बिना मानक प्रक्रिया (SOP) के ड्रोन मैपिंग को बताया गया मनमाना, नोटिस पर अंतरिम रोक; प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना
जयपुर। राजस्थान में स्टोन क्रेशर इकाइयों के खिलाफ ड्रोन मैपिंग सर्वे के आधार पर की जा रही कार्रवाई पर राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप करते हुए सरकार द्वारा जारी नोटिस पर रोक लगा दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि बिना निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के ड्रोन सर्वे कर कार्रवाई करना prima facie (प्रथम दृष्टया) अनुचित और मनमाना प्रतीत होता है।
जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकलपीठ ने यह आदेश श्री श्याम बोहरा कंपनी व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
इन याचिकाओं में याचिकाकर्ता कंपनी ने सरकार और खान विभाग की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता एक स्टोन क्रेशर यूनिट संचालित करता है, जो खनन विभाग की गाइडलाइन के अनुसार कार्यरत है और आवश्यक अनुमतियां (NOC) प्राप्त कर चुका है।
याचिका में कहा गया कि विभाग ने समय-समय पर निरीक्षण किया, लेकिन पहले निरीक्षण पारंपरिक तरीकों (कंपास और टेप) से होता था।
हालांकि, बाद में अचानक ड्रोन सर्वे (UAV तकनीक) के माध्यम से वॉल्यूमेट्रिक असेसमेंट (खनिज की मात्रा का आकलन) शुरू कर दिया गया।
विभाग की कार्रवाई: नोटिस और आरोप
ड्रोन सर्वे के आधार पर विभाग ने दावा किया कि साइट पर 9928.30 टन खनिज उपलब्ध था, जबकि सत्यापन में केवल 7965 टन मिला।
करीब 1963.21 टन खनिज अवैध रूप से ट्रांसपोर्ट/भंडारित करने के आधार पर याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर पेनल्टी और अन्य कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अरविंद सोनी ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि ड्रोन सर्वे तकनीक भविष्य की योजना और मैपिंग के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसे पिछली अवधि के वॉल्यूमेट्रिक असेसमेंट के लिए इस्तेमाल करना वैज्ञानिक रूप से गलत है।
याचिका में कहा गया कि DSM और DTM मॉडल एल्गोरिद्म आधारित होते हैं। पेड़, मशीनें और अन्य ऑब्जेक्ट्स गलत डेटा दे सकते हैं, जिससे “ghost volume” जैसी त्रुटियां संभव हैं।
अधिवक्ता ने कहा कि बिना SOP के किसी भी सर्वे को कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।
अधिवक्ता ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है कि बिना नोटिस दिए और सुनवाई का अवसर दिए ही एकतरफा रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की गई।
याचिकाकर्ता ने पूर्व मामलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना नोटिस के सर्वे अवैध है और एक्स-पार्टी रिपोर्ट के आधार पर पेनल्टी नहीं लगाई जा सकती। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने ड्रोन सर्वे के लिए कोई स्पष्ट SOP जारी नहीं की।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि कंपनियों के लिए नियम 91(4) के तहत SOP बनाना आवश्यक है, अधिवक्ता ने दलील दी कि जारी किए गए नोटिस में भी उल्लेख है कि SOP केवल “एरियल इमेजेस” के लिए था, स्टोन क्रेशर यूनिट्स के लिए विशेष SOP अब तक तैयार नहीं किया गया है।
एक्स-पार्टी ड्रोन सर्वे पर आपत्ति
याचिका में यह भी कहा गया कि ड्रोन सर्वे बिना किसी पूर्व सूचना के किया गया। स्टॉक का भौतिक सत्यापन नहीं किया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि FRP (Fixed Reference Point) वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित नहीं किया गया, याचिकाकर्ता को न तो सर्वे की जानकारी दी गई, न ही मौके पर उपस्थित रहने का अवसर दिया गया।
याचिका में कहा गया कि यह सर्वे पूरी तरह एकतरफा (ex-parte) था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट ने लगाई रोक
प्राथमिक सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गंभीरता से इन बिंदुओं पर विचार किया और पाया कि SOP के बिना ड्रोन सर्वे संदिग्ध है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट ने कहा कि एकतरफा कार्रवाई उचित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने:
सरकार द्वारा जारी नोटिस पर अंतरिम रोक लगा दी और आगे की कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगाते हुए सरकार सहित विभागों को नोटिस जारी किया गया है।