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राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला :रिश्वत मामले में दोषी घोषित करने के लिए केवल ट्रैप पर्याप्त नहीं, रिश्वत की मांग, स्वीकृति और लंबित कार्य-तीनों का प्रमाण अनिवार्य”

Rajasthan High Court Rules Bribery Conviction Requires Proof of Demand, Acceptance and Pending Work

रींगस के तत्कालीन RPF थानाधिकारी सहित तीन पुलिसकर्मियों को किया हाईकोर्ट ने बरी, ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 1-1 साल की सजा

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के तीन अधिकारियों से जुड़े एक बहुचर्चित रिश्वत मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया है।

जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि रिश्वत के मामले में किसी को दोषी घोषित करने के लिए आरोपी के खिलाफ रिश्वत की स्पष्ट मांग (demand), उसकी स्वीकृति या बरामदगी (acceptance/recovery) और आरोपी के पास लंबित आधिकारिक कार्य (pendency of work)—इन तीनों तत्वों का संदेह से परे साबित होना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संदेह, अनुमान या अपूर्ण साक्ष्य के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

एकलपीठ ने सीकर के रींगस रेलवे स्टेशन पर तैनात रहे तत्कालीन RPF थानाधिकारी कैलाश चंद सैनी, ड्यूटी ऑफिसर/कांस्टेबल जगवीर सिंह और कांस्टेबल सांवरमल मीणा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

रिश्वत के मामले में इन तीनों पुलिसकर्मियों को जयपुर की भ्रष्टाचार मामलों की विशेष अदालत ने दोषी घोषित करते हुए 1—1 साल की सजा सुनाई थी।

ये है मामला

वर्ष 2007 में परिवादी चिरंजी लाल ने एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि रेलवे अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में उसका नाम हटाने और उसके भाई को राहत दिलाने के बदले आरपीएफ अधिकारियों ने ₹5,000 की रिश्वत की मांग की है।

परिवादी का आरोप था कि पहले ₹2,000 की राशि ली गई और शेष ₹3,000 बाद में देने के लिए कहा गया।

एसीबी ने 26 जुलाई 2007 को ट्रैप कार्रवाई की, जिसमें कांस्टेबल सांवरमल मीणा के पास से रिश्वत की राशि मिलने का दावा किया गया।

इसके बाद तीनों आरपीएफ कर्मियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आईपीसी की धारा 120-B के तहत मामला दर्ज किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

करीब 16 वर्षों तक चले मुकदमे के बाद वर्ष 2023 में जयपुर की भ्रष्टाचार मामलों की विशेष अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी मानते हुए एक-एक वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

ट्रायल कोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद जयपुर एसीबी कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग साबित नहीं कर सका।

कोर्ट ने कहा कि रिश्वत की मांग (Demand) भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे अहम तत्व है। इस मामले में न तो 13 जुलाई 2007 की कथित मांग का कोई ऑडियो रिकॉर्ड उपलब्ध था और न ही कोई स्वतंत्र गवाह।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल परिवादी के बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता, खासकर जब उसके बयान में विरोधाभास हों।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही मामले में स्वीकारोक्ति और बरामदगी को संदिग्ध माना।

कोर्ट ने कहा कि ट्रैप के दौरान ₹3,000 की राशि किसी आरोपी के कब्जे से नहीं, बल्कि जमीन से बरामद होने की बात सामने आई।

अदालत ने माना कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि आरोपी ने स्वेच्छा से रिश्वत स्वीकार की थी। हाथ धुलवाने पर किया गया रासायनिक परीक्षण भी सकारात्मक नहीं पाया गया।

कोई लंबित कार्य नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य माना कि परिवादी और उसके भाई के खिलाफ दर्ज रेलवे एक्ट का मामला पहले ही जांच अधिकारी द्वारा चार्जशीट के लिए आगे भेजा जा चुका था।

ऐसे में आरोपियों के पास परिवादी को कोई लाभ पहुंचाने की वास्तविक क्षमता ही नहीं थी।

स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रैप कार्रवाई के समय रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट परिसर में मौजूद थे, लेकिन न तो मजिस्ट्रेट को और न ही किसी अन्य स्वतंत्र व्यक्ति को अभियोजन पक्ष ने गवाह बनाया। इसे कोर्ट ने अभियोजन की गंभीर कमी माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन स्वीकृति आदेश यांत्रिक (mechanical) तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं।

अलग-अलग आरोपियों के लिए लगभग समान भाषा में आदेश जारी होना भी संदेह पैदा करता है।

कानून पर अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि “केवल संदेह या अनुमान के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भ्रष्टाचार के मामलों में स्पष्ट, ठोस और भरोसेमंद साक्ष्य अनिवार्य हैं।”

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति साबित हुए बिना धारा 7 और 13 के तहत दोषसिद्धि संभव नहीं है, चाहे ट्रैप की कार्रवाई क्यों न की गई हो।

केवल ट्रैप पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल ट्रैप पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऑडियो/वीडियो साक्ष्य और स्वतंत्र गवाह अत्यंत आवश्यक हैं। इसके साथ ही अभियोजन स्वीकृति औपचारिकता नहीं हो सकती, रिश्वत मामले में आरोपी की वास्तविक भूमिका और क्षमता का आकलन जरूरी है।

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