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BIFR की पुनर्वास योजना से मुकर नहीं सकती सरकार: राजस्थान हाईकोर्ट ने RIICO के 7.64 करोड़ के वसूली नोटिस को किया रद्द

BIFR Rehabilitation Scheme Binding on State and RIICO: Rajasthan High Court Sets Aside ₹7.64 Crore Recovery Demand
हाईकोर्ट ने कहा-पुनर्वास योजना एक बार स्वीकृत होने के बाद सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होती है और सरकारी एजेंसियां भी उससे पीछे नहीं हट सकतीं।

जयपुर। देश में बीमार उद्योगों के पुनर्जीवन के लिए जारी की जाने वाली योजना के पालन को लेकर सरकार और वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी तय करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने कॉरपोरेट लॉ से जुड़े इस मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए कहा है कि बीआईएफआर (BIFR) द्वारा स्वीकृत पुनर्वास योजना (Rehabilitation Scheme) सभी संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होती है और बाद में कोई भी पक्ष उससे पीछे नहीं हट सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में रीको (RIICO) द्वारा याचिकाकर्ता कंपनी को भेजे गए 7.64 करोड़ रुपये की वसूली नोटिस को अवैध और मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला लॉर्ड्स क्लोरो अल्काली लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर सुनाया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब BIFR की पुनर्वास योजना को मंजूरी मिल जाती है और उसे हाईकोर्ट द्वारा भी स्वीकार कर लिया जाता है, तो राज्य सरकार सहित सभी हितधारक उस योजना से बंधे रहते हैं।

ये है मामला

मामला अलवर स्थित लॉर्ड्स क्लोरो अल्काली लिमिटेड (पूर्व में मोदी अल्कलीज एंड केमिकल्स लिमिटेड) से जुड़ा है।

कंपनी ने वर्ष 1985 से 1991 के बीच रीको से दो प्रकार के ऋण लिए थे। इनमें पहला इंटरेस्ट फ्री सेल्स टैक्स लोन (IFSTL) लगभग 257.53 लाख रुपये का था और दूसरा टर्म लोन करीब 81.68 लाख रुपये का था।

वर्ष 2000 में कंपनी वित्तीय संकट में आ गई और उसने सिक इंडस्ट्रियल कंपनिज (स्पेशल प्रोविजन्स) एक्ट, 1985 के तहत बीआईएफआर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया।

BIFR ने 15 जनवरी 2002 को कंपनी को “सिक कंपनी” घोषित करते हुए पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की और आईडीबीआई को ऑपरेटिंग एजेंसी नियुक्त किया।

इसके बाद BIFR ने 30 नवंबर 2006 को एक पुनर्वास योजना को मंजूरी दी। इस योजना के तहत राज्य सरकार से जुड़े बकाया सेल्स टैक्स लोन का केवल 26.5 प्रतिशत यानी लगभग 40.48 लाख रुपये ही अंतिम भुगतान के रूप में स्वीकार किया जाना था, जबकि शेष राशि, ब्याज और दंड को माफ किया जाना था।

रीको ने उठाई आपत्ति

कंपनी का कहना था कि उसने योजना के अनुसार भुगतान करने की पेशकश भी की, लेकिन रीको ने इसे स्वीकार नहीं किया।

इसके बजाय वर्ष 2017 में रीको ने कंपनी को लगभग 7.64 करोड़ रुपये जमा कराने का नोटिस जारी कर दिया, जिसमें मूल राशि के साथ ब्याज भी शामिल था।

कंपनी ने इस मांग को चुनौती देते हुए अदालत में कहा कि पुनर्वास योजना के अनुसार उसे केवल 26.5 प्रतिशत राशि ही चुकानी थी।

कंपनी ने 27 जुलाई 2017 को 40.48 लाख रुपये की राशि भी जमा करा दी थी। इसके बावजूद रीको ने बड़ी राशि की मांग जारी रखी।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार और रीको की ओर से अदालत में कहा गया कि कंपनी ने पुनर्वास योजना के तहत तय समय सीमा में भुगतान नहीं किया, इसलिए उसे योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता।

साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि योजना लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति जरूरी थी।

सरकार का कहना था कि चूंकि सात वर्षों की निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया, इसलिए कंपनी राहत पाने की हकदार नहीं है।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि BIFR की पुनर्वास योजना का उद्देश्य बीमार उद्योगों को पुनर्जीवित करना और सभी हितधारकों के हितों की रक्षा करना है।

कोर्ट ने कहा कि योजना को BIFR द्वारा स्वीकृत किया गया था और बाद में कंपनी कोर्ट ने भी उसे मंजूरी दे दी थी।

कोर्ट ने कहा कि उस समय रीको ने आपत्तियां उठाई थीं, लेकिन अदालत ने उन्हें खारिज कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार या रीको ने उस आदेश को किसी उच्च मंच पर चुनौती भी नहीं दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब योजना को चुनौती नहीं दी गई और वह अंतिम रूप से लागू हो गई, तो वह सभी पक्षों पर बाध्यकारी हो जाती है। ऐसे में राज्य सरकार या रीको बाद में उससे पीछे नहीं हट सकते।

देरी का तर्क भी खारिज

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कंपनी द्वारा अदालत में आने में देरी का तर्क भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद पत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी लगातार रीको से संपर्क कर रही थी और 26.5 प्रतिशत राशि जमा कराने की पेशकश कर रही थी।

अदालत ने पाया कि भुगतान में देरी कंपनी की वजह से नहीं बल्कि रीको द्वारा राशि स्वीकार नहीं किए जाने के कारण हुई। इसलिए कंपनी को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

रीको की मांग को बताया अवैध

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पुनर्वास योजना लागू होने के बाद राज्य सरकार और रीको उस समझौते से पीछे नहीं हट सकते।

इसलिए 6 जुलाई 2017 को जारी की गई 7.64 करोड़ रुपये की मांग नोटिस मनमानी और अवैध है।

कोर्ट ने उस नोटिस को रद्द करते हुए कहा कि कंपनी द्वारा जमा की गई 40.48 लाख रुपये की राशि को स्वीकार किया जाएगा।

हालांकि अदालत ने यह निर्देश भी दिया कि इस राशि पर 15 मार्च 2007 (जब हाईकोर्ट ने योजना को मंजूरी दी थी) से 27 जुलाई 2017 तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज जमा करना होगा।

पुनर्वास योजना एक बार स्वीकृत होने के बाद सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होती है और सरकारी एजेंसियां भी उससे पीछे नहीं हट सकतीं।

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