हाईकोर्ट ने कहा -मैं मौके पर नहीं था का दावा यानी अलिबी दावे के आधार पर नहीं रुक सकती न्याय प्रक्रिया, आरोपी को करना होगा ट्रायल का सामना
जयपुर, 25 मार्च 2026। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले में एक महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल “अलिबी” (घटना के समय किसी अन्य स्थान पर होने का दावा) के आधार पर किसी आरोपी को ट्रायल से बाहर नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक बचाव (defence) का विषय है, जिसे ट्रायल के दौरान साबित किया जाना चाहिए, न कि संज्ञान (cognizance) के प्रारंभिक चरण में।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट विक्रम शर्मा व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 319 सीआरपीसी के तहत उन्हें आरोपी बनाकर संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी थी।
मामला क्या है?
यह मामला 10 नवंबर 2016 की रात अजमेर के एक इनडोर स्टेडियम में हुई एक गंभीर आपराधिक घटना से जुड़ा है।
घटना के अगले दिन मृतक की पत्नी स्नेहलता चौधरी द्वारा एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसमें कई आरोपियों के साथ याचिकाकर्ताओं के नाम भी शामिल थे।
एफआईआर में आरोप था कि सभी आरोपियों ने मिलकर हमला किया, जिसमें हत्या (302 IPC), हत्या का प्रयास (307 IPC), दंगा (147, 148 IPC) और आपराधिक षड्यंत्र (120B IPC) जैसे गंभीर अपराध शामिल थे।
याचिकाकर्ता आरोपियों का पक्ष
आरोपी याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण कानूनी और तथ्यात्मक दलीलें रखी गईं।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे घटना स्थल पर मौजूद ही नहीं थे। अधिवक्ता ने कहा कि जांच एजेंसी CID (CB) ने विस्तृत जांच के बाद पाया कि
- याचिकाकर्ता विक्रम शर्मा घटना स्थल से लगभग 5 किमी दूर था,
- जबकि दूसरा याचिकाकर्ता करीब 15 किलोमीटर दूर पुष्कर में था।
पुलिस जांच में क्लीन चिट
अधिवक्ता ने कहा कि मोबाइल कॉल डिटेल्स (CDR) और अन्य साक्ष्यों से यह साबित हुआ कि उनकी उपस्थिति घटना स्थल पर नहीं थी। इसलिए, उनके खिलाफ अपराध में शामिल होने का कोई ठोस आधार नहीं है।
अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस जांच में याचिकाकर्ताओं को क्लीन चिट दी गई। जांच के बाद CID (CB) ने पाया कि आरोप साबित नहीं होते। इस आधार पर धारा 169 CrPC के तहत उन्हें रिहा करने की सिफारिश की गई।
अधिवक्ता ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने भी इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब जांच एजेंसी ने उन्हें निर्दोष पाया, तो बाद में उन्हें आरोपी बनाना अनुचित है।
अधिवक्ता ने कहा कि शिकायतकर्ता ने ट्रायल शुरू होने से पहले ही धारा 319 CrPC का आवेदन दे दिया, उस समय तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ था।
दलील दी गई कि धारा 319 CrPC का प्रयोग तभी होना चाहिए, जब ट्रायल के दौरान मजबूत साक्ष्य सामने आएं।
अधिवक्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल मृतक की पत्नी के बयान के आधार पर संज्ञान लिया और अन्य साक्ष्यों व जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया।
अधिवक्ता ने कहा कि एक पक्षीय बयान के आधार पर संज्ञान लेना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट को CID की रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों पर भी विचार करना चाहिए था।
अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के Brijendra Singh vs State of Rajasthan (2017) और Jogendra Yadav vs State of Bihar (2015) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 319 CrPC के तहत आरोपी बनाने के लिए साधारण prima facie से अधिक मजबूत साक्ष्य आवश्यक हैं।
अधिवक्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते समय पर्याप्त कारण (reasoning) नहीं दिए और यह नहीं बताया कि जांच एजेंसी की रिपोर्ट को क्यों खारिज किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें झूठा फंसाया गया है। शिकायतकर्ता ने व्यक्तिगत कारणों से उनके नाम जोड़े। इसलिए आदेश कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण है।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता का जवाब
राज्य सरकार और मृतक के परिजनों की ओर से याचिका का विरोध किया गया।
सरकार ने कहा कि FIR और गवाह के बयान में स्पष्ट आरोप हैं और FIR में याचिकाकर्ताओं के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।
सरकार ने कहा कि मृतक की पत्नी ने पुलिस बयान (धारा 161 CrPC) में और कोर्ट में दिए गए बयान में दोनों जगह आरोपियों की भूमिका स्पष्ट बताई, जो कि सीधे-सीधे उनकी संलिप्तता दर्शाता है।
सरकार ने कहा कि गवाह का कोर्ट में दिया गया बयान मजबूत साक्ष्य है। कोर्ट में दिया गया बयान (evidence on oath) अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जिसे जांच रिपोर्ट से अधिक महत्व दिया जाता है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि धारा 319 CrPC का उद्देश्य असली अपराधी को सजा देना है। यदि जांच एजेंसी किसी आरोपी को छोड़ देती है, तो कोर्ट के पास उसे शामिल करने की शक्ति है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत “कोर्ट का कर्तव्य है कि असली अपराधी को सजा दिलाई जाए” का हवाला देते हुए कहा कि यह सिद्धांत इस केस पर लागू होता है।
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत से कहा कि जांच एजेंसी की रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं है और पुलिस की रिपोर्ट अंतिम नहीं होती है। कोर्ट स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती है।
यदि कोर्ट को साक्ष्यों से आरोपी की संलिप्तता दिखती है, तो वह उसे ट्रायल में शामिल कर सकती है।
अलिबी (Alibi) बचाव का विषय है, अभी नहीं। याचिकाकर्ता जो “अलिबी” का दावा कर रहे हैं, वह एक defence plea है, जिसे ट्रायल के दौरान साबित करना होगा।
इस स्तर पर कोर्ट केवल यह देखती है कि prima facie मामला बनता है या नहीं।
सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के Sandeep Kumar vs State of Haryana (2024) और Hardeep Singh vs State of Punjab (2014) के अनुसार संज्ञान के समय साक्ष्य की गहराई से जांच नहीं होती और कोर्ट को नए आरोपी को ट्रायल में शामिल करने का अधिकार है।
इन फैसलों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का आदेश सही है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को ट्रायल का सामना करना ही होगा।
अलिबी बनाम गवाह
यह मामला मूल रूप से “अलिबी बनाम गवाह के बयान” का टकराव है।
याचिकाकर्ता जहां खुद को निर्दोष बताते हैं, वहीं प्रतिवादी गवाह के प्रत्यक्ष बयान को आधार बनाकर उन्हें ट्रायल में शामिल करने की मांग करता है।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित करते हुए कहा कि अलिबी केवल बचाव है, प्रारंभिक स्तर पर नहीं माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि “अलिबी” एक बचाव का तर्क है, जिसे आरोपी को ट्रायल के दौरान साबित करना होता है। संज्ञान के समय इस पर विचार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय (Harjinder Singh केस) का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञान के स्तर पर “prima facie” (प्रथम दृष्टया) साक्ष्य पर्याप्त होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के बचाव (defence documents) को इस स्तर पर निर्णायक नहीं माना जा सकता।
यदि गवाह का बयान किसी व्यक्ति की संलिप्तता दर्शाता है, तो उसे ट्रायल का सामना करना होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ट्रायल के दौरान किसी नए व्यक्ति के खिलाफ साक्ष्य सामने आता है, तो कोर्ट उसे आरोपी बना सकती है। यह न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है, ताकि असली अपराधी बच न सके।
हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की रिपोर्ट पर कहा कि पुलिस या जांच एजेंसी की राय अंतिम नहीं होती। कोर्ट स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का मूल्यांकन कर सकती है।
अंतिम निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर, धारा 161 CrPC के बयान और कोर्ट में दिए गए गवाह के बयान में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ स्पष्ट आरोप हैं। यह “प्रथम दृष्टया” से अधिक मजबूत साक्ष्य है, जो उन्हें ट्रायल के लिए बुलाने के लिए पर्याप्त है।
कोर्ट ने कहा कि अलिबी का दावा ट्रायल के दौरान ही परखा जाएगा। इस आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।