कोर्ट ने कहा- आयुर्वेद चिकित्सकों को इनसे वंचित रखना भेदभावपूर्ण और अनुचित है.
जयपुर, 11 नवंबर 2025
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि आयुर्वेद चिकित्सकों को भी वही सेवा और पेंशन संबंधी लाभ मिलेंगे, जो यूनानी और होम्योपैथी विभाग के चिकित्सकों को पहले से प्राप्त हैं।
जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सरकार ने स्वयं 1973 के नियमों (Rules of 1973) में संशोधन कर नियम 6 और 31 को बदला था, जिससे अस्थायी या तात्कालिक नियुक्तियों को भी उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से नियमित सेवा का दर्जा मिल गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब यह संशोधन वैधानिक रूप से लागू हो गया, तो उसके तहत आने वाले कर्मचारियों के अधिकार और लाभ स्वतः सुरक्षित हो गए।
भेदभाव असंवैधानिक
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब होम्योपैथी और यूनानी विभाग के चिकित्सकों को समान संशोधनों के तहत लाभ मिल चुके हैं, तो आयुर्वेद चिकित्सकों को इनसे वंचित रखना भेदभावपूर्ण और अनुचित है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बार जब सेवा को नियमों के तहत नियमित माना जा चुका है, तो “रेगुलर सर्विस” की परिभाषा का उपयोग करके लाभों को रोकना न्यायसंगत नहीं हो सकता। इस स्थिति में कोई प्रशासनिक विवेक या व्याख्या लागू नहीं होती।
पेंशन और एसीपी लाभ से इनकार अन्यायपूर्ण
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पेंशन और एसीपी (Assured Career Progression) लाभों से आयुर्वेद चिकित्सकों को वंचित करना अन्यायपूर्ण है, क्योंकि यह समान कार्य करने वाले चिकित्सकों के साथ असमान व्यवहार है।
कोर्ट ने माना कि कई आयुर्वेद चिकित्सक अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, और उनके अर्जित लाभों को नकारना अनुचित कठिनाई और असमानता उत्पन्न करेगा।
संशोधित नियमों का हवाला
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1973 के संशोधित नियमों के तहत नियमितीकरण की प्रभावी तिथि पहली नियुक्ति की तारीख से मानी जाएगी, और किसी भी प्रशासनिक आदेश द्वारा इस अधिकार को सीमित करना कानूनी रूप से अमान्य है।
कोर्ट ने कहा कि हमारी मंशा स्पष्ट है —
“अस्थायी नियुक्त कर्मियों और नियमित चयनित कर्मचारियों के बीच की असमानता समाप्त की जाए।”
राज्य सरकार ने जब स्वयं यह सिद्धांत यूनानी और होम्योपैथी विभागों पर लागू किया है, तो आयुर्वेद विभाग को बाहर रखना असंगत है।
सरकार की दलीलें
राजस्थान हाईकोर्ट के एकलपीठ के फैसले के खिलाफ दायर कि गयी राज्य सरकार और आयुर्वेद विभाग की आरे से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने पैरवी की.
अस्थायी नियुक्ति से लाभ नहीं मिल सकता :
आयुर्वेद चिकित्सकों की नियुक्ति वर्ष 1990 से 1993 के बीच तात्कालिक/अस्थायी आधार (urgent temporary basis) पर हुई थी, न कि नियमित चयन के माध्यम से। इसलिए उनकी सेवा को प्रारंभिक तिथि से नियमित सेवा के रूप में नहीं गिना जा सकता।
नियमितीकरण 2007 से प्रभावी :
वर्ष 2006 के संशोधन के बाद 2007 में गठित स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा इन चिकित्सकों को नियमित किया गया था। इसलिए यह नियमितीकरण एक नया नियुक्ति आदेश माना जाएगा, जो केवल भविष्य में (prospectively) लागू होगा.
वित्तीय भार और नियमों का उल्लंघन :
महाधिवक्ता ने कहा कि प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से पेंशन और एसीपी (ACP) लाभ देना राज्य सरकार पर भारी आर्थिक बोझ डालेगा और यह राजस्थान सिविल सेवा (Revised Pay Scale) नियम, 2008 के नियम 5(11) के विपरीत है, जो केवल “regular service” को ही मान्यता देता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
महाधिवक्ता ने State of Rajasthan v. Jagdish Narain Chaturvedi (2009) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि स्क्रीनिंग से पहले की सेवा को किसी भी स्थिति में नियमित सेवा नहीं माना जा सकता।
सीनियॉरिटी और समानता का तर्क असंगत
महाधिवक्ता ने दलील दी कि इन चिकित्सकों की वरिष्ठता पहले ही स्क्रीनिंग तिथि से तय हो चुकी है। इसलिए वही तिथि पेंशन और एसीपी लाभों की गणना के लिए भी आधार बनेगी.
वित्तीय प्रभाव का उल्लेख
महाधिवक्ता ने कहा कि यदि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहता है, तो लगभग 521 आयुर्वेद चिकित्सकों को लाभ मिलेगा, जिससे राज्य को काफी आर्थिक हानि होगी.
आयुर्वेद चिकित्सको की दलीलें
करीब 521 आयुर्वेद चिकित्सकों की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर और जयपुर के अधिवक्ता रिष्ठ अधिवक्ता आर. एन. माथुर, जे. एस. भलेरिया, डी. एस. सोढा, अदिति वत्स, अक्षित गुप्ता, हिमांशु पारीक, यशपाल खिलाड़ी, हेमंत श्रीमाल ने पैरवी की.
करीब 200 से अधिक याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तनवीर अहमद पेश हुए.
नियमित नियुक्ति समान नियमों के तहत
अधिवक्ताओं ने दलील दी कि सभी चिकित्सकों की नियुक्ति राजस्थान आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी और नेचुरोपैथी सेवा नियम, 1973 के नियम 27 के तहत हुई थी और उन्होंने बिना किसी अंतराल के लगातार सेवा दी.
सरकार ने स्वयं नियमों में संशोधन किया
अधिवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार ने वर्ष 1996 और 2006 में नियम 6 और 31 में संशोधन करके यह प्रावधान किया कि तात्कालिक/अस्थायी नियुक्तियों को पहली नियुक्ति की तिथि से नियमित सेवा माना जाएगा। इसलिए अब सरकार यह नहीं कह सकती कि यह सेवा “regular” नहीं है.
स्क्रीनिंग और नियमितीकरण का प्रभाव
अधिवक्ताओं ने कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा सभी चिकित्सक योग्य पाए गए और उन्हें प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से नियमित किया गया। यह प्रक्रिया पूरी तरह वैधानिक थी, इसलिए इस पर दोबारा सवाल नहीं उठाया जा सकता.
भेदभाव असंवैधानिक
दलील दी गई कि यूनानी और होम्योपैथी विभाग के चिकित्सकों को समान लाभ मिल चुके हैं.
आयुर्वेद चिकित्सकों को इससे वंचित रखना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
सेवानिवृत्त चिकित्सकों को नुकसान :
अधिवक्ताओं ने कहा कि कई चिकित्सक अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके पहले से तय पेंशन और एसीपी लाभों को वापस लेना अनुचित और अमानवीय होगा।
नियम 1973 का स्पष्ट प्रावधान
आयुर्वेद चिकित्सकों की ओर से यह दलील दी गई कि नियम 6(7) और नियम 31(9) के अनुसार, जिन चिकित्सकों की नियुक्ति 6 मई 1990 से 31 दिसंबर 1993 के बीच हुई है, उनकी सेवा पहली नियुक्ति की तिथि से नियमित मानी जाएगी। अतः सरकार का बाद का आदेश (31.07.2020) नियमों के विपरीत और अवैध है।
अपील खारिज, फैसला बरकरार
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही एकल पीठ के आदेश को तर्कसंगत, विधिक और समानता के सिद्धांतों पर आधारित मानते हुए बरकरार रखा है।
खंडपीठ ने कहा —
“यह निर्णय न्यायसंगत और कानून के अनुरूप है।”
इसके साथ ही राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी गई है।