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केस रिकॉर्ड में गड़बड़ी पर हाईकोर्ट सख्त: न्यायिक अधिकारी के खिलाफ Chief Justice को जांच की सिफारिश, दुष्कर्म मामले में किशोर आरोपी को जमानत

Rajasthan High Court Flags Charge-Sheet Discrepancies, Refers Magistrate Matter to Chief Justice; Juvenile Rape Accused Granted Bail

चार्जशीट की तारीख और अदालत के रिकॉर्ड में विरोधाभास पर हाईकोर्ट ने जताई गंभीर चिंता, कहा-न्यायिक रिकॉर्ड की शुचिता सर्वोपरि; आरोपी किशोर को मिला वैधानिक जमानत का अधिकार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील नाबालिग के साथ दुष्कर्म से जुड़े मामले में पॉक्सों कोर्ट के न्यायिक रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी और चार्जशीट की तिथि से जुड़े विरोधाभासों को लेकर कड़ा रुख अपनाया हैं.

राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित जज के आचरण की जांच के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजते हुए दुष्कर्म के आरोपी किशोर को वैधानिक (डिफॉल्ट) जमानत देने का आदेश दिया हैं.

मामला जोधपुर जिले के लूणी थाना क्षेत्र में दर्ज एक दुष्कर्म प्रकरण से जुड़ा है, जिसमें आरोपी एक किशोर है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि जांच और चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया से जुड़े अदालती रिकॉर्ड में कई गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती हैं।

ये हैं मामला

अगस्त 2025 में थाने में दर्ज हुई एक एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि आरोपी किशोर और एक अन्य व्यक्ति ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया।

जांच के दौरान आरोपी किशोर को गिरफ्तार कर बाल सुधार गृह भेज दिया गया। इसके बाद आरोपी ने कानून के अनुसार निर्धारित अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल न होने का हवाला देते हुए डिफॉल्ट जमानत की मांग की।

हालांकि, निचली अदालत ने यह कहते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी कि चार्जशीट निर्धारित समय सीमा के भीतर दाखिल कर दी गई थी।

बाद में यह आदेश अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।

रिकॉर्ड में मिली गंभीर विसंगतियां

राजस्थन हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड को देखने पर पता चला कि किशोर न्याय अदालत में चार्जशीट दाखिल होने की तिथि को लेकर दस्तावेजों और आदेश-पत्रों में गंभीर विरोधाभास है।

हाईकोर्ट ने कहा कि 21 नवंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल होने का दावा किया गया, लेकिन उस तारीख का कोई समकालीन आदेश-पत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था।

जमानत पेश होने से पहले ही आदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल चार्जशीट के कवर पेज के पीछे मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया एक उल्लेख ही सामने आया, जिसे पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि 24 नवंबर 2025 के आदेश-पत्र में जमानत आवेदन खारिज होने का उल्लेख पाया गया, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार जमानत आवेदन 28 और 29 नवंबर को पेश और खारिज किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि कोई न्यायिक आदेश उस घटना से पहले दर्ज नहीं हो सकता जो अभी घटी ही नहीं है, जिससे आदेश-पत्र के पूर्व दिनांकित होने की आशंका उत्पन्न होती है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक रिकॉर्ड की शुचिता और विश्वसनीयता न्याय व्यवस्था की आधारशिला है और इसमें किसी भी प्रकार की अस्पष्टता या बाद में दस्तावेज तैयार होने का संदेह अत्यंत गंभीर मामला है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि रिकॉर्ड में बाद में दस्तावेज जोड़े गए हों या तथ्य छिपाने का प्रयास हुआ हो, तो यह न्यायिक अनुशासन और संस्थागत विश्वास के लिए चिंताजनक स्थिति है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस चरण पर संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रही है, लेकिन उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता दर्शाती है। इसी कारण मामले को आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया है।

किशोर आरोपी को मिली जमानत

हाईकोर्ट ने पाया कि जांच निर्धारित 90 दिन की अवधि में पूरी नहीं हुई थी और चार्जशीट समय पर दाखिल होने का कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड नहीं था।

ऐसे में कानून के अनुसार आरोपी को वैधानिक जमानत का अधिकार प्राप्त हो गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट जमानत आरोपी का वैधानिक अधिकार” है और निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद अदालत के पास उसे हिरासत में रखने का विवेकाधिकार नहीं रहता।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पीड़िता के बयान में आरोपी किशोर की स्पष्ट भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया है, जो जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण पहलू है।

न्यायिक अनुशासन पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी अपराध की गंभीरता न्यायिक रिकॉर्ड की शुद्धता से ऊपर नहीं हो सकती। न्यायिक अधिकारी का कर्तव्य है कि वह पूरी पारदर्शिता, सटीकता और निष्पक्षता के साथ कार्य करे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधीनस्थ न्यायपालिका पर अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल गलत आदेश के आधार पर नहीं की जा सकती, लेकिन यदि रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितता या कदाचार का संकेत मिले तो जांच आवश्यक हो जाती है।

Case Details :

RAJASTHAN HIGH COURT AT JODHPUR
S.B. Criminal Revision Petition No. 13/2026
V Versus State Of Rajasthan
JUSTICE FARJAND ALI

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