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मृत व्यक्ति पर हत्या के प्रयास का आरोप असंभव, धारा 308 IPC केवल जीवित व्यक्ति पर लागू-राजस्थान हाईकोर्ट

1 FIR, 20+ Officers, 11 Years Delay: Rajasthan High Court Slams Police, Orders Separate Investigation Wing

जयपुर की संस्था पर लगे शरीर से अंग निकालकर बेचने के आरोप, हाईकोर्ट ने कहा ऐसे आरोपो से कोई भी मदद करने से डरेगा, एफआईआर रद्द

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ हत्या के प्रयास (धारा 308 IPC) का मामला बन ही नहीं सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा आरोप कानूनी और तार्किक दोनों दृष्टि से “असंभव” है।

कोर्ट ने कहा कि “जो व्यक्ति पहले ही मर चुका है, उसे मारने का प्रयास करना कानूनी रूप से असंभव है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 308 IPC केवल जीवित व्यक्ति पर लागू हो सकती है, किसी मृत व्यक्ति पर नहीं।

यह फैसला जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने बिशन लाल जांगिड़ व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

पूरा मामला जयपुर स्थित श्री शंकर सेवा धाम ट्रस्ट से जुड़ा है, जो बेसहारा, मानसिक रूप से अस्वस्थ और निराश्रित लोगों की सेवा करता है।

12 जून 2017 को संस्था के एक ड्राइवर ने सड़क पर गंभीर हालत में एक व्यक्ति (सीताराम) को पाया और उसे संस्था में भर्ती कराया।

इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई, जिसे डॉक्टर ने कार्डियोपल्मोनरी फेल्योर बताया। बाद में संस्था ने उसका अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया।

शिकायत और गंभीर आरोप

करीब दो महीने बाद मृतक के भाई ने आरोप लगाया कि उसका भाई पहले स्वस्थ था और संस्था के लोगों ने उसके शरीर से अंग निकालकर बेच दिए। साथ ही मृत्यु की जानकारी भी नहीं दी गई।

हालांकि पुलिस जांच में इन आरोपों को पूरी तरह निराधार पाया गया और नेगेटिव रिपोर्ट दी गई।

इसके बावजूद शिकायतकर्ता ने कोर्ट में दूसरी शिकायत दर्ज करवाई, जिस पर मजिस्ट्रेट ने IPC की धाराओं 201, 308 और 120-B के तहत संज्ञान ले लिया।

का बड़ा उदाहरण है, जिसने “संभावना” और “साक्ष्य” के बीच का फर्क साफ कर दिया है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. के. अग्रवाल और पंकज गुप्ता ने अदालत में दलील देते हुए कहा कि पूरा मामला झूठे, काल्पनिक और दुर्भावनापूर्ण आरोपों पर आधारित है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता समाजसेवी संस्था श्री शंकर सेवा धाम से जुड़े हैं। यह संस्था पूरी तरह सेवा भाव से संचालित होती है और समाज में मानवता का कार्य कर रही है।

दलील दी गई कि मृतक सीताराम सड़क पर गंभीर हालत में मिला, जिसे संस्था के कर्मचारी (ड्राइवर) ने मानवता के आधार पर उठाकर आश्रय गृह में भर्ती कराया। इलाज के बावजूद उसकी मृत्यु हो गई, जिसका कारण डॉक्टर ने कार्डियोपल्मोनरी फेल्योर बताया।

मृतक का अंतिम संस्कार जयपुर के मोक्षधाम में पूरे सम्मान और धार्मिक रीति-रिवाज से किया गया और संस्था ने किसी भी प्रकार की अनियमितता नहीं की।

अधिवक्ता ने कहा कि मृतक के पास मिले ₹1,986 संस्था ने सुरक्षित रखे और बाद में शिकायतकर्ता को दे दिए। शिकायतकर्ता ने स्वयं वह राशि संस्था को दान दी।

अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस ने नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट दी। पहली शिकायत खारिज होने के बाद शिकायतकर्ता ने दूसरी शिकायत दाखिल की। यह कानून का दुरुपयोग है और केवल याचिकाकर्ताओं को परेशान करने के लिए किया गया।

अधिवक्ता ने दलील दी कि मृत व्यक्ति के खिलाफ धारा 308 IPC (हत्या का प्रयास) लगाना पूरी तरह गलत है। कोई मेडिकल साक्ष्य, पोस्टमार्टम या प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। इसलिए पूरा मामला कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।

सरकार और शिकायतकर्ता का पक्ष

याचिका का विरोध करते हुए शिकायतकर्ता ने दावा किया कि उसका भाई सीताराम पहले स्वस्थ था और संस्था में भर्ती होने के बाद उसकी मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई।

विरोध में आरोप लगाया गया कि संस्था के लोगों ने मृतक के शरीर से अंग निकालकर बेच दिए। यह एक गंभीर आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) का हिस्सा बताया गया।

शिकायतकर्ता ने कहा कि उसे अपने भाई की मृत्यु की जानकारी समय पर नहीं दी गई। यह भी आरोप लगाया गया कि जानकारी छुपाई गई।

अधिवक्ता ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध तथ्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला पाया गया। इसलिए IPC की धारा 201, 308 और 120-B के तहत संज्ञान लेना उचित था।

अधिवक्ता ने दलील दी कि इस पूरे मामले की सच्चाई ट्रायल के दौरान सामने आ सकती है। इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला

सभी दलीलों और बहस के बाद जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि धारा 308 IPC (हत्या का प्रयास) केवल जीवित व्यक्ति पर लागू होती है।

कोर्ट ने कहा कि

यदि कोई व्यक्ति पहले ही मर चुका है, तो उसके खिलाफ हत्या का प्रयास करना कानूनी और व्यावहारिक रूप से असंभव (Impossible Act) है।

कोर्ट ने कहा कि

हत्या का प्रयास करने के लिए “जीवित व्यक्ति” का होना आवश्यक है और मृत शरीर पर कोई भी कृत्य “हत्या का प्रयास” नहीं माना जा सकता। इसलिए इस मामले में धारा 308 IPC का लगना पूरी तरह गलत है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पर कहा कि किसी भी आरोपी को समन करना एक गंभीर प्रक्रिया है और मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेते समय पर्याप्त सोच-विचार और साक्ष्यों का परीक्षण करना जरूरी है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Pepsi Foods Ltd. बनाम स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “आरोपी को बुलाना कोई सामान्य कार्य नहीं है, इसके लिए ठोस आधार होना जरूरी है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानव अंग निकालना गंभीर अपराध है, लेकिन इसके लिए ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्य जरूरी होते हैं।

कोर्ट ने कहा कि इस केस में कोई पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं, कोई इनक्वेस्ट रिपोर्ट नहीं और कोई मेडिकल प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे में आरोप केवल “कल्पना और संदेह” पर आधारित हैं और कानून में टिक नहीं सकते।

हाईकोर्ट ने कहा कि Transplantation of Human Organs and Tissues Act, 1994 के तहत कार्रवाई के लिए एक तय प्रक्रिया है। केवल अधिकृत प्राधिकरण ही इस मामले में शिकायत दर्ज कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि

इस केस में न तो कोई अधिकृत शिकायत हुई और न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया, इसलिए इस कानून के तहत भी मामला नहीं बनता।

कोर्ट ने भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोण पर भी कहा कि यदि ऐसे झूठे और आधारहीन आरोपों को स्वीकार किया जाएगा, तो समाजसेवा करने वाली संस्थाओं का मनोबल गिरेगा और कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करने से डरने लगेगा।

कोर्ट ने कहा कि:

“जो लोग सड़कों से बेसहारा लोगों को उठाकर उनकी जान बचाने का प्रयास करते हैं, उन्हें इस प्रकार के आरोपों से हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने मृत व्यक्ति के अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि

संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवित व्यक्ति तक सीमित नहीं है, मृत व्यक्ति को भी सम्मान और गरिमा का अधिकार है। अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक किया जाना चाहिए और इस मामले में संस्था ने मृतक के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में कोई प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता और धारा 308 IPC पूरी तरह लागू नहीं होती, इसलिए अन्य धाराएं (201, 120-B IPC) भी स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

हाईकोर्ट ने इस मामले में दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है।

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