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जलवायु परिवर्तन, साइबर खतरे और AI जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान संवाद और मध्यस्थता से संभव – जस्टिस अशोक कुमार जैन

Dialogue and Mediation Can Solve Global Challenges Like Climate Change, Cyber Threats and AI: Justice Ashok Kumar Jain

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, साइबर अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), गलत सूचनाओं (Misinformation), पहचान आधारित संघर्ष और प्रवासन जैसी अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है।

ऐसे समय में इन समस्याओं का समाधान केवल मुकदमों और न्यायालयों से संभव नहीं है, बल्कि संवाद, सहमति और मध्यस्थता (Mediation) को समाज की पहली प्रवृत्ति बनाना होगा।

वे कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस में “Peace Mediation as a Civilisational Tool: Advancing Peace, Inclusion and Sustainable Development” विषय पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित कर रहे थे।

जस्टिस जैन ने कहा कि मध्यस्थता को केवल वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution) के रूप में देखना उसकी भूमिका को सीमित करना होगा।

उन्होने कहा कि वास्तव में यह एक ऐसी सभ्यतागत व्यवस्था (Civilisational Institution) है, जो रिश्तों को बचाती है, संस्थाओं को मजबूत करती है और मानव गरिमा की रक्षा करती है।

उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि महान सभ्यताओं की पहचान केवल उनके भव्य निर्माणों से नहीं, बल्कि इस क्षमता से हुई कि उन्होंने संघर्षों को समाज को तोड़े बिना कैसे सुलझाया।

उन्होने कहा मिस्र के पिरामिड, यूनान का दर्शन, रोम की विधिक परंपरा, भारत की ज्ञान परंपरा, चीन के नवाचार और अफ्रीका की सांस्कृतिक विरासत आज भी इसलिए याद किए जाते हैं क्योंकि इन सभ्यताओं ने संवाद और सहमति को महत्व दिया।

‘सभ्यता का इतिहास, मध्यस्थता का भी इतिहास है’

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि संविधान, न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अस्तित्व में आने से बहुत पहले समाजों ने यह समझ लिया था कि हर विवाद का अंत हिंसा में नहीं होना चाहिए।

परिवारों के बुजुर्ग, गांवों के पंच, जनजातीय मुखिया और समाज के सम्मानित लोग संवाद के माध्यम से विवादों का समाधान करते थे। यही परंपरा आगे चलकर आधुनिक मध्यस्थता व्यवस्था की नींव बनी।

उन्होंने कहा कि यदि न्याय यह बताता है कि क्या सही है, तो मध्यस्थता यह खोजती है कि क्या संभव है। दोनों मिलकर स्थायी शांति की नींव तैयार करते हैं।

महाभारत से संयुक्त राष्ट्र तक मध्यस्थता की परंपरा

अपने संबोधन में जस्टिस जैन ने भारतीय सभ्यता की प्राचीन पंचायत व्यवस्था और महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण के शांति प्रयास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में हजारों वर्षों से संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाने की परंपरा रही है।

उन्होंने अफ्रीका की पलावर ट्री, प्राचीन यूनान की एपिस्टेट्स प्रणाली, मेसोपोटामिया में राजा मेसिलिम द्वारा सीमा विवाद का समाधान, मिस्र और हित्ती साम्राज्य के बीच कादेश संधि, रोमन कानून और चीन के कन्फ्यूशियस दर्शन का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग सभ्यताओं ने स्वतंत्र रूप से एक ही निष्कर्ष निकाला कि स्थायी शांति बल प्रयोग से नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता से प्राप्त होती है।

SDG-16 का आधार है शांति

जस्टिस जैन ने कहा कि शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश, लोकतांत्रिक शासन और सतत विकास की आधारशिला है।

संयुक्त राष्ट्र के 2030 सतत विकास एजेंडा और सतत विकास लक्ष्य-16 (SDG-16) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के बिना किसी भी विकास लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि संवाद के माध्यम से रोका गया प्रत्येक संघर्ष केवल लोगों की जान नहीं बचाता, बल्कि सामाजिक विश्वास, आर्थिक संसाधनों और संस्थागत मजबूती की भी रक्षा करता है।

महिलाओं और युवाओं की भागीदारी जरूरी

जस्टिस जैन ने कहा कि स्थायी शांति तभी संभव है जब महिलाओं, युवाओं, आदिवासी समुदायों और समाज के वंचित वर्गों को शांति निर्माण की प्रक्रिया में समान भागीदारी मिले।

उन्होंने कहा कि समावेशिता केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं, बल्कि स्थायी और न्यायपूर्ण शांति की अनिवार्य शर्त है।

भविष्य के मध्यस्थों को नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा

उन्होंने कहा कि भविष्य में संघर्षों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। इसलिए आने वाले समय के मध्यस्थों को केवल कानून का ज्ञान ही नहीं, बल्कि तकनीकी समझ, सांस्कृतिक संवेदनशीलता, नैतिक दृष्टिकोण और भावनात्मक बुद्धिमत्ता भी विकसित करनी होगी।

अपने संबोधन के समापन में जस्टिस अशोक कुमार जैन ने महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला और आर्कबिशप डेसमंड टूटू के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यस्थता की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह केवल विवाद समाप्त नहीं करती, बल्कि टूटे हुए विश्वास को पुनर्जीवित करती है, रिश्तों को जोड़ती है और समाज में सह-अस्तित्व की संस्कृति विकसित करती है।

उन्होंने कहा, “किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसके स्मारकों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह मतभेदों का समाधान किस बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता से करती है। आज आवश्यकता है कि संवाद हमारी अंतिम नहीं, बल्कि पहली प्रतिक्रिया बने।”

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