 फरवरी 2010 को अपनी स्पष्टीकरण रिपोर्ट जमा की थी, लेकिन उससे तीन दिन पहले (2 फरवरी 2010) ही फुल कोर्ट ने बर्खास्तगी की सिफारिश कर दी थी।
राज्यपाल ने 8 अप्रैल 2010 को बर्खास्तगी का आदेश पारित किया, बिना उस स्पष्टीकरण पर विचार किए, जिससे आदेश “गैर-विचारशील (Non-Speaking Order)” हो गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश पंवार और जी.आर. पुनिया ने कहा कि सरस्वत को जवाब देने का पूरा अवसर दिया गया था और राज्यपाल के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है.
कई दलीलें हुईं खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दिवंगत जिला न्यायाधीश के वारिसों की ओर से दी गई दलीलों को खारिज किया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत दंड निर्धारण के चरण पर अलग से सुनवाई या स्पष्टीकरण का अवसर देना आवश्यक नहीं होता।
याचिकाकर्ता पक्ष की यह दलील कि पूर्णपीठ के निर्णय के बाद दी गई व्याख्या को भी विचार में लिया जाना चाहिए, हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि वह चरण पहले ही पूर्ण हो चुका था, इसलिए बाद में दिया गया कोई स्पष्टीकरण कानूनी दृष्टि से मान्य नहीं है।